सुमन कुमार | नई दिल्ली 24 नवंबर 2025
स्थायी नौकरी का अंत: मजदूरों के भविष्य पर काला बादल
नई दिल्ली: देश में कल से लागू हुए नए लेबर कोड ने करोड़ों कर्मचारियों और मजदूरों के भविष्य पर सीधा हमला कर दिया है। जिस स्थायी नौकरी पर एक परिवार की पूरी आर्थिक नींव टिकी होती है, जिस पर घर चलता है, बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की दवाइयां और जीवन की सुरक्षा निर्भर रहती है—मोदी सरकार ने उसे एक झटके में खत्म करने की दिशा में निर्णायक कदम उठा लिया है। सरकार ने खुलेआम उद्योगपतियों और कॉरपोरेट घरानों को ‘हायर एंड फायर’ का अधिकार दे दिया है, जिससे अब कंपनियां मनमर्जी से कर्मचारियों को रख और निकाल सकेंगी, बिना किसी मुआवजे, बिना किसी प्रक्रिया और बिना किसी डर के। विपक्ष का आरोप है कि यह सरकार मजदूरों के भरोसे को तोड़कर पूरी तरह पूंजीपतियों की दास बन चुकी है।
फिक्स्ड टर्म कॉन्ट्रैक्ट: सुविधाओं का झांसा, शोषण का रास्ता
सरकार और मीडिया यह प्रचारित कर रहे हैं कि फिक्स्ड टर्म कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को भी स्थायी कर्मियों जैसी सुविधाएं मिलेंगी, लेकिन असलियत छिपाई जा रही है। फिक्स्ड कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरी करने वाले कर्मचारियों को नौकरी से हटाए जाने पर कोई कम्पेन्सेशन नहीं मिलेगा, जबकि स्थायी कर्मचारियों को कानूनन यह सुरक्षा उपलब्ध थी। यानी कंपनियां अब जरूरत पड़ने पर कर्मचारियों को एक नोटिस थमाकर एक मिनट में बाहर का रास्ता दिखा सकती हैं। यह प्रावधान पूरी तरह से कंपनियों के हित में है, जिससे उन्हें मजदूरों के भविष्य की कोई जिम्मेदारी नहीं उठानी पड़ेगी। सरकार इसे सुधार बता रही है, जबकि असल में यह मजदूरों के अधिकारों का सबसे बड़ा हनन है।
300 कर्मचारियों तक बिना मंजूरी छंटनी: शोषण की खुली लाइसेंसिंग
नए लेबर कोड में सबसे बड़ा बदलाव यह किया गया है कि पहले 100 से अधिक कर्मचारियों वाली कंपनियों को छंटनी या फैक्ट्री बंद करने के लिए सरकार की मंजूरी लेनी पड़ती थी, लेकिन अब यह सीमा बढ़ाकर 300 कर दी गई है। इसका मतलब है कि देश की लगभग 75% कंपनियां अब बिना किसी सरकारी अनुमति के कर्मचारियों की छंटनी कर सकेंगी। मालिक अब बेरोकटोक फैक्ट्री बंद कर सकते हैं, कर्मचारियों को बाहर निकाल सकते हैं और मजदूरों की दशकों पुरानी नौकरी सुरक्षा व्यवस्था को खत्म कर सकते हैं। इसे विशेषज्ञ मजदूरों के अधिकारों पर सीधा हमला बता रहे हैं, जिसका असर आने वाले वर्षों में विनाशकारी हो सकता है।
ट्रेड यूनियन का अस्तित्व संकट में: मजदूरों की आवाज़ दबाई गई
इस कदम का सबसे बड़ा असर ट्रेड यूनियनों पर पड़ेगा, जो मजदूरों के संघर्ष और अधिकारों की रक्षा की रीढ़ रही हैं। अब छोटी अवधि के कॉन्ट्रैक्ट पर रखे गए कर्मचारी यूनियन का हिस्सा बन ही नहीं पाएंगे, जिससे यूनियनों की सदस्यता और प्रभाव दोनों तेजी से घटेंगे। यह स्थिति कंपनियों को पूरी छूट दे देगी कि वे मजदूरों पर किसी भी प्रकार का अनुशासनात्मक दंड थोपें, प्रमोशन में भेदभाव करें, वेतन घटाएं या अनुचित शर्तें लागू करें। यह बदलाव सिर्फ कानून का नहीं, मजदूर आंदोलन की आत्मा पर प्रहार है।
काम के घंटे बढ़े: श्रम सुधार या आधुनिक दासता?
नए लेबर कोड के तहत फैक्टरियों में काम के घंटे 9 से बढ़ाकर 12 घंटे और दुकानों तथा प्रतिष्ठानों में 9 से बढ़ाकर 10 घंटे कर दिए गए हैं। कई राज्यों में यह पहले ही लागू किया जा चुका है। यानी मजदूर अब अधिक समय तक काम करेंगे, लेकिन नौकरी की सुरक्षा, भविष्य की गारंटी और स्वास्थ्य सुरक्षा के बिना। विशेषज्ञ इसे आधुनिक दास प्रथा का रूप बताते हैं, जहां मजदूरों से अधिकतम श्रम लिया जाएगा, लेकिन उनके अधिकारों को न्यूनतम कर दिया जाएगा। सरकार इसे आर्थिक सुधार बता रही है, जबकि मजदूर इसे शोषण का वैध रूप कह रहे हैं।
गिग इकॉनमी की ओर तेज़ बढ़ता भारत: स्थायी रोजगार का पतन
ये प्रावधान भारत की अर्थव्यवस्था को तेजी से गिग इकॉनमी में बदल देंगे, जहां कर्मचारी स्थायी नहीं बल्कि कॉन्ट्रैक्ट आधारित होंगे। इसका सीधा मतलब है—न नौकरी की स्थिरता, न भविष्य सुरक्षित, न यूनियन की शक्ति और न वेतन की गारंटी। युवा पीढ़ी फ्रीलांसरों, अस्थायी मजदूरों और ‘ज़रूरत पड़ने पर इस्तेमाल’ होने वाली कार्यशक्ति में तब्दील हो जाएगी। यह स्थिति भारत के सामाजिक और आर्थिक ढांचे के लिए खतरनाक मानी जा रही है, जिससे बेरोजगारी और असुरक्षा और बढ़ेगी।
सरकार किसके साथ—मजदूर या उद्योगपति?
नए लेबर कोड यह साफ दिखाते हैं कि मोदी सरकार का झुकाव पूरी तरह उद्योगपतियों और बड़े कॉरपोरेट समूहों की ओर है। मजदूरों की सुरक्षा, अधिकार और सम्मान को ताक पर रखकर सरकार ने उन लोगों को खुश किया है जिनके पास पूंजी और राजनीतिक प्रभाव है। यह दिन इतिहास में दर्ज होगा—जब एक सरकार ने विकास के नाम पर अपने मेहनतकश वर्ग को बाजार की हवस के हवाले कर दिया और स्थायी रोजगार की अवधारणा को खत्म कर दिया।
अब बड़ा सवाल यह है—मजदूर न्याय के लिए कहाँ जाएं?
क्योंकि सरकार तो पहले ही उद्योगपतियों के आगे आत्मसमर्पण कर चुकी है।




