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BRICS की दिल्ली जीत के बाद असली इम्तिहान: क्या भारत घोषणापत्र को जमीन पर उतार पाएगा?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 13 सितंबर 2026

सहमति मिल गई, अब कामयाबी साबित करनी होगी

नई दिल्ली में ब्रिक्स का 18वां शिखर सम्मेलन भारत के लिए निश्चित रूप से एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि लेकर आया है। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच पश्चिम एशिया के संकट को लेकर मतभेद, रूस की अपनी संवेदनशीलताएं, चीन-अमेरिका तनाव और दुनिया में बढ़ते व्यापारिक टकराव के बीच 140 बिंदुओं वाले नई दिल्ली घोषणापत्र पर सर्वसम्मति बनाना आसान काम नहीं था। ब्रिक्स में किसी एक सदस्य की आपत्ति भी साझा दस्तावेज को रोक सकती थी और इसीलिए अंतिम दौर तक बातचीत चलती रही। अंततः सदस्य देशों ने पश्चिम एशिया पर ऐसी संतुलित भाषा स्वीकार की जिसमें किसी एक देश को सीधे निशाना बनाने के बजाय संयम, संप्रभुता, नागरिकों की सुरक्षा तथा संवाद और कूटनीति को समाधान का रास्ता बताया गया। लेकिन यहीं से भारत के लिए असली चुनौती शुरू होती है। घोषणापत्र बनाना कूटनीति का पहला चरण है; उसे वास्तविक आर्थिक, रणनीतिक और संस्थागत ताकत में बदलना कहीं ज्यादा कठिन काम है।

सबसे बड़ी चुनौती—ब्रिक्स को मतभेदों का मंच बनने से बचाना

ब्रिक्स जितना बड़ा हुआ है, उतना ही विविध और जटिल भी हुआ है। आज इसमें भारत, चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के साथ ईरान, यूएई, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया जैसे देश हैं। इन देशों के आर्थिक हित, सुरक्षा प्राथमिकताएं और विदेश नीतियां एक जैसी नहीं हैं। यही वजह है कि विस्तार ने ब्रिक्स का वैश्विक वजन तो बढ़ाया है, लेकिन सर्वसम्मति बनाना कठिन भी किया है। रॉयटर्स के विश्लेषण के अनुसार विस्तार के बाद अलग-अलग राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और विदेश नीति के मतभेदों ने कई बार सहमति बनाने की प्रक्रिया को मुश्किल बनाया है। भारत के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह ब्रिक्स को ऐसा मंच बना सकता है जहां मतभेद मौजूद रहें, लेकिन वे संगठन की कार्यक्षमता को पंगु न बना दें। क्योंकि अगर हर बड़ा संकट ब्रिक्स को साझा बयान तक पहुंचने के लिए कई दिनों की खींचतान में डाल देगा, तो संगठन का राजनीतिक वजन धीरे-धीरे कम हो सकता है।

140 बिंदु बहुत हैं, लेकिन असली सवाल है—कितने लागू होंगे?

नई दिल्ली घोषणापत्र में आतंकवाद, वैश्विक शासन सुधार, व्यापार, ऊर्जा, तकनीक, विकास, गाजा, वित्तीय सहयोग और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार जैसे अनेक विषय शामिल हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय घोषणापत्रों की सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि शब्दों और जमीन के बीच बहुत बड़ा अंतर रह जाता है। भारत की कूटनीतिक जीत तभी स्थायी उपलब्धि बनेगी जब घोषणापत्र के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर समयबद्ध कार्रवाई दिखाई दे। उदाहरण के लिए व्यापार बढ़ाने की बात हुई है, भुगतान प्रणालियों को जोड़ने की बात हो रही है, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की बात हो रही है और विकास वित्त को मजबूत करने की जरूरत पर जोर है। भारत के वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार 2024 में ब्रिक्स देशों के बीच वस्तु व्यापार 1.17 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुका था, लेकिन सरकार खुद मानती है कि इसमें अभी बहुत बड़ी अप्रयुक्त संभावना मौजूद है। इसलिए अगली चुनौती घोषणापत्र लिखना नहीं, उस 1.17 ट्रिलियन डॉलर के व्यापार को कहीं अधिक बड़ा, संतुलित और टिकाऊ बनाना है।

भारत के सामने चीन की चुनौती सबसे कठिन है

ब्रिक्स की सफलता का सबसे बड़ा परीक्षण शायद भारत-चीन संबंधों में होगा। एक तरफ दोनों देश एक ही मंच पर वैश्विक शासन सुधार, व्यापार और ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने की बात करते हैं, दूसरी तरफ सीमा विवाद और रणनीतिक अविश्वास अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। रॉयटर्स के अनुसार 2025 में भारत-चीन द्विपक्षीय व्यापार 155.6 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा, लेकिन भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 100 अरब डॉलर से अधिक रहा। यानी राजनीतिक तनाव के बावजूद आर्थिक निर्भरता बनी हुई है। भारत के लिए यह एक बेहद कठिन संतुलन है—चीन को पूरी तरह अलग करके ब्रिक्स को मजबूत नहीं किया जा सकता, लेकिन चीन के साथ आर्थिक संबंध बढ़ाते हुए भारत अपने व्यापार घाटे, महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं और रणनीतिक निर्भरता को नजरअंदाज भी नहीं कर सकता। ब्रिक्स की मेज पर सहयोग और सीमा पर सावधानी—भारत को दोनों एक साथ चलाने होंगे।

डॉलर को चुनौती देना आसान नहीं

ब्रिक्स के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों की चर्चा लगातार बढ़ रही है। भारत ने भी सदस्य और साझेदार देशों से भुगतान प्रणालियों को जोड़ने तथा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने की अपील की है। लेकिन यहां भावनात्मक नारों और आर्थिक वास्तविकता के बीच फर्क समझना होगा। डॉलर की जगह कोई दूसरी मुद्रा या ब्रिक्स की कोई भुगतान व्यवस्था तुरंत नहीं ले सकती। इसके लिए गहरे और भरोसेमंद वित्तीय बाजार, स्वतंत्र और स्थिर मुद्रा व्यवस्था, बड़े पैमाने की भुगतान संरचना, पूंजी की आवाजाही और राजनीतिक विश्वास चाहिए। ब्रिक्स देशों की अर्थव्यवस्थाएं और वित्तीय व्यवस्थाएं बहुत अलग हैं। इसलिए ‘डॉलर खत्म, ब्रिक्स शुरू’ जैसी घोषणा आसान है; डॉलर पर निर्भरता कम करने की व्यावहारिक व्यवस्था बनाना बेहद कठिन।

ब्रिक्स पे और स्थानीय मुद्राएं—अगला बड़ा टेस्ट

अगर ब्रिक्स वास्तव में वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है तो उसे केवल डॉलर की आलोचना नहीं करनी होगी, बल्कि बेहतर विकल्प देना होगा। क्रॉस-बॉर्डर भुगतान तेज, सस्ता और सुरक्षित होना चाहिए। वित्तीय संस्थाओं के बीच तकनीकी तालमेल होना चाहिए और भुगतान व्यवस्था इतनी भरोसेमंद होनी चाहिए कि कारोबारी और बैंक उसे बड़े पैमाने पर अपनाएं। ब्रिक्स के वित्त प्रमुखों ने भुगतान प्रणालियों की इंटरऑपरेबिलिटी और तेज, कम लागत वाले सीमा-पार भुगतान पर जोर दिया है। यही वह क्षेत्र है जहां भारत तकनीक, डिजिटल भुगतान और अपनी सफल सार्वजनिक डिजिटल अवसंरचना के अनुभव से बड़ी भूमिका निभा सकता है। लेकिन इस नेतृत्व को प्रस्ताव से उत्पाद और फिर उत्पाद से वैश्विक व्यवस्था में बदलना होगा।

ऊर्जा सुरक्षा—भारत के लिए सबसे सीधी चुनौती

पश्चिम एशिया का संकट ब्रिक्स के आर्थिक एजेंडे को सीधे ऊर्जा सुरक्षा से जोड़ देता है। भारत की अर्थव्यवस्था के लिए तेल और गैस की स्थिर आपूर्ति बेहद महत्वपूर्ण है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ने का असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहता; इससे तेल की कीमत, समुद्री बीमा, जहाजों का किराया, खाद और पूरी आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो सकती है। नई दिल्ली घोषणापत्र ने वैश्विक व्यापार, आपूर्ति श्रृंखलाओं और ऊर्जा के निर्बाध प्रवाह पर जोर दिया है। भारत की ब्रिक्स ऊर्जा बैठक में भी ऊर्जा सुरक्षा, विविधीकृत आपूर्ति और मजबूत ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं को प्राथमिकता दी गई थी। इसलिए भारत को ब्रिक्स को ऊर्जा सुरक्षा का व्यावहारिक मंच बनाना होगा—सिर्फ बयान देने का नहीं।

ग्लोबल साउथ की आवाज—लेकिन नेतृत्व किसके हाथ में?

भारत ने ब्रिक्स के माध्यम से ग्लोबल साउथ की अधिक भागीदारी की बात को मजबूती से आगे बढ़ाया है। लेकिन यहां भी एक चुनौती है। भारत यह नहीं चाहता कि ब्रिक्स केवल चीन और रूस के नेतृत्व वाला पश्चिम-विरोधी मंच बन जाए। वहीं चीन के पास विशाल आर्थिक क्षमता, व्यापारिक नेटवर्क और वैश्विक परियोजनाओं का अपना प्रभाव है। इसलिए भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि ब्रिक्स में ग्लोबल साउथ का नेतृत्व बहुध्रुवीय रहे, किसी एक देश का प्रभुत्व न बने। यही भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की असली परीक्षा होगी। भारत के लिए ब्रिक्स का अर्थ चीन के पीछे चलना नहीं, बल्कि चीन के साथ बैठकर अपने और अन्य विकासशील देशों के हितों को मजबूत करना होना चाहिए।

अमेरिका को नाराज किए बिना BRICS को मजबूत करना

भारत की अगली बड़ी चुनौती वॉशिंगटन के साथ संतुलन की है। नई दिल्ली घोषणापत्र ने एकतरफा टैरिफ और आर्थिक प्रतिबंधों की आलोचना की है, लेकिन भारत खुद अमेरिका के साथ व्यापार, तकनीक, निवेश और रक्षा संबंधों को महत्वपूर्ण मानता है। इसलिए भारत के लिए ब्रिक्स को अमेरिका-विरोधी सैन्य या आर्थिक गुट में बदलना रणनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है। मौजूदा विश्लेषण भी ब्रिक्स को सीधे ‘अमेरिका-विरोधी गठबंधन’ के रूप में नहीं देखता; इसकी एक प्रमुख भूमिका वैश्विक व्यवस्था में सुधार और विकासशील देशों के लिए अधिक विकल्प बनाने की है। भारत की ताकत इसी संतुलन में है—वॉशिंगटन से संबंध भी, मॉस्को से संबंध भी, बीजिंग से संवाद भी और तेहरान तथा खाड़ी देशों के साथ अपने हितों की रक्षा भी।

रूस और चीन के बीच भारत की स्वतंत्र जगह कितनी मजबूत रहेगी?

रूस ब्रिक्स को पश्चिमी प्रभुत्व से अलग एक मजबूत आर्थिक और राजनीतिक मंच बनाना चाहता है। चीन भी ब्रिक्स को वैश्विक शासन में बड़ी भूमिका देने की बात कर रहा है। रॉयटर्स के अनुसार रूस ने ब्रिक्स को तकनीक, बुनियादी ढांचे, भुगतान और निवेश में ज्यादा व्यावहारिक आर्थिक गठजोड़ की दिशा में आगे ले जाने की बात कही है। वहीं चीन 2027 में ब्रिक्स की अध्यक्षता और अगले शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। इसका मतलब साफ है—भारत की अध्यक्षता खत्म होते ही ब्रिक्स का एजेंडा उसके हाथ में नहीं रहेगा। भारत की असली सफलता तभी मानी जाएगी जब वह 2026 के बाद भी अपनी प्राथमिकताओं को ब्रिक्स की संस्थागत दिशा में टिकाए रख सके।

अगली चुनौती—भारत के बाद चीन की अध्यक्षता

यह बिंदु विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत ने 2026 में ब्रिक्स के एजेंडे में ऊर्जा, तकनीक, व्यापार, ग्लोबल साउथ और वैश्विक शासन सुधार को आगे बढ़ाया है। लेकिन 2027 में चीन अध्यक्ष होगा। इसलिए भारत को अभी से यह सोचना होगा कि कौन-सी पहलों को स्थायी संस्थागत रूप दिया जाए ताकि अध्यक्ष बदलने के साथ वे कमजोर न पड़ें। यही किसी भी अंतरराष्ट्रीय संगठन में नेतृत्व की असली कसौटी होती है। अच्छा अध्यक्ष सम्मेलन सफल कराता है; मजबूत अध्यक्ष ऐसी संस्थाएं छोड़ता है जो उसके बाद भी काम करती रहें।

ब्रिक्स का विस्तार—ताकत भी, कमजोरी का खतरा भी

ब्रिक्स का विस्तार उसके वैश्विक प्रतिनिधित्व को बढ़ाता है, लेकिन हर नए सदस्य के साथ हितों का दायरा भी बढ़ता है। रॉयटर्स के अनुसार आज समूह दुनिया की 40 प्रतिशत से अधिक आबादी और लगभग एक-चौथाई वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। साथ ही उसका सबसे उल्लेखनीय संस्थागत परिणाम न्यू डेवलपमेंट बैंक है, जिसने लगभग 43 अरब डॉलर की परियोजनाओं को वित्त दिया है। लेकिन संख्या बड़ी होना अपने आप में शक्ति नहीं बनाता। अगर इतने बड़े समूह में हर मुद्दे पर अलग-अलग राष्ट्रीय हित हावी होने लगें तो संगठन की निर्णय क्षमता कमजोर हो सकती है। ब्रिक्स को बड़ा ही नहीं, कार्यक्षम भी बनाना होगा।

न्यू डेवलपमेंट बैंक को अगला स्तर देना होगा

अगर ब्रिक्स पश्चिमी वित्तीय संस्थाओं के विकल्प या कम से कम मजबूत पूरक की बात करता है, तो न्यू डेवलपमेंट बैंक की भूमिका और बढ़ानी होगी। विकासशील देशों के लिए बुनियादी ढांचा, ऊर्जा, डिजिटल नेटवर्क, परिवहन, जलवायु और औद्योगिक परियोजनाओं में तेज और कम लागत वाला वित्त उपलब्ध कराना इसकी सबसे उपयोगी भूमिका हो सकती है। लेकिन इसके लिए पूंजी, परियोजना क्षमता, पारदर्शिता और जोखिम प्रबंधन को मजबूत करना होगा। ब्रिक्स की विश्वसनीयता डॉलर के खिलाफ बयान देने से कम और विकासशील देशों को वास्तविक वित्त उपलब्ध कराने से ज्यादा बढ़ेगी।

व्यापार बढ़े, लेकिन भारत का घाटा भी घटे

भारत के लिए ब्रिक्स व्यापार का दूसरा बड़ा सवाल है—सिर्फ कुल व्यापार बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। भारत को यह भी देखना होगा कि व्यापार संतुलित हो, भारतीय कंपनियों को बाजार मिले और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भारत की आयात निर्भरता कम हो। वाणिज्य मंत्रालय ने खुद ब्रिक्स देशों के बीच बाजार खोलने, नियामकीय प्रक्रियाएं सरल करने और कृषि, दवा, इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, सेवाओं और नई तकनीक में सहयोग बढ़ाने की जरूरत बताई है। अगर ब्रिक्स का व्यापार बढ़ता है लेकिन भारत लगातार भारी व्यापार घाटे में रहता है, तो यह भारत के लिए पूरी सफलता नहीं होगी। नई दिल्ली को ब्रिक्स को निर्यात बढ़ाने का मंच भी बनाना होगा, सिर्फ आयात के नए स्रोत खोजने का नहीं।

घोषणापत्र में आतंकवाद की बात, अब कार्रवाई कितनी?

पहलगाम आतंकवादी हमले की ब्रिक्स घोषणापत्र में कड़ी निंदा भारत के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन आतंकवाद के खिलाफ केवल बयान पर्याप्त नहीं हैं। अगर ब्रिक्स आतंकवाद के वित्तपोषण, सुरक्षित ठिकानों और दोहरे मानदंडों के खिलाफ वास्तव में साझा नीति बनाना चाहता है, तो उसे सूचना साझाकरण, वित्तीय निगरानी, सीमा-पार आतंकवाद और आतंकवादी संगठनों के खिलाफ ठोस सहयोग तक जाना होगा। भारत के लिए अगली चुनौती यही होगी कि आतंकवाद पर बनी सहमति कागज से निकलकर व्यवहार में दिखाई दे।

गाजा और पश्चिम एशिया—BRICS की विश्वसनीयता की परीक्षा

गाजा पर ब्रिक्स ने युद्धविराम, मानवीय सहायता, जबरन विस्थापन के विरोध और दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन किया है। लेकिन पश्चिम एशिया में अलग-अलग ब्रिक्स सदस्य देशों के अपने-अपने रणनीतिक हित हैं। इसलिए इस मंच को केवल बयान जारी करने से आगे बढ़कर मानवीय सहायता, पुनर्निर्माण और राजनीतिक समाधान में व्यावहारिक भूमिका तलाशनी होगी। भारत के लिए यहां भी संतुलन कठिन है—इजरायल के साथ मजबूत रणनीतिक संबंध, अरब देशों के साथ ऊर्जा और आर्थिक साझेदारी तथा फिलिस्तीन के साथ ऐतिहासिक समर्थन, तीनों को एक साथ बनाए रखना होगा। यही भारतीय कूटनीति की सबसे कठिन परीक्षा है।

भारत की कूटनीतिक जीत को स्थायी शक्ति में बदलना होगा

नई दिल्ली घोषणापत्र पर सहमति निश्चित रूप से भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक सफलता है। लेकिन इसे अंतिम उपलब्धि मानना गलती होगी। भारत ने इस बार अलग-अलग हितों वाले देशों को एक दस्तावेज पर खड़ा कर दिया; अब उसे उन्हें साझा परियोजनाओं पर खड़ा करना है। भारत ने संवाद और कूटनीति को समाधान बताया; अब उसे ब्रिक्स के जरिए संवाद की संस्थागत क्षमता बनानी है। भारत ने वैश्विक दक्षिण की आवाज की बात की; अब उसे विकास वित्त, तकनीक, व्यापार और ऊर्जा में ठोस परिणाम देने हैं। भारत ने डॉलर पर निर्भरता कम करने की बहस को आगे बढ़ाया; अब उसे भरोसेमंद भुगतान ढांचा बनाना है। यानी दिल्ली में मिली कूटनीतिक जीत अब एक बहुत बड़े काम की शुरुआत है।

असली सवाल—BRICS घोषणापत्र से शक्ति बनेगा या सिर्फ कागज रहेगा?

मेरी नजर में भारत के लिए ब्रिक्स 2026 की सबसे बड़ी उपलब्धि 140 बिंदुओं वाला दस्तावेज नहीं, बल्कि इतनी विविधता और तनाव के बावजूद उस दस्तावेज पर सहमति बनाना है। लेकिन असली इतिहास तब लिखा जाएगा जब यही सहमति व्यापार में दिखेगी, ऊर्जा सुरक्षा में दिखेगी, भुगतान व्यवस्था में दिखेगी, आतंकवाद के खिलाफ सहयोग में दिखेगी, विकास वित्त में दिखेगी और ग्लोबल साउथ की वास्तविक राजनीतिक ताकत में बदलेगी। BRICS को अगर सिर्फ पश्चिमी व्यवस्था की आलोचना करने वाला मंच बना दिया गया तो उसकी सीमा जल्दी सामने आ जाएगी। लेकिन अगर यह वैकल्पिक वित्त, सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला, बेहतर व्यापार, तकनीकी सहयोग और अधिक प्रतिनिधित्व वाली वैश्विक व्यवस्था खड़ी करता है, तो इसका महत्व कई गुना बढ़ सकता है।

दिल्ली ने BRICS को सहमति दे दी है। अब भारत की असली चुनौती है—उस सहमति को शक्ति में कैसे बदला जाए। यही 2026 के BRICS की सबसे बड़ी परीक्षा है।

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