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समान नागरिक संहिता: क्या अब धर्म नहीं, संविधान तय करेगा नागरिकों के अधिकार?

ओपिनियन | डॉ शालिनी अली, समाजसेवी | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 30 जून 2026

भारत केवल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र नहीं है, बल्कि यह विश्व की सबसे प्राचीन और सबसे विविध सभ्यताओं में से एक भी है। लगभग 140 करोड़ से अधिक आबादी वाले इस देश में सैकड़ों भाषाएं, अनेक धर्म, हजारों सांस्कृतिक परंपराएं और अलग-अलग सामाजिक रीति-रिवाज एक साथ अस्तित्व में हैं। यही विविधता भारत की सबसे बड़ी पहचान और ताकत मानी जाती है। लेकिन इसी विविधता के बीच एक ऐसा संवैधानिक प्रश्न भी मौजूद है, जो पिछले 76 वर्षों से लगातार बहस का विषय बना हुआ है—क्या एक ही देश के नागरिकों के विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और भरण-पोषण जैसे नागरिक अधिकार अलग-अलग धर्मों के आधार पर तय होने चाहिए, या फिर सभी भारतीयों के लिए एक समान नागरिक कानून होना चाहिए? यही प्रश्न समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code-UCC) की पूरी बहस का केंद्र है। यह केवल एक कानूनी प्रस्ताव नहीं, बल्कि संविधान, समानता, न्याय, नागरिक अधिकार और भारत की भविष्य की सामाजिक संरचना से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण विमर्श है।

अनुच्छेद 44 केवल एक सलाह नहीं, संविधान का अधूरा संकल्प भी है

समान नागरिक संहिता कोई नया राजनीतिक नारा नहीं है। इसकी जड़ें स्वयं भारतीय संविधान में मौजूद हैं। संविधान का अनुच्छेद 44 स्पष्ट रूप से कहता है कि राज्य पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करेगा। संविधान निर्माताओं ने इसे मौलिक अधिकारों में नहीं रखा, बल्कि नीति-निर्देशक सिद्धांतों में शामिल किया, ताकि समय के साथ सामाजिक सहमति और लोकतांत्रिक संवाद के माध्यम से इसे लागू किया जा सके। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा में स्पष्ट कहा था कि व्यक्तिगत कानून संविधान से ऊपर नहीं हो सकते। उनका मानना था कि किसी भी आधुनिक लोकतंत्र में नागरिक अधिकार धर्म के आधार पर अलग-अलग नहीं होने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं हो सकता कि महिलाओं और कमजोर वर्गों के अधिकारों की अनदेखी की जाए। आज 76 वर्ष बाद भी भारत में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और भरण-पोषण जैसे मामलों में अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू हैं। इसलिए यह बहस केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संविधान के अधूरे वादे को पूरा करने की बहस भी है।

समान नागरिक संहिता आखिर है क्या, और क्या नहीं है?

समान नागरिक संहिता को लेकर देश में सबसे बड़ी गलतफहमी यह फैलाई जाती है कि इसका अर्थ किसी एक धर्म का कानून पूरे देश पर थोप देना है। वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। UCC का उद्देश्य किसी की पूजा-पद्धति, धार्मिक विश्वास, भाषा, पहनावे, खान-पान या सांस्कृतिक पहचान को बदलना नहीं है। यह केवल नागरिक जीवन से जुड़े उन मामलों के लिए समान कानून की बात करता है, जिनका संबंध विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने, संरक्षकता और भरण-पोषण से है। धर्म व्यक्ति की आस्था का विषय है, जबकि नागरिक अधिकार संविधान का विषय हैं। यदि सड़क पर चलने के नियम, कर कानून, आपराधिक कानून और चुनावी कानून सभी नागरिकों के लिए समान हो सकते हैं, तो फिर पारिवारिक नागरिक अधिकारों में समानता का प्रश्न उठना स्वाभाविक है। इसलिए UCC का मूल उद्देश्य धार्मिक एकरूपता नहीं, बल्कि नागरिक समानता है।

क्या आज वास्तव में समान अधिकार सभी को मिल रहे हैं?

यही वह प्रश्न है जो UCC की बहस को सबसे अधिक प्रासंगिक बनाता है। आज भी भारत में एक ही शहर में रहने वाली दो महिलाओं के कानूनी अधिकार केवल उनके धर्म के कारण अलग हो सकते हैं। कहीं बेटी को बराबर उत्तराधिकार मिलता है, कहीं उसका हिस्सा अलग निर्धारित है। कहीं तलाक की प्रक्रिया अलग है, तो कहीं भरण-पोषण के नियम अलग हैं। गोद लेने के अधिकार भी सभी समुदायों में समान नहीं हैं। यदि संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है, अनुच्छेद 15 धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव को रोकता है और अनुच्छेद 21 गरिमापूर्ण जीवन की गारंटी देता है, तो फिर नागरिक अधिकारों में यह असमानता कब तक बनी रहनी चाहिए? UCC के समर्थकों का तर्क है कि नागरिक अधिकारों का आधार धर्म नहीं, बल्कि संविधान होना चाहिए। महिलाओं, बच्चों और कमजोर वर्गों को समान कानूनी सुरक्षा मिलना किसी भी आधुनिक लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है।

सुप्रीम कोर्ट भी समय-समय पर कर चुका है टिप्पणी

समान नागरिक संहिता की चर्चा केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रही। सर्वोच्च न्यायालय भी कई महत्वपूर्ण मामलों में इस विषय पर टिप्पणी कर चुका है। शाह बानो मामला, सरला मुद्गल मामला और शायरा बानो जैसे ऐतिहासिक फैसलों में न्यायालय ने महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर विचार व्यक्त किया। विशेष रूप से शायरा बानो मामले में तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि धार्मिक परंपराएं संविधान से ऊपर नहीं हो सकतीं। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि UCC लागू करना संसद और सरकार का विषय है, न्यायपालिका का नहीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि संविधान और न्यायपालिका दोनों नागरिक समानता को महत्वपूर्ण मानते हैं।

लेकिन विरोध के तर्क भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं

समान नागरिक संहिता का विरोध केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं है। कई संवैधानिक विशेषज्ञ, विधि विद्वान और सामाजिक संगठन मानते हैं कि भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए किसी भी बदलाव से पहले व्यापक संवाद और सामाजिक सहमति आवश्यक है। उनका तर्क है कि समानता का अर्थ सांस्कृतिक विविधता को समाप्त करना नहीं होना चाहिए। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था कानूनी बहुलता को भी स्वीकार करती है और इसलिए किसी भी UCC का स्वरूप समावेशी, संवाद आधारित और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि यदि कानून परामर्श के बजाय राजनीतिक ध्रुवीकरण के माहौल में लाया गया, तो उसका सामाजिक विरोध बढ़ सकता है। इसलिए UCC का उद्देश्य किसी समुदाय की हार या जीत नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के लिए न्याय होना चाहिए।

क्या UCC बनाना वास्तव में इतना कठिन है?

अक्सर कहा जाता है कि भारत जैसा विविधतापूर्ण देश समान नागरिक संहिता लागू नहीं कर सकता। लेकिन यह तर्क पूरी तरह सही नहीं माना जा सकता। देश में पहले से ही स्पेशल मैरिज एक्ट, इंडियन सक्सेशन एक्ट और कई अन्य ऐसे कानून मौजूद हैं, जो सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं। 2018 में विधि आयोग के चर्चा-पत्र और 21वें विधि आयोग की सिफारिशों में भी कहा गया था कि किसी भी UCC का मसौदा व्यापक विचार-विमर्श, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक सहमति के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए। अर्थात चुनौती कठिन अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं। आवश्यकता केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति, सामाजिक संवाद और संतुलित कानून निर्माण की है।

कैसा हो समान नागरिक संहिता लागू करने का रास्ता?

यदि सरकार वास्तव में समान नागरिक संहिता लागू करना चाहती है, तो उसे जल्दबाज़ी या राजनीतिक लाभ के बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनानी होगी। सबसे पहले संसद में व्यापक बहस होनी चाहिए। महिला संगठनों, विधि विशेषज्ञों, सभी धार्मिक समुदायों, जनजातीय प्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और राज्यों को मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए। दूसरे चरण में उन विषयों से शुरुआत की जा सकती है जिन पर व्यापक सहमति पहले से मौजूद है, जैसे विवाह का अनिवार्य पंजीकरण, विवाह की समान न्यूनतम आयु, बहुविवाह पर रोक और बेटा-बेटी को समान उत्तराधिकार। इसके साथ-साथ जनजातीय समुदायों की उन पारंपरिक व्यवस्थाओं का सम्मान भी किया जाना चाहिए जो संविधान के मूल अधिकारों के अनुरूप हैं। पूरे देश में क्षेत्रीय भाषाओं में जागरूकता अभियान चलाना और न्यायपालिका तथा प्रशासन को नई व्यवस्था के अनुरूप प्रशिक्षित करना भी उतना ही आवश्यक होगा। केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं होगा, उसका निष्पक्ष और समान क्रियान्वयन भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।

निष्कर्ष: क्या नागरिक की पहचान धर्म से होगी या संविधान से?

समान नागरिक संहिता की असली बहस किसी धर्म की जीत या हार की नहीं है। यह बहस इस प्रश्न की है कि क्या भारत में किसी नागरिक के अधिकार उसकी धार्मिक पहचान से तय होंगे या संविधान से। क्या हर भारतीय महिला को समान उत्तराधिकार मिलेगा? क्या हर बच्चे को समान कानूनी सुरक्षा मिलेगी? क्या हर विवाह और हर तलाक में समान न्याय मिलेगा? क्या नागरिक अधिकारों का आधार धर्म होगा या संविधान? यदि इन प्रश्नों का उत्तर संविधान की भावना के अनुरूप देना है, तो समान नागरिक संहिता पर गंभीर, व्यापक और ईमानदार राष्ट्रीय संवाद अपरिहार्य है। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण या बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक की बहस न बनाया जाए। भारत की विविधता उसकी सबसे बड़ी शक्ति है और संविधान उसकी सबसे बड़ी पहचान। यदि समान नागरिक संहिता व्यापक सामाजिक सहमति, संवैधानिक मूल्यों, सभी समुदायों के सम्मान और लैंगिक न्याय की भावना के साथ लागू होती है, तो यह केवल एक नया कानून नहीं होगी, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में समान नागरिकता, समान अधिकार, समान न्याय और राष्ट्रीय एकता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित हो सकती है। यही अनुच्छेद 44 की मूल भावना है और यही आधुनिक भारत की सबसे बड़ी संवैधानिक आवश्यकता भी।

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