राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | लद्दाख | 13 सितंबर 2026
9 सितंबर की बैठक पर आमने-सामने दावे
लद्दाख में संवैधानिक अधिकारों, स्टेटहुड और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर चल रही बहस अब एक नए विवाद में बदल गई है। लद्दाख से पूर्व BJP सांसद थुपस्तान छेवांग ने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और कुछ अन्य लोगों पर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया है। छेवांग के मुताबिक, 9 सितंबर को गृह मंत्रालय, लद्दाख के नागरिक समाज के प्रतिनिधियों और केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन के बीच हुई बैठक “फलदायी” रही थी। उनका यह बयान उन प्रतिनिधियों के रुख से अलग है, जिन्होंने बैठक को निराशाजनक बताया था।
छेवांग बोले—बैठक बेकार नहीं थी
छेवांग ने कहा कि बैठक में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई और इसे असफल बताना सही तस्वीर पेश नहीं करता। वह खुद गृह मंत्रालय के निमंत्रण पर 9 सितंबर की उपसमिति बैठक में शामिल हुए थे। उनके अनुसार, बातचीत को लेकर बाहर जो नकारात्मक धारणा बनाई जा रही है, वह पूरी तरह सही नहीं है। यही बात अब लद्दाख की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर रही है।
वांगचुक और दूसरे नेताओं की राय अलग
दूसरी तरफ, लद्दाख एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस जैसे संगठनों से जुड़े प्रतिनिधियों ने बैठक को निराशाजनक बताया। यानी एक ही बैठक को लेकर दो बिल्कुल अलग तस्वीरें सामने आ रही हैं। एक पक्ष इसे बातचीत आगे बढ़ने का संकेत बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे अपेक्षाओं के अनुरूप परिणाम नहीं देने वाली बैठक मान रहा है।
देरी के लिए MHA जिम्मेदार नहीं—छेवांग
छेवांग ने एक और महत्वपूर्ण बात कही। उनका दावा है कि लद्दाख के मुद्दों को सुलझाने में देरी के लिए केवल गृह मंत्रालय को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। उनके अनुसार, नागरिक समाज के भीतर अलग-अलग राय और मतभेद भी बातचीत को प्रभावित कर रहे हैं। यानी अब बहस सिर्फ केंद्र और लद्दाख के बीच नहीं रह गई है, बल्कि लद्दाख के अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक समूहों के बीच भी मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं।
2020 से संवैधानिक सुरक्षा की मांग
थुपस्तान छेवांग खुद उन शुरुआती लद्दाखी नेताओं में रहे हैं, जिन्होंने 2020 में क्षेत्र के लिए संवैधानिक सुरक्षा की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया था। उस समय अनुच्छेद 370 से जुड़े बदलावों के बाद जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन हुआ और लद्दाख अलग केंद्रशासित प्रदेश बना। इसके बाद से लद्दाख में राजनीतिक अधिकार, संवैधानिक सुरक्षा और स्थानीय लोगों की भूमिका को लेकर मांगें लगातार उठती रही हैं।
लद्दाख में असली सवाल क्या है?
लद्दाख के लोगों के बीच लंबे समय से यह सवाल बना हुआ है कि क्षेत्र को किस तरह की राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्था मिलेगी। स्टेटहुड की मांग के साथ-साथ विधानसभा, भूमि, रोजगार और स्थानीय अधिकारों से जुड़े मुद्दे भी चर्चा में रहे हैं। केंद्र और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत का उद्देश्य इन्हीं मुद्दों पर रास्ता तलाशना है। लेकिन जब बातचीत में शामिल पक्ष ही उसके परिणाम को लेकर अलग-अलग तस्वीर पेश करें, तो स्वाभाविक रूप से लोगों के बीच भ्रम बढ़ता है।
क्या लद्दाख की आवाज बंट रही है?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या लद्दाख की मांगों के लिए आंदोलन करने वाले संगठनों के बीच रणनीति को लेकर मतभेद बढ़ रहे हैं? अगर एक समूह बैठक को फलदायी बताता है और दूसरा उसे निराशाजनक, तो केंद्र के सामने लद्दाख की सामूहिक मांग किस रूप में रखी जाएगी?
अब जरूरत टकराव की नहीं, साफ जवाब की है
लद्दाख के लोग लंबे समय से अपने भविष्य को लेकर स्पष्टता चाहते हैं। ऐसे में केंद्र सरकार और लद्दाख के प्रतिनिधियों—दोनों की जिम्मेदारी है कि बातचीत केवल बैठकों और बयानों तक सीमित न रहे। जनता को साफ बताया जाना चाहिए कि किस मुद्दे पर कितनी प्रगति हुई, किन मांगों पर सहमति बनी और किन मुद्दों पर अभी मतभेद कायम हैं।
सबसे बड़ा सवाल
क्या 9 सितंबर की बैठक वास्तव में समाधान की दिशा में कदम थी, जैसा पूर्व सांसद थुपस्तान छेवांग कह रहे हैं? या फिर लद्दाख के दूसरे प्रमुख संगठनों का दावा सही है कि बैठक से कोई ठोस रास्ता नहीं निकला?
लद्दाख की जनता को अब आरोप-प्रत्यारोप नहीं, अपने अधिकारों और भविष्य पर स्पष्ट जवाब चाहिए।



