पर्यावरण/ तकनीक | ABC NATIONAL NEWS | लंदन | 15 सितंबर 2026
1980 का फैशन लौटा, लेकिन इसके पीछे चल रही है मशीनों की भारी कीमत
सोशल मीडिया पर इन दिनों 1980 के दशक की तस्वीरों का जबरदस्त ट्रेंड चल रहा है। लोग अपनी आज की तस्वीरों को कुछ सेकंड में पुराने जमाने के कपड़ों, हेयरस्टाइल, रंग और कैमरा इफेक्ट के साथ बदल रहे हैं। तस्वीर ऐसी लगती है जैसे वह 40 साल पहले किसी पुराने कैमरे से खींची गई हो। लेकिन असल में यह किसी पुराने फोटो एलबम से निकली तस्वीर नहीं, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई द्वारा बनाई गई तस्वीर होती है। देखने में यह ट्रेंड भले ही मजेदार और बिल्कुल आसान लगता हो, लेकिन इसके पीछे विशाल डेटा सेंटर, हजारों शक्तिशाली कंप्यूटर, भारी बिजली खपत और उन्हें ठंडा रखने के लिए पानी की जरूरत होती है। यानी मोबाइल स्क्रीन पर एक तस्वीर बनाने का काम जितना छोटा दिखाई देता है, उसके पीछे की पूरी तकनीकी व्यवस्था उतनी ही बड़ी है।
एक क्लिक के पीछे हजारों कंप्यूटरों का काम
जब कोई व्यक्ति एआई को लिखता है कि उसकी तस्वीर को 1980 के अंदाज में बदल दिया जाए, तो यह काम मोबाइल के अंदर नहीं होता। अनुरोध इंटरनेट के जरिए दूर बैठे डेटा सेंटर तक पहुंचता है। इन डेटा सेंटरों में बड़ी संख्या में शक्तिशाली जीपीयू और दूसरे कंप्यूटर सिस्टम मिलकर तस्वीर तैयार करते हैं। इसके लिए बहुत ज्यादा गणना यानी कंप्यूटिंग करनी पड़ती है। इन मशीनों से गर्मी पैदा होती है, इसलिए डेटा सेंटरों को लगातार ठंडा रखना पड़ता है और इसके लिए बड़ी मात्रा में ऊर्जा और कई जगह पानी का इस्तेमाल होता है।
यानी सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली एक छोटी-सी तस्वीर के पीछे बिजली, इंटरनेट नेटवर्क, कंप्यूटर चिप, डेटा सेंटर और कूलिंग सिस्टम की पूरी दुनिया काम कर रही होती है।
एक एआई तस्वीर में करीब 2.9 वाट-घंटे बिजली
हगिंग फेस और कार्नेगी मेलॉन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के संयुक्त अध्ययन में 17 आधुनिक एआई मॉडलों की ऊर्जा खपत का अध्ययन किया गया। अध्ययन में पाया गया कि अलग-अलग एआई मॉडल एक जैसा काम करने के बावजूद ऊर्जा की खपत में बहुत बड़ा अंतर दिखा सकते हैं। कुछ मामलों में यह अंतर 46 गुना तक पाया गया।
अध्ययन के अनुसार एक सामान्य एआई तस्वीर बनाने में औसतन करीब 2.9 वाट-घंटे बिजली खर्च होती है। इसे समझने का आसान तरीका यह है कि यह लगभग उतनी ऊर्जा है जितनी एक स्मार्टफोन को शून्य से 100 प्रतिशत तक चार्ज करने में लग सकती है। तस्वीर की गुणवत्ता या रिजॉल्यूशन बढ़ाने पर ऊर्जा की जरूरत और बढ़ जाती है। अध्ययन के मुताबिक तस्वीर का रिजॉल्यूशन दोगुना करने पर कंप्यूटिंग ऊर्जा की जरूरत करीब 1.3 से 4.7 गुना तक बढ़ सकती है।
सिर्फ बिजली नहीं, हर तस्वीर के पीछे पानी भी खर्च होता है
एआई का पर्यावरणीय असर केवल बिजली तक सीमित नहीं है। डेटा सेंटरों में कंप्यूटरों को ठंडा रखने के लिए पानी का इस्तेमाल भी किया जाता है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, रिवरसाइड के शोधकर्ता शाओलेई रेन की टीम के अध्ययन के अनुसार एक सामान्य एआई तस्वीर बनाने की प्रक्रिया में सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से करीब 29 मिलीलीटर पानी खर्च या वाष्पित हो सकता है। यह लगभग दो बड़े चम्मच पानी के बराबर है।
एक तस्वीर के लिए दो चम्मच पानी सुनने में बहुत कम लगता है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब यही काम करोड़ों और अरबों बार होता है। लोग एक तस्वीर बनाकर रुकते नहीं हैं। बालों का रंग बदलते हैं, कपड़े बदलते हैं, रोशनी बदलते हैं, चेहरा बदलते हैं, बैकग्राउंड बदलते हैं और बार-बार नई तस्वीर बनाते हैं। हर बार एआई को दोबारा काम करना पड़ता है।
अरबों तस्वीरें बनेंगी तो पानी की कीमत भी अरबों लीटर होगी
शोध के अनुसार 2027 तक दुनिया की एआई आधारभूत व्यवस्था सालाना 4.2 अरब से 6.6 अरब घन मीटर पानी तक इस्तेमाल कर सकती है। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया के कई हिस्से पहले से पानी की कमी से जूझ रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार नए बनाए जा रहे डेटा सेंटरों में से दो-तिहाई से ज्यादा ऐसे क्षेत्रों में स्थित हैं जहां पहले से पानी का दबाव काफी ज्यादा है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि एआई कितना स्मार्ट हो रहा है। सवाल यह भी है कि उसे चलाने के लिए पानी कहां से आएगा और उस पानी की कीमत कौन चुकाएगा?
2030 तक डेटा सेंटरों की बिजली खपत 950 टेरावाट-घंटे तक?
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी यानी आईईए के आंकड़ों के अनुसार दुनिया के डेटा सेंटरों ने 2024 में करीब 415 टेरावाट-घंटे बिजली खर्च की थी, जो दुनिया की कुल बिजली मांग का करीब 1.5 प्रतिशत थी। 2025 में यह आंकड़ा करीब 485 टेरावाट-घंटे तक पहुंचने का अनुमान है।
एआई के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के साथ यह खपत और बढ़ने की संभावना है। आईईए के अनुमान के मुताबिक 2030 तक दुनिया के डेटा सेंटरों की बिजली खपत करीब 950 टेरावाट-घंटे तक पहुंच सकती है।
इसका मतलब साफ है—एआई सिर्फ इंटरनेट की दुनिया नहीं बदल रहा, वह दुनिया की बिजली व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ा रहा है।
टेक्स्ट और तस्वीर में जमीन-आसमान का अंतर
एक साधारण सवाल पूछना और एआई से तस्वीर या वीडियो बनवाना एक जैसा काम नहीं है। गूगल के शोधकर्ताओं की एक पारदर्शिता रिपोर्ट के अनुसार उसके जेमिनी मॉडल में एक सामान्य टेक्स्ट अनुरोध के लिए करीब 0.24 वाट-घंटे बिजली और 0.26 मिलीलीटर पानी का अनुमान दिया गया था।
लेकिन यह साधारण टेक्स्ट के लिए आधारभूत आंकड़ा है। तस्वीर और वीडियो जैसे जटिल कामों में संसाधनों की जरूरत बहुत ज्यादा हो सकती है। यही कारण है कि एआई का बढ़ता इस्तेमाल जितना ज्यादा दृश्य सामग्री बनाने की ओर जाएगा, ऊर्जा और पानी की मांग भी उतनी ही बढ़ सकती है।
भारत में भी डेटा सेंटरों को लेकर पानी का सवाल
इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है। आंध्र प्रदेश में गूगल की 15 अरब डॉलर की डेटा सेंटर परियोजना को लेकर स्थानीय स्तर पर पर्यावरण और पानी से जुड़े सवाल उठाए जा रहे हैं। चिंता यह है कि बड़े डेटा सेंटरों के लिए भारी मात्रा में पानी और बिजली की जरूरत स्थानीय संसाधनों पर दबाव डाल सकती है।
यही चुनौती दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी दिखाई दे रही है। अमेरिका के कई ग्रामीण क्षेत्रों में भी बड़े तकनीकी समूहों के डेटा सेंटर स्थापित करने की योजनाओं को लेकर स्थानीय लोगों ने पर्यावरण और पानी से जुड़े सवाल उठाए हैं।
नेपाल के लिए एआई एक अवसर भी, लेकिन सावधानी जरूरी
नेपाल के पास जलविद्युत की बड़ी क्षमता है। अतिरिक्त जलविद्युत उपलब्ध होने के कारण देश में भविष्य में पर्यावरण के लिहाज से बेहतर डेटा सेंटर बनाने की संभावना भी देखी जा सकती है। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि केवल बिजली उपलब्ध होने के कारण बड़े डेटा सेंटरों को बिना मजबूत पर्यावरणीय नियमों के अनुमति देना सही नहीं होगा।
क्योंकि डेटा सेंटर सिर्फ बिजली नहीं लेते। उनके लिए जमीन, पानी, कूलिंग सिस्टम, नेटवर्क और बड़ी मात्रा में हार्डवेयर भी चाहिए। इसलिए नेपाल जैसे देश के लिए सवाल यह होना चाहिए कि एआई अर्थव्यवस्था से कितना फायदा मिलेगा और उसके बदले पर्यावरण पर कितना दबाव पड़ेगा।
क्या हर एआई तस्वीर के लिए पर्यावरण कीमत चुकाएगा?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नेपाल में 1980 के दशक की तस्वीरों के इस ट्रेंड में कितने लोगों ने हिस्सा लिया और कुल कितनी एआई तस्वीरें बनाई गईं, इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इसलिए नेपाल में इस ट्रेंड की कुल बिजली या पानी की खपत का सटीक अनुमान लगाना संभव नहीं है।
लेकिन एक बात स्पष्ट है—अगर नेपाल में इस्तेमाल होने वाले एआई के सर्वर किसी दूसरे देश में हैं, तब भी पर्यावरणीय प्रभाव केवल उस देश की समस्या नहीं है। बिजली उत्पादन से होने वाला कार्बन उत्सर्जन और पानी की खपत का असर पूरी दुनिया के जलवायु तंत्र पर पड़ता है।
दोष सिर्फ यूजर का नहीं, कंपनियों की भी जिम्मेदारी
एआई की पर्यावरणीय कीमत को समझते समय सिर्फ आम लोगों को दोष देना आसान होगा, लेकिन तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। एआई कंपनियां ऐसे उत्पाद बनाती हैं जिन्हें ज्यादा से ज्यादा लोग इस्तेमाल करें, बार-बार इस्तेमाल करें और अपनी बनाई सामग्री सोशल मीडिया पर साझा करें। ज्यादा इस्तेमाल का मतलब कंपनियों के लिए ज्यादा कारोबार भी हो सकता है।
एआई शोधकर्ता महेश कुशवाहा का कहना है कि चर्चा केवल व्यक्तिगत यूजर को दोष देने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। एआई कंपनियों के उत्पाद डिजाइन, कारोबार के प्रोत्साहन और पर्यावरण के प्रति उनकी जवाबदेही पर भी उतनी ही गंभीर चर्चा होनी चाहिए।
एआई रोकना समाधान नहीं, उसे जिम्मेदार बनाना जरूरी है
यह सवाल एआई के खिलाफ होने का नहीं है। एआई चिकित्सा, शिक्षा, विज्ञान, खेती, उद्योग और रोजमर्रा के जीवन में बड़े फायदे दे सकता है। लेकिन अगर एक तकनीक तेजी से दुनिया की अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन रही है, तो उसके पीछे लगने वाले बिजली, पानी और हार्डवेयर के वास्तविक खर्च को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
1980 के दशक की एक खूबसूरत तस्वीर बनाने के लिए एआई का इस्तेमाल करना गलत नहीं है। लेकिन अगर अरबों लोग हर दिन लाखों-करोड़ों तस्वीरें बनाते हैं, तो उस सुविधा की पर्यावरणीय कीमत पर सवाल उठाना भी जरूरी है।
आखिर सवाल यही है—हम एआई से पुरानी दुनिया की तस्वीर तो बना रहे हैं, लेकिन क्या हम अनजाने में भविष्य की दुनिया के पानी और बिजली पर भारी बोझ तो नहीं डाल रहे?
और क्या एआई कंपनियों को यह बताने की जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए कि एक तस्वीर, एक वीडियो या एक एआई अनुरोध के पीछे वास्तव में कितनी बिजली, कितना पानी और कितने प्राकृतिक संसाधन खर्च हो रहे हैं?



