अर्थव्यवस्था/ अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 21 सितंबर 2026
रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत और अमेरिका के बीच तनाव अब एक नए और ज्यादा गंभीर चरण में पहुंचता दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस पर प्रतिबंधों से जुड़ा नया कानून मंजूर कर दिया है, जिसके तहत रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर अमेरिका 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति हासिल कर सकता है। इसका सीधा असर भारत के अमेरिका को होने वाले निर्यात पर पड़ सकता है और सबसे ज्यादा दबाव छोटे तथा मध्यम निर्यात कारोबारों पर आने की आशंका है।
इस नए कानून और पहले लगाए गए शुल्क के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है। पहले भारत पर रूसी तेल खरीदने के कारण जो 50 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाया गया था, वह राष्ट्रपति के कार्यकारी आदेश के माध्यम से लगाया गया था। नया प्रावधान अमेरिकी कांग्रेस से पारित कानून का हिस्सा है। इसका मतलब यह है कि इसकी कानूनी स्थिति पहले के कार्यकारी आदेश की तुलना में अलग और अधिक औपचारिक है। राष्ट्रपति को यदि किसी देश के लिए शुल्क में छूट देनी है, तो उन्हें कांग्रेस को उसका लिखित आधार भी देना होगा।
भारत के लिए समस्या इसलिए भी बड़ी है क्योंकि अमेरिका भारतीय वस्तुओं के लिए सबसे बड़े निर्यात बाजारों में से एक है। The Hindu के अनुसार, अमेरिका भारत के कुल माल निर्यात का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा लेता है। ऐसे में यदि भारतीय उत्पादों पर बहुत ऊंचा अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है तो अमेरिकी बाजार में उनकी कीमत बढ़ सकती है और भारतीय कंपनियों के लिए वहां प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो सकता है।
सबसे ज्यादा चिंता MSME क्षेत्र को लेकर है। पहले 50 प्रतिशत शुल्क के असर को कम करने के लिए कुछ भारतीय निर्यातकों और उनके अमेरिकी ग्राहकों ने अतिरिक्त लागत को आपस में बांटने की कोशिश की थी। लेकिन लंबे समय तक इस तरह लागत साझा करना कारोबार के लिए मुश्किल साबित हो सकता है। यदि शुल्क 100 प्रतिशत तक पहुंचता है तो निर्यातकों के लिए उसका बड़ा हिस्सा खुद वहन करना और भी कठिन होगा।
इस पूरे विवाद का केंद्र रूस से भारत की तेल खरीद है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक जुलाई 2026 तक भारत के तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत से अधिक थी। भारत के लिए रूसी तेल इसलिए महत्वपूर्ण रहा है क्योंकि इससे उसे बड़े पैमाने पर कच्चे तेल की आपूर्ति मिलती रही है। लेकिन अब अमेरिकी प्रतिबंधों के बढ़ते दबाव के बीच भारत को ऊर्जा सुरक्षा और अपने निर्यात हितों के बीच संतुलन बनाना होगा।
भारत के सामने मोटे तौर पर तीन रास्ते दिखाई दे रहे हैं। पहला, रूस से तेल खरीद कम करना और वैकल्पिक स्रोतों से आपूर्ति बढ़ाना। दूसरा, रूसी तेल की खरीद जारी रखते हुए अमेरिकी शुल्क का आर्थिक प्रभाव स्वीकार करना। तीसरा, अमेरिका के साथ बातचीत करके ऐसा शुल्क सुनिश्चित करने की कोशिश करना जो 100 प्रतिशत की अधिकतम सीमा से काफी नीचे हो। अंतिम विकल्प पर बातचीत का रास्ता फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक चुनौती बन सकता है।
रूसी तेल का विकल्प तुरंत तलाशना आसान नहीं होगा। पश्चिम एशिया में आपूर्ति मार्गों पर दबाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते सीमित आपूर्ति की स्थिति इस चुनौती को और बढ़ा सकती है। ऐसे समय में दूसरे देशों से अतिरिक्त तेल खरीदना महंगा भी पड़ सकता है। तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहने की स्थिति में सस्ते वैकल्पिक सौदे हासिल करना भारत के लिए आसान नहीं होगा।
भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के साथ-साथ निर्यात क्षेत्र को भी बचाना होगा। यदि एक तरफ महंगा तेल आयात करना पड़े और दूसरी तरफ अमेरिकी बाजार में भारतीय वस्तुओं पर भारी शुल्क लग जाए, तो दोनों तरफ से आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। खासकर कपड़ा, इंजीनियरिंग सामान, रत्न-जवाहरात और दूसरे श्रम-प्रधान निर्यात क्षेत्रों में इसका असर कंपनियों की लागत और अमेरिकी ग्राहकों की मांग पर पड़ सकता है।
अब भारत और अमेरिका के बीच बातचीत की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। वाणिज्य मंत्री Piyush Goyal के इस महीने के अंत में G-20 व्यापार मंत्रिस्तरीय बैठक के लिए अमेरिका जाने की योजना है। ऐसे में व्यापार और रूसी तेल का मुद्दा बातचीत के प्रमुख विषयों में शामिल हो सकता है। अमेरिकी कानून में 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने की बात है, इसलिए वास्तविक दर क्या होगी, यह आगे होने वाली नीतिगत प्रक्रिया और बातचीत पर निर्भर करेगा।
भारत के पास प्रतिक्रिया के लिए समय भी सीमित है। The Hindu की रिपोर्ट के अनुसार, नए अमेरिकी शुल्क लगाए जाने की प्रक्रिया के लिए करीब 30 दिन का समय है। इस अवधि में भारत को यह तय करना होगा कि रूसी तेल की खरीद को किस स्तर पर बनाए रखना है, वैकल्पिक आपूर्ति कितनी तेजी से बढ़ाई जा सकती है और अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यात पर संभावित असर को किस तरह कम किया जा सकता है।
रूस से सस्ता तेल भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन अब यही खरीद अमेरिकी व्यापार नीति के साथ सीधे टकराव का कारण बन रही है। आने वाले दिनों में भारत के सामने सिर्फ तेल खरीदने का सवाल नहीं होगा, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, निर्यात, MSME कारोबार और अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती होगी।



