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तीन बार प्रतिबंधित वही थे जो लड़े—जिन्हें कभी छुआ नहीं गया, जो माफीवीर थे वो बांट रहे देशभक्ति का सर्टिफिकेट

एबीसी डेस्क 17 दिसंबर 2025

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ तथ्य इतने ठोस और असहज हैं कि उन पर बहस नहीं, बल्कि ईमानदार स्वीकारोक्ति की ज़रूरत है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को ब्रिटिश हुकूमत ने एक बार नहीं, दो बार नहीं, बल्कि तीन-तीन बार प्रतिबंधित किया। यह संयोग नहीं था, बल्कि इस बात का प्रमाण था कि कांग्रेस अंग्रेज़ी सत्ता के लिए वास्तविक खतरा थी। 1930 में जब महात्मा गांधी ने नमक सत्याग्रह के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया, तो ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस को पूरे भारत में अवैध घोषित कर दिया। यह वही दौर था जब लाखों भारतीयों ने कानून तोड़ने को अपना कर्तव्य समझा और जेल जाना सम्मान माना। अंग्रेज़ जानते थे कि कांग्रेस जनता को संगठित कर रही है—इसीलिए पहला प्रतिबंध लगा।

1932 में जब कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को दोबारा तेज़ किया, तो ब्रिटिश सरकार ने आपात शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए फिर से कांग्रेस पर पाबंदी लगा दी। यह प्रतिबंध सिर्फ एक संगठन पर नहीं था, बल्कि उस विचार पर था जो आज़ादी की मांग कर रहा था। कांग्रेस के दफ्तर सील किए गए, नेताओं को गिरफ्तार किया गया और कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूंसा गया। यह साफ़ संकेत था कि अंग्रेज़ों को कांग्रेस की राजनीति से डर लग रहा था। जो संगठन सत्ता से टकराता है, उसी को सत्ता कुचलती है—इतिहास का यह नियम तब भी सच था, आज भी है।

1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के साथ यह टकराव अपने चरम पर पहुंच गया। जैसे ही कांग्रेस ने “करो या मरो” का नारा दिया, ब्रिटिश सरकार ने पूरे कांग्रेस नेतृत्व को एक झटके में जेल में डाल दिया और संगठन पर फिर से प्रतिबंध लगा दिया। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल—कोई भी नहीं बचा। यह अंग्रेज़ी शासन की घबराहट का सबसे बड़ा प्रमाण था। अगर कांग्रेस अंग्रेज़ों की सहयोगी होती, तो क्या पूरी शीर्ष नेतृत्व को एक ही रात में जेल में डाला जाता? क्या संगठन को पूरी तरह अवैध घोषित किया जाता?

इसके ठीक उलट, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग—इन तीनों पर ब्रिटिश शासन के दौरान कभी कोई प्रतिबंध नहीं लगा। शून्य। एक बार भी नहीं। यह भी इतिहास का उतना ही ठोस तथ्य है। अंग्रेज़ों को इन्हें प्रतिबंधित करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी, क्योंकि ये संगठन उनके लिए कोई गंभीर राजनीतिक चुनौती नहीं थे। कई इतिहासकारों का मानना है कि ब्रिटिश रणनीति “फूट डालो और राज करो” इन्हीं संगठनों की राजनीति से सबसे ज़्यादा लाभान्वित हुई। जो सत्ता के लिए उपयोगी हो, उसे कुचलने की ज़रूरत नहीं पड़ती—यह औपनिवेशिक शासन का मूल सिद्धांत था।

आज विडंबना यह है कि वही लोग और वही वैचारिक धाराएँ, जिन पर अंग्रेज़ों ने कभी प्रतिबंध लगाना ज़रूरी नहीं समझा, देशभक्ति का सबसे ऊँचा ठेका अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रही हैं। वही कांग्रेस, जिसके कार्यकर्ता लाठियाँ खाते रहे, जेलों में सड़ते रहे और फाँसी के फंदों तक पहुँचे, आज उससे राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र मांगा जा रहा है। और यह प्रमाणपत्र मांगने वाले वही हैं जिनका स्वतंत्रता संग्राम से रिश्ता या तो मौन का रहा या सहयोग का।

देशभक्ति कोई भाषण नहीं होती, न ही सोशल मीडिया के नारे और झंडे प्रोफाइल में लगाने से तय होती है। देशभक्ति का असली पैमाना इतिहास तय करता है—किससे सत्ता डरी, किसे जेल में डाला, किसे प्रतिबंधित किया। इस कसौटी पर कांग्रेस तीन बार खरी उतरती है। बाकी संगठन? शून्य बार। इसलिए जब आज कोई “फर्जी डिग्री” वाला या इतिहास से अनभिज्ञ व्यक्ति देशभक्ति का सर्टिफिकेट बाँटने निकलता है, तो उसे पहले 1930, 1932 और 1942 के पन्ने पलटने चाहिए।

भारत को देशभक्ति के नए ठेकेदारों की ज़रूरत नहीं है। इस देश की देशभक्ति जेलों में लिखी गई है, आंदोलनों में गढ़ी गई है और फाँसी के तख्तों पर साबित हुई है। और उस इतिहास के सामने आज के खोखले प्रमाणपत्र अपने आप बेकार हो जाते हैं।

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