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हिमालय तेजी से पिघल रहा है, भारत की अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहा बड़ा खतरा! 40 हजार ग्लेशियरों में सिर्फ 21 की लगातार निगरानी

पर्यावरण/ जलवायु संकट | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू/ नई दिल्ली | 15 सितंबर 2026

हिमालय अब सिर्फ बर्फ का पहाड़ नहीं, भारत की अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है

हिमालय तेजी से बदल रहा है और इसका असर सिर्फ पहाड़ों तक सीमित रहने वाला नहीं है। नई रिसर्च ने चेतावनी दी है कि ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, ग्लेशियल झीलें बड़ी और अस्थिर हो रही हैं, पहाड़ों की ढलान कमजोर हो रही है और कई इलाकों में निगरानी व्यवस्था अभी भी बेहद सीमित है। इसका सीधा असर भारत की पानी, खेती, बिजली, पर्यटन और पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब नेपाल और तिब्बत में आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र की बढ़ती संवेदनशीलता को दुनिया के सामने ला दिया है। इन बाढ़ों में 1,300 से ज्यादा लोगों की मौत हुई और बड़े पैमाने पर तबाही हुई।

एक दशक में ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार 65% बढ़ी

सिस्टमक की नई रिपोर्ट के अनुसार, हिमालयी ग्लेशियर अब करीब एक दशक पहले की तुलना में 65% ज्यादा तेजी से अपना बर्फीला द्रव्यमान खो रहे हैं। इसका मतलब केवल इतना नहीं है कि पहाड़ों पर बर्फ कम हो रही है। ग्लेशियरों के पीछे हटने से कई जगह उनके पीछे पानी की बड़ी झीलें बन रही हैं, जिन्हें बर्फ, चट्टानों और मलबे से बने प्राकृतिक बांध रोककर रखते हैं। अगर ये प्राकृतिक बांध टूटते हैं तो अचानक आने वाली बाढ़ पूरे गांव, सड़कें, पुल, बिजली परियोजनाएं और दूसरी बुनियादी सुविधाएं तबाह कर सकती है।

40 हजार ग्लेशियर, लेकिन लगातार निगरानी सिर्फ 21 की

सबसे बड़ी चिंता निगरानी को लेकर है। रिपोर्ट के मुताबिक हिमालय-कश्मीर-कराकोरम क्षेत्र में अनुमानित 40,000 ग्लेशियर हैं, लेकिन इनमें से केवल करीब 21 ग्लेशियरों की विस्तृत और लगातार निगरानी हो रही है। सवाल बेहद सीधा है—जब पहाड़ों पर बदलाव इतनी तेजी से हो रहा है, तो हजारों ग्लेशियरों की स्थिति के बारे में हमारे पास लगातार और पर्याप्त जानकारी क्यों नहीं है?

किस ग्लेशियर में झील तेजी से बढ़ रही है, किस प्राकृतिक बांध में दरार आ रही है और किस घाटी में अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है—इन सवालों का जवाब समय रहते मिलना बेहद जरूरी है।

भारत की जमीन का 18%, लेकिन आपदाओं में हिस्सेदारी करीब 35%

रिपोर्ट के अनुसार भारत के कुल भूभाग का करीब 18% हिस्सा हिमालयी क्षेत्र में आता है, लेकिन देश में होने वाली आपदाओं में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 35% है। यानी हिमालय का क्षेत्रफल सीमित होने के बावजूद आपदाओं का जोखिम बहुत बड़ा है।

इस क्षेत्र में भूस्खलन, अचानक बाढ़, ग्लेशियल झीलों के फटने, बादल फटने और पहाड़ों के अस्थिर होने जैसी घटनाएं लगातार गंभीर चुनौती बन रही हैं। जलवायु परिवर्तन इस जोखिम को और बढ़ा रहा है।

भारत में 56 ग्लेशियल झीलें ‘बहुत ज्यादा जोखिम’ वाली

भारत सरकार ने जुलाई में संसद को बताया था कि वैज्ञानिक आकलन के बाद 56 ग्लेशियल झीलों को ‘बहुत ज्यादा जोखिम’ वाली श्रेणी में रखा गया है। यह आकलन 2025 में भारतीय हिमालयी क्षेत्र की 189 उच्च जोखिम वाली झीलों के अध्ययन के बाद किया गया था।

केंद्रीय जल आयोग भारत के हिमालयी नदी बेसिन में 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,485 ग्लेशियल झीलों की निगरानी कर रहा है। यह निगरानी महत्वपूर्ण है, लेकिन नए शोध में सामने आया व्यापक खतरा यह सवाल भी उठाता है कि क्या मौजूदा निगरानी व्यवस्था तेजी से बदलते हिमालय के लिए पर्याप्त है।

सिक्किम और उत्तराखंड पहले ही दे चुके हैं बड़ी चेतावनी

भारत पहले ही इस खतरे का दर्द झेल चुका है। 2023 में सिक्किम में ग्लेशियल झील के फटने से आई अचानक बाढ़ में कम से कम 70 लोगों की मौत हुई थी। सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान हुआ था।

इससे पहले 2021 में उत्तराखंड की ऋषिगंगा और धौलीगंगा घाटियों में आई भीषण बाढ़ में 200 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। इन घटनाओं ने दिखाया कि हिमालय में पानी का अचानक बढ़ना कितनी तेजी से जान-माल और बुनियादी ढांचे को तबाह कर सकता है।

खतरा सिर्फ बाढ़ का नहीं, पहाड़ों के कमजोर होने का भी

हिमालय में खतरा केवल ग्लेशियल झीलों के फटने तक सीमित नहीं है। तापमान बढ़ने से परमाफ्रॉस्ट, यानी जमीन के लंबे समय से जमे हुए हिस्से भी पिघल रहे हैं। इसके कारण ऊंचे पहाड़ों की ढलानें और चट्टानी क्षेत्र अस्थिर हो सकते हैं।

इसका मतलब है कि भविष्य में एक ही इलाके में कई तरह की आपदाएं एक-दूसरे को जन्म दे सकती हैं। पहले ग्लेशियर पिघले, फिर झील बनी, फिर प्राकृतिक बांध टूटा, उसके बाद बाढ़ आई और बाढ़ के साथ भूस्खलन हुआ—ऐसे एक के बाद एक होने वाले खतरों की संभावना बढ़ रही है।

हिमालय का पानी भारत की अर्थव्यवस्था को चलाता है

हिमालय का सबसे बड़ा महत्व इसकी बर्फ और पहाड़ों से भी आगे है। यही क्षेत्र दक्षिण एशिया की कई बड़ी नदियों को पानी देता है और इन नदियों पर करोड़ों लोगों की जिंदगी और अर्थव्यवस्था निर्भर है।

नई रिपोर्ट का अनुमान है कि हिमालय से मिलने वाला पानी भारत की अर्थव्यवस्था के करीब 20% हिस्से को सहारा देता है। गेहूं, चावल, चाय, जलविद्युत और धार्मिक पर्यटन जैसी गतिविधियां इस पानी और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हैं।

हिमालय से कमाई बड़ी, लेकिन पहाड़ी राज्यों को हिस्सा कितना?

रिपोर्ट का एक बेहद महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि हिमालयी पानी भारत की अर्थव्यवस्था के करीब 20% हिस्से को सहारा देता है, लेकिन पर्वतीय राज्यों को इस आर्थिक मूल्य का केवल करीब 5% हिस्सा मिलता है।

यही सवाल अब नीति बनाने वालों के सामने है—अगर पहाड़ पूरे देश की अर्थव्यवस्था, पानी और ऊर्जा को सहारा दे रहे हैं, तो क्या पहाड़ों और वहां रहने वाले लोगों के संरक्षण में पर्याप्त निवेश हो रहा है?

 

‘थर्ड पोल’ है हिमालय

लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के ग्रांथम रिसर्च इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष अर्थशास्त्री लॉर्ड निकोलस स्टर्न ने हिमालय को “थर्ड पोल” यानी तीसरा ध्रुव बताया है। उनके मुताबिक आर्कटिक और अंटार्कटिका के विपरीत यहां करोड़ों लोग रहते हैं और उनके जीवन का सीधा संबंध इस प्राकृतिक व्यवस्था से है।

यही वजह है कि हिमालय में होने वाला बदलाव केवल पर्यावरण की खबर नहीं है। यह पानी, खेती, बिजली, रोजगार, पर्यटन, सड़क और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से जुड़ा सवाल है।

 

पर्यटन भी बनेगा चुनौती या समाधान?

भारतीय हिमालयी क्षेत्र में हर साल करीब 40 करोड़ पर्यटक यात्राएं होने का अनुमान रिपोर्ट में दिया गया है। पर्यटन से पहाड़ी राज्यों को रोजगार और आय मिलती है, लेकिन अगर पर्यटन बिना योजना के बढ़ता गया तो पहाड़ों पर दबाव भी बढ़ सकता है।

शोधकर्ताओं का सुझाव है कि लक्ष्य केवल ज्यादा से ज्यादा पर्यटक लाना नहीं होना चाहिए। पर्यटन से पैदा होने वाली आय का ज्यादा हिस्सा स्थानीय इलाकों में वापस लगाया जाए, ताकि सड़क, पानी, कचरा प्रबंधन, आपदा सुरक्षा और स्थानीय रोजगार मजबूत हो सकें।

काले कार्बन से भी पिघल रही है बर्फ

हिमालयी ग्लेशियरों के लिए एक और बड़ा खतरा ब्लैक कार्बन यानी काला कार्बन है। रिपोर्ट के अनुसार, हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने का करीब एक-तिहाई हिस्सा ब्लैक कार्बन से जुड़ा हो सकता है।

मैदानी इलाकों में ईंट भट्ठों और दूसरे स्रोतों से निकलने वाली कालिख हवा के साथ पहाड़ों तक पहुंच सकती है। जब यह काली धूल बर्फ पर जमती है तो बर्फ ज्यादा सूर्य की गर्मी सोखती है और उसके पिघलने की रफ्तार बढ़ सकती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ग्रीनहाउस गैसों की तरह यह समस्या केवल वैश्विक स्तर पर कार्रवाई मांगने वाली नहीं है। ब्लैक कार्बन पर भारत और उसके पड़ोसी देश सीधे कार्रवाई कर सकते हैं।

‘पीक वाटर’ के बाद क्या होगा?

आईसीआईएमओडी के अनुसार हिंदू कुश हिमालय की ज्यादातर नदी घाटियों में इस सदी के मध्य के आसपास ‘पीक वाटर’ की स्थिति आने की उम्मीद है। इसका मतलब है कि किसी समय ग्लेशियरों से नदियों में आने वाला पानी अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच सकता है, लेकिन इसके बाद जैसे-जैसे ग्लेशियरों का आकार घटेगा, लंबे समय में ग्लेशियर से मिलने वाले पानी में कमी आ सकती है।

आज जिस पानी को हम लगातार उपलब्ध मान रहे हैं, वह भविष्य में उसी मात्रा में उपलब्ध रहेगा या नहीं—यह भारत की जल सुरक्षा के लिए बेहद बड़ा सवाल है।

नेपाल और तिब्बत की बाढ़ ने खतरे की घंटी बजा दी

हाल में नेपाल और तिब्बत में आई विनाशकारी बाढ़ ने इस पूरे संकट को और गंभीर बना दिया है। हजारों लोग मारे गए या लापता हुए, गांव तबाह हुए और बड़ी संख्या में लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा। यह घटना दिखाती है कि हिमालयी क्षेत्र में आपदा किसी एक देश की सीमा के भीतर रुकने वाली नहीं है।

आईसीआईएमओडी के महानिदेशक पेमा ग्याम्त्शो के अनुसार ग्लेशियरों के पीछे हटने, परमाफ्रॉस्ट और ऊंचे पहाड़ों की ढलानों के अस्थिर होने से नीचे रहने वाले समुदायों और बुनियादी ढांचे पर जटिल और एक-दूसरे से जुड़े खतरे बढ़ रहे हैं।

हिमालय की कोई सीमा नहीं—भारत, चीन, नेपाल सबको साथ आना होगा

हिमालय भारत, नेपाल, भूटान, चीन और पाकिस्तान समेत कई देशों में फैला हुआ है। ग्लेशियर किसी सीमा रेखा को नहीं मानते और न ही बाढ़, भूस्खलन या मौसम से जुड़े खतरे पासपोर्ट देखकर आगे बढ़ते हैं।

इसीलिए विशेषज्ञों का कहना है कि सीमा पार निगरानी, साझा वैज्ञानिक जानकारी, एक-दूसरे को समय पर चेतावनी और संयुक्त आपदा तैयारी बेहद जरूरी है। अगर किसी ग्लेशियल झील में खतरा पैदा होता है तो उसके नीचे रहने वाले लोगों को सीमा के इस पार या उस पार होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

अब सिर्फ राहत नहीं, पहले से तैयारी की जरूरत

नई रिपोर्ट ने दस प्राथमिक बदलाव सुझाए हैं। इनमें ब्लैक कार्बन कम करना, ग्लेशियरों की निगरानी बढ़ाना, आपदा की शुरुआती चेतावनी व्यवस्था मजबूत करना और पहाड़ों में पर्यटन का तरीका बदलना शामिल है।

सबसे जरूरी बात यह है कि सरकारों को पहले से तय करना होगा कि अगर किसी ग्लेशियल झील का स्तर तेजी से बढ़े तो किसे कब खाली कराया जाएगा, कौन-सी सड़क बंद होगी, कौन-सा पुल सुरक्षित रहेगा और किन बिजली परियोजनाओं को तुरंत सुरक्षा दी जाएगी।

आपदा आने के बाद तैयारी शुरू करने का समय बहुत कम होता है।

हिमालय बचाना मतलब भारत का भविष्य बचाना

हिमालय को सिर्फ पर्यटन, तीर्थयात्रा या खूबसूरत पहाड़ों के रूप में देखने का समय अब खत्म हो चुका है। यह भारत की जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक सुरक्षा का आधार है। अगर ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं, ग्लेशियल झीलें अस्थिर होती हैं और पहाड़ों की निगरानी कमजोर रहती है, तो आने वाले वर्षों में इसकी कीमत केवल पहाड़ी राज्यों को नहीं बल्कि पूरे भारत को चुकानी पड़ सकती है।

सवाल बहुत बड़ा है—जब हिमालय भारत की अर्थव्यवस्था के करीब 20% हिस्से को पानी का सहारा देता है, तो क्या उसके संरक्षण पर होने वाला निवेश भी उसी गंभीरता से बढ़ना नहीं चाहिए?

और सबसे बड़ा सवाल—क्या भारत हर बड़ी बाढ़ के बाद राहत और मुआवजे का इंतजार करेगा, या हिमालय के ग्लेशियरों, झीलों और पहाड़ों को बचाने के लिए ऐसी व्यवस्था बनाएगा जो आपदा आने से पहले ही खतरे की घंटी बजा दे?

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