ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | 12 मई 2026
भारतीय राजनीति इस समय एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। जिन नेताओं ने कभी कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक आंदोलन खड़े किए, जिन्होंने कांग्रेस से अलग होकर अपनी-अपनी क्षेत्रीय पार्टियां बनाईं, जिन्होंने वर्षों तक “कांग्रेस मुक्त राजनीति” की बात की, वही नेता आज प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से यह स्वीकार करते दिखाई दे रहे हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी जैसी विशाल और संसाधन-संपन्न राजनीतिक शक्ति का मुकाबला बिना कांग्रेस के संभव नहीं है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार विपक्षी दलों को एकजुट होने की सलाह दे रही हैं, जबकि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के संस्थापक शरद पवार का यह बयान कि “आने वाले वर्षों में कई दल कांग्रेस के करीब आएंगे और कुछ कांग्रेस में विलय पर भी विचार कर सकते हैं” भारतीय राजनीति के बदलते मानस का बहुत बड़ा संकेत माना जाना चाहिए। यह केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं है, बल्कि एक ऐसी स्वीकारोक्ति है जो बताती है कि क्षेत्रीय दल अब यह समझने लगे हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस की केंद्रीय भूमिका को पूरी तरह समाप्त मान लेना एक बड़ी राजनीतिक भूल थी। दरअसल पिछले एक दशक में देश की राजनीति जिस दिशा में आगे बढ़ी है, उसने विपक्षी दलों को मजबूर कर दिया है कि वे अपनी पुरानी राजनीतिक सोच पर पुनर्विचार करें। बीजेपी ने केवल चुनाव नहीं जीते, बल्कि उसने राष्ट्रीय राजनीति की धुरी को पूरी तरह अपने पक्ष में मोड़ दिया। संगठन, संसाधन, चुनावी रणनीति, मीडिया नैरेटिव, डिजिटल प्रचार और मजबूत नेतृत्व के दम पर बीजेपी ने ऐसा राजनीतिक वर्चस्व स्थापित किया कि क्षेत्रीय दलों को अपने-अपने राज्यों तक सीमित होने का खतरा महसूस होने लगा। कई राज्यों में जहां कभी कांग्रेस और क्षेत्रीय दल बीजेपी को रोकने में सक्षम थे, वहां अब विपक्षी वोटों के बिखराव ने बीजेपी को सीधा लाभ पहुंचाया। यही वजह है कि अब विपक्ष के भीतर यह समझ विकसित हो रही है कि अगर लोकतांत्रिक संतुलन बचाना है तो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर व्यापक राजनीतिक एकजुटता जरूरी होगी। और इस एकजुटता का सबसे स्वाभाविक केंद्र कांग्रेस ही बन सकती है, क्योंकि आज भी देश के लगभग हर राज्य में कांग्रेस की राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक मौजूदगी किसी न किसी रूप में कायम है।
यह भी समझना जरूरी है कि कांग्रेस केवल एक चुनावी पार्टी नहीं है, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक ढांचे का ऐतिहासिक स्तंभ रही है। आजादी की लड़ाई से लेकर संविधान निर्माण तक, संघीय व्यवस्था से लेकर लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना तक, भारत के आधुनिक राजनीतिक ढांचे को खड़ा करने में कांग्रेस की केंद्रीय भूमिका रही है। यही कारण है कि तमाम हार और राजनीतिक कमजोरियों के बावजूद कांग्रेस पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हुई। क्षेत्रीय दलों के पास अपने-अपने राज्यों में प्रभाव जरूर है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर वैचारिक लड़ाई लड़ने, संसद से सड़क तक मुद्दों को उठाने और देशव्यापी विपक्षी विमर्श तैयार करने की क्षमता अब भी कांग्रेस के पास सबसे ज्यादा दिखाई देती है। यही कारण है कि ममता बनर्जी, शरद पवार, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, उद्धव ठाकरे जैसे नेता भी अब खुलकर यह स्वीकार करने लगे हैं कि बीजेपी के खिलाफ लड़ाई केवल क्षेत्रीय राजनीति से नहीं जीती जा सकती।
शरद पवार और ममता बनर्जी के राजनीतिक इतिहास को देखें तो दोनों नेताओं ने अपने-अपने समय में कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ विद्रोह किया था। ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई और धीरे-धीरे कांग्रेस को राज्य की मुख्य राजनीति से लगभग बाहर कर दिया। शरद पवार ने विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस नेतृत्व को चुनौती देते हुए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया। दशकों तक दोनों नेताओं ने कांग्रेस के विकल्प के रूप में अपनी पहचान बनाई। लेकिन आज वही नेता कांग्रेस के साथ निकटता की बात कर रहे हैं तो इसका मतलब केवल राजनीतिक मजबूरी नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के बदलते समीकरणों की वास्तविकता है। राजनीति में स्थायी दोस्त और दुश्मन नहीं होते, बल्कि स्थायी हित होते हैं। आज विपक्ष का सबसे बड़ा हित लोकतांत्रिक संतुलन को बनाए रखना, संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को मजबूत करना और सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण को चुनौती देना बन चुका है। यही कारण है कि अब कांग्रेस विरोध की राजनीति धीरे-धीरे कमजोर होती दिखाई दे रही है।
राहुल गांधी की राजनीति को लेकर भी पिछले कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। एक समय था जब उन्हें विपक्ष के भीतर भी गंभीरता से नहीं लिया जाता था, लेकिन भारत जोड़ो यात्रा और उसके बाद लगातार बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक न्याय, किसानों, युवाओं और लोकतांत्रिक संस्थाओं के मुद्दों को उठाने के कारण राहुल गांधी विपक्षी राजनीति के एक प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे हैं। उन्होंने बीजेपी की राजनीतिक शैली और सरकार की नीतियों पर लगातार वैचारिक हमला बोला है। इससे कांग्रेस कार्यकर्ताओं के भीतर नया उत्साह पैदा हुआ और विपक्षी दलों को भी यह महसूस होने लगा कि कांग्रेस अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। यही वजह है कि आज विपक्षी राजनीति “एंटी-कांग्रेस” से “एंटी-बीजेपी” धुरी की ओर शिफ्ट होती दिखाई दे रही है।
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती उसका संतुलन है। मजबूत सरकार जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी मजबूत विपक्ष भी है। जब विपक्ष कमजोर होता है तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ता है, संस्थाओं पर दबाव बढ़ता है और राजनीतिक विमर्श एकतरफा होने लगता है। शायद यही कारण है कि अब कई विपक्षी दल यह समझने लगे हैं कि व्यक्तिगत राजनीतिक अहंकार से ऊपर उठकर व्यापक विपक्षी एकता की दिशा में बढ़ना समय की मांग है। कांग्रेस की वापसी का मतलब केवल सत्ता में वापसी नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक संतुलन की वापसी भी हो सकता है। आने वाले वर्षों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या विपक्ष वास्तव में अपने मतभेद भुलाकर एक साझा राष्ट्रीय रणनीति तैयार कर पाता है या फिर एक बार फिर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं विपक्षी राजनीति को कमजोर कर देंगी। लेकिन इतना तय है कि भारतीय राजनीति का पहिया अब एक नए मोड़ की ओर बढ़ चुका है, जहां कांग्रेस को नजरअंदाज करना शायद अब किसी भी विपक्षी दल के लिए आसान नहीं रह गया है।





