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यूपी त्रासदी, पुतिन का संदेश और लोकतंत्र के सामने बड़ा सवाल : क्या भारतीय मीडिया सत्ता के आगे पूरी तरह बेबस है?

ओपिनियन | गुंजन सिन्हा, वरिष्ठ पत्रकार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 15 मई 2026

उत्तर प्रदेश में आंधी, बारिश और बिजली गिरने से 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। कई जिलों में घर तबाह हो गए, पेड़ और बिजली के खंभे सड़कों पर गिर पड़े, खेत बर्बाद हो गए और सैकड़ों परिवारों की जिंदगी एक रात में बदल गई। यह कोई सामान्य मौसम अपडेट नहीं था, बल्कि एक बड़ी मानवीय त्रासदी थी। लेकिन इस त्रासदी से भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह रही कि देश के बड़े टीवी चैनलों और मुख्यधारा मीडिया के एक बड़े हिस्से ने इस खबर को उस गंभीरता से नहीं उठाया, जिसकी यह हकदार थी। विडंबना यह है कि उत्तर प्रदेश में हुई इस भारी तबाही पर सबसे तीखी और संवेदनशील प्रतिक्रिया रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की तरफ से सामने आई, जिन्होंने भारत की राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को संवेदना संदेश भेजकर दुख जताया। इसके बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने कटाक्ष करते हुए कहना शुरू कर दिया कि भारत में हुई 100 से ज्यादा मौतों की जानकारी देश के टीवी चैनलों से नहीं, बल्कि रूस के राष्ट्रपति के संदेश से मिल रही है। यही वह क्षण था जिसने भारतीय मीडिया की प्राथमिकताओं और उसकी भूमिका पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया।

लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है, क्योंकि उसका काम सत्ता की प्रशंसा करना नहीं बल्कि जनता की आवाज बनना होता है। लेकिन आज का दृश्य कई बार बिल्कुल उल्टा दिखाई देता है। ऐसा लगता है कि देश का एक बड़ा टीवी मीडिया अब खबरों से ज्यादा नैरेटिव मैनेजमेंट में व्यस्त हो चुका है। जब जनता मुश्किल में होती है, तब टीवी स्टूडियो में अक्सर चीखती बहसें चल रही होती हैं। जब किसान परेशान होते हैं, युवा बेरोजगारी से जूझ रहे होते हैं, पेपर लीक से लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर लगता है या फिर किसी राज्य में प्राकृतिक आपदा से दर्जनों लोगों की जान चली जाती है, तब भी कई चैनलों की प्राथमिकता वही रहती है जो सत्ता के लिए सुविधाजनक हो। यही कारण है कि आज लोगों के बीच यह धारणा तेजी से मजबूत हुई है कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अब जनता से ज्यादा सरकार की छवि बचाने में लगा हुआ है।

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उत्तर प्रदेश की इस त्रासदी ने उस धारणा को और मजबूत किया है। सवाल केवल यह नहीं कि कितनी मौतें हुईं, बल्कि यह है कि उन मौतों की आवाज देश तक कितनी ईमानदारी से पहुंचाई गई। अगर यही घटना किसी विपक्ष शासित राज्य में हुई होती, तो संभवतः टीवी स्क्रीन पर लगातार “कौन जिम्मेदार?” वाली बहसें चलतीं, हेलीकॉप्टर से ली गई तस्वीरें दिखाई जातीं और प्रशासनिक विफलता पर बड़े-बड़े सवाल उठाए जाते। लेकिन जब मामला ऐसे राज्य का हो जहां सत्ता की राजनीतिक असहजता जुड़ी हो, तब अचानक कई चैनलों पर “संयम” और “संतुलन” दिखाई देने लगता है। यही दोहरा रवैया जनता को सबसे ज्यादा परेशान करता है। लोकतंत्र में मीडिया की विश्वसनीयता उसकी निष्पक्षता से बनती है, लेकिन जब दर्शकों को यह महसूस होने लगे कि खबरों का चयन राजनीतिक सुविधा के आधार पर हो रहा है, तब भरोसा कमजोर पड़ने लगता है।

सबसे बड़ा संकट यह है कि आज भारतीय टीवी मीडिया का एक हिस्सा रिपोर्टिंग से ज्यादा प्रदर्शन में बदलता जा रहा है। एंकर पत्रकार कम और राजनीतिक योद्धा ज्यादा दिखाई देने लगे हैं। स्टूडियो में चीखना, विपक्ष को कठघरे में खड़ा करना और हर मुद्दे को राष्ट्रवाद बनाम विरोध में बदल देना आसान हो गया है, लेकिन सत्ता से असहज सवाल पूछना धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर “गोदी मीडिया” जैसे शब्द आम हो गए हैं। भले यह शब्द राजनीतिक हो, लेकिन इसके पीछे जनता की गहरी नाराजगी और अविश्वास छिपा है। लोग अब यह पूछने लगे हैं कि अगर मीडिया सरकार से सवाल नहीं पूछेगा, तो फिर लोकतंत्र में जवाबदेही कैसे बचेगी? मीडिया का काम केवल सरकार की उपलब्धियां दिखाना नहीं, बल्कि यह भी देखना है कि जिन लोगों ने अपनों को खोया, क्या उन्हें राहत मिली? क्या प्रशासन तैयार था? क्या मौसम विभाग की चेतावनियों को गंभीरता से लिया गया? क्या भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोका जा सकता है?

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यह कहना गलत नहीं होगा कि आज भारत में दो तरह का मीडिया दिखाई देता है। एक वह जो जमीन पर जाकर लोगों का दर्द दिखाने की कोशिश करता है, और दूसरा वह जो एयरकंडीशंड स्टूडियो में बैठकर सत्ता का मूड पढ़ता है। यही वजह है कि लोग अब धीरे-धीरे वैकल्पिक डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया की तरफ जा रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि मुख्यधारा मीडिया कई बार असली मुद्दों से ध्यान भटकाने में ज्यादा दिलचस्पी रखता है। हालांकि यह भी सच है कि पूरे भारतीय मीडिया को एक ही रंग में रंगना उचित नहीं होगा। आज भी कई पत्रकार ऐसे हैं जो जोखिम उठाकर जमीनी सच्चाई सामने ला रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज उस शोर में दब जाती है, जहां टीआरपी और राजनीतिक नजदीकियां अक्सर पत्रकारिता पर भारी पड़ती नजर आती हैं।

उत्तर प्रदेश की यह त्रासदी केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि भारतीय मीडिया, राजनीति और लोकतंत्र — तीनों के लिए एक आईना थी। पुतिन का संवेदना संदेश इसलिए चर्चा में नहीं आया कि वह रूस के राष्ट्रपति हैं, बल्कि इसलिए आया क्योंकि उसने भारतीय मीडिया की चुप्पी को और ज्यादा उजागर कर दिया। लोकतंत्र में मीडिया अगर जनता की पीड़ा से दूर होता गया और सत्ता की सुविधा के हिसाब से खबरें चुनता रहा, तो सबसे बड़ा नुकसान जनता के भरोसे का होगा। और जिस दिन जनता का भरोसा टूट जाता है, उस दिन लोकतंत्र का चौथा स्तंभ केवल एक चमकदार स्टूडियो सेट बनकर रह जाता है।

One Comment

  1. साॅरी. ये मैंने लिखा नहीं है. बस फाॅरवर्ड किया है. क्रेडिट मुझे न दीजिए.

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