अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन/बीजिंग | 10 मई 2026
अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष अब सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रह गया है। इस युद्ध पर दुनिया की सबसे बड़ी नजर चीन की है। अमेरिकी रक्षा अधिकारियों और रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बीजिंग इस पूरे युद्ध को “लाइव क्लासरूम” की तरह देख रहा है और अमेरिकी सैन्य रणनीति, कमजोरी और संसाधनों की सीमाओं का गहराई से अध्ययन कर रहा है।
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन खास तौर पर यह देख रहा है कि दुनिया की सबसे ताकतवर सेना मानी जाने वाली अमेरिकी सेना आखिर क्यों ईरान की समुद्री नाकेबंदी को पूरी तरह तोड़ नहीं पा रही। हॉर्मुज स्ट्रेट में अमेरिकी नौसेना की भारी तैनाती के बावजूद ईरानी ड्रोन और मिसाइल हमले जारी हैं। इससे बीजिंग को यह संदेश मिल रहा है कि अमेरिका की सैन्य शक्ति असीमित नहीं है और लंबा युद्ध उसकी रणनीतिक क्षमता पर दबाव डाल सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन अमेरिकी सेना के हर कदम का अध्ययन कर रहा है — मिसाइल हमलों की गति, खुफिया जानकारी जुटाने का तरीका, युद्ध संचालन की प्रक्रिया और हथियारों के इस्तेमाल तक। अमेरिकी रक्षा अधिकारियों को डर है कि भविष्य में अगर अमेरिका और चीन के बीच टकराव हुआ, खासकर ताइवान या इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में, तो चीन इन अनुभवों का इस्तेमाल अमेरिका के खिलाफ कर सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि चीन पहले से ही लंबी दूरी की मिसाइलों और ड्रोन का विशाल भंडार तैयार कर चुका है। ईरान ने जिस तरह सस्ते ड्रोन के जरिए बड़े पैमाने पर हमले कर अमेरिकी और सहयोगी रक्षा प्रणालियों पर दबाव बनाया, चीन उससे और भी बड़ा मॉडल तैयार कर सकता है। फर्क सिर्फ इतना होगा कि चीन के पास तकनीक और संसाधन ईरान से कहीं ज्यादा उन्नत हैं।
अमेरिकी अधिकारियों की चिंता सिर्फ युद्ध तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि ईरान युद्ध की वजह से अमेरिका को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से अपने सैन्य संसाधन हटाकर मिडिल ईस्ट में लगाने पड़े हैं। एयरक्राफ्ट कैरियर, नौसैनिक जहाज और हजारों सैनिक अब खाड़ी क्षेत्र में तैनात हैं। इससे चीन को यह संकेत मिला है कि अगर अमेरिका कई मोर्चों पर एक साथ उलझ जाए तो उसकी सैन्य तैयारी कमजोर पड़ सकती है।
हालांकि व्हाइट हाउस का दावा है कि अमेरिकी सेना के पास पर्याप्त हथियार और संसाधन मौजूद हैं और ईरान के खिलाफ “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” ने दुनिया को अमेरिकी ताकत दिखाई है। लेकिन अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि युद्ध जितना लंबा खिंचेगा, उतना ही चीन को अमेरिका की रणनीतिक कमजोरियों को समझने का मौका मिलेगा।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन लंबे समय से अमेरिकी युद्ध शैली का अध्ययन करता रहा है। 1991 के गल्फ वॉर से लेकर आज तक बीजिंग अमेरिकी सैन्य मॉडल, एयर स्ट्राइक, साइबर वॉरफेयर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध तकनीकों पर नजर रखता आया है। अब ईरान युद्ध चीन के लिए एक नया अवसर बन गया है, जहां वह वास्तविक युद्ध परिस्थितियों में अमेरिकी रणनीति की परीक्षा देख रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बीजिंग यह भी देख रहा है कि अमेरिका कितनी तेजी से अपने हाई-टेक हथियार खर्च कर रहा है। टॉमहॉक मिसाइलों से लेकर पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम तक, हर हथियार का इस्तेमाल चीन के लिए एक संकेत है कि अमेरिका के संसाधनों की भी एक सीमा है।
इसी बीच अगले सप्ताह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अहम बैठक होने वाली है। लेकिन मौजूदा हालात में कई अमेरिकी विशेषज्ञ मानते हैं कि इस वार्ता में चीन मजबूत स्थिति में दिखाई दे सकता है, क्योंकि ईरान युद्ध ने अमेरिका को सैन्य और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर उलझा दिया है।




