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वॉशिंगटन पोस्ट की कॉलमनिस्ट राणा अय्यूब को जान से मारने की धमकी

भारत और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता जगत में गंभीर चिंता उस समय उभर आई जब भारतीय मूल की अंतरराष्ट्रीय पत्रकार राणा अय्यूब ने आरोप लगाया कि उन्हें 2 नवंबर की रात एक कनाडाई नंबर से जान से मारने की धमकी दी गई। यह धमकी केवल उनके खिलाफ ही नहीं, बल्कि उनके पिता के लिए भी थी। राणा अय्यूब के अनुसार, कॉलर ने अपना नाम ‘हैरी शूटर’ बताया और उनसे मांग की कि वह वॉशिंगटन पोस्ट में ऐसा ओप-एड लिखें जिसमें 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या करने वाले हमलावरों का महिमामंडन किया जाए। राणा का दावा है कि कॉलर की डिस्प्ले पिक्चर में भारत के कुख्यात गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई की तस्वीर लगी हुई थी। यह घटना न केवल प्रेस की आज़ादी पर हमला मानी जा रही है, बल्कि इससे पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल भी उठे हैं।

इस धमकी के सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया अधिकार संगठन कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) ने भारत सरकार और सुरक्षा एजेंसियों से तत्काल कार्रवाई की अपील की है। सीपीजे के भारत प्रतिनिधि कुनाल मजूमदार ने बयान दिया है कि “राणा अय्यूब और उनके पिता के खिलाफ अज्ञात अंतरराष्ट्रीय नंबर से हिंसा की धमकियाँ बेहद चिंताजनक हैं। भारत में पत्रकारों को उनके काम के चलते निशाना बनाया जाना लगातार बड़ा मुद्दा बन चुका है।” सीपीजे ने यह भी कहा है कि इस मामले में सुरक्षा मुहैया कराना केवल एक व्यक्ति की सुरक्षा का प्रश्न नहीं, बल्कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता की रक्षा है।

यह पहली बार नहीं है जब राणा अय्यूब को धमकियों का सामना करना पड़ा हो। वह भारत में सत्ता, मानवाधिकार और अल्पसंख्यक मुद्दों पर बेबाक लिखती रही हैं। इसी कारण वह लंबे समय से ट्रोलिंग, दुष्प्रचार और ऑनलाइन उत्पीड़न का निशाना रही हैं। परंतु इस बार धमकी संगठित अपराध और आतंकी विचारधारा से प्रेरित होने का आरोप लगाया जा रहा है, जो स्थिति को कहीं अधिक खतरनाक बना देता है। अंतरराष्ट्रीय पत्रकार समुदाय में राणा एक महत्वपूर्ण आवाज़ मानी जाती हैं और उनकी सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा अब वैश्विक विमर्श में शामिल हो चुका है।

जहाँ एक ओर पत्रकार-संगठन और कई नागरिक समाज समूह राणा अय्यूब को सुरक्षा देने की माँग कर रहे हैं, वहीं कुछ सोशल मीडिया उपयोगकर्ता इस पूरे मामले को हल्के में लेने या राजनीतिक चश्मे से देखने की कोशिश कर रहे हैं। यह स्थिति इस बड़े सवाल की ओर संकेत करती है — क्या भारत में अब पत्रकार की सुरक्षा उसके विचारों और सरकार पर किए गए सवालों के आधार पर तय होगी? क्या एक लोकतांत्रिक देश में किसी पत्रकार को अपना पेशा धमकी की छाया में निभाना पड़ेगा? और क्या ऐसी धमकियों को राजनीति का हथियार बनने देना स्वीकार्य है?

पत्रकारों के खिलाफ बढ़ती धमकियाँ केवल किसी व्यक्ति की आवाज़ बंद करने की कोशिश नहीं — यह लोकतंत्र की साँस घोंटने की कोशिश है। पत्रकारिता का मूल सिद्धांत सत्ता से सवाल करना और सच सामने लाना है। यदि ऐसा करने पर किसी की जान जाने का खतरा पैदा हो जाए, तो यह लोकतांत्रिक समाज के स्वास्थ्य का सबसे गंभीर संकेत है। राणा अय्यूब का मामला हमें यह याद दिलाता है कि प्रेस की आज़ादी सुरक्षित हो तभी नागरिक सुरक्षित हैं — और पत्रकार सुरक्षित हों तभी लोकतंत्र सुरक्षित है। अब सबकी निगाहें भारत सरकार, सुरक्षा एजेंसियों और कानून-व्यवस्था पर टिकी हैं — क्योंकि सवाल केवल राणा अय्यूब का नहीं…यह भारत की प्रतिष्ठा और लोकतंत्र की सुरक्षा का सवाल है।

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