परवेज खान | इंदौर 11 जनवरी 2026
इंदौर | देश आज़ादी के 100 साल पूरे होने के सपने देख रहा है। हर मंच से कहा जा रहा है कि 2047 तक भारत एक विकसित राष्ट्र होगा—आर्थिक रूप से मजबूत, तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर और नागरिकों के जीवन स्तर में ऐतिहासिक सुधार के साथ। लेकिन इसी सपने के बीच, इंदौर से उठती एक हकीकत इस चमकदार तस्वीर पर गहरे सवाल खड़े कर रही है। जिस शहर को देश का सबसे स्वच्छ शहर कहा जाता रहा है, वहीं पीने के पानी के जहरीला होने की खबरें न सिर्फ चिंता बढ़ाती हैं, बल्कि यह भी पूछने पर मजबूर करती हैं कि क्या विकास का मतलब सिर्फ आंकड़े और पुरस्कार रह गए हैं?
इंदौर की पहचान वर्षों से “स्वच्छता मॉडल” के तौर पर गढ़ी गई। पोस्टर, विज्ञापन, अंतरराष्ट्रीय मंच—हर जगह इंदौर की तारीफ हुई। लेकिन अब जब पानी में हानिकारक रसायन, गंदे नालों का रिसाव और स्वास्थ्य पर असर की बातें सामने आ रही हैं, तो यह साफ हो जाता है कि साफ सड़कों के नीचे छिपी गंदगी पर किसी की नजर नहीं गई। सवाल यह नहीं है कि इंदौर फेल हो गया, सवाल यह है कि हमने विकास को सिर्फ दिखावे तक क्यों सीमित कर दिया?
पीने का पानी किसी भी आदमी की बुनियादी जरूरत है। अगर वही सुरक्षित नहीं है, तो बड़े-बड़े विकास दावे खोखले लगने लगते हैं। जिन इलाकों में लोगों को पेट, त्वचा और लीवर से जुड़ी बीमारियों की शिकायतें बढ़ रही हैं, वहां 2047 का सपना एक मज़ाक जैसा लगता है। क्या एक विकसित भारत की कल्पना में यह शामिल नहीं है कि हर आदमी नल से निकलते पानी पर भरोसा कर सके? या फिर यह भरोसा भी अब “प्रोजेक्ट”, “टेंडर” और “फाइल” के बीच कहीं दब गया है?
यह मामला सिर्फ इंदौर तक सीमित नहीं है। इंदौर तो एक प्रतीक है—उस शहरी मॉडल का, जहां इंफ्रास्ट्रक्चर दिखता है, लेकिन पर्यावरण और स्वास्थ्य की अनदेखी होती है। नदी, तालाब और ज़मीन—सब पर विकास का बोझ डाला गया, लेकिन यह नहीं सोचा गया कि इसका असर सीधे आदमी के शरीर पर पड़ेगा। 2047 की बात करने वाली सरकारें अगर आज के पानी, हवा और मिट्टी की जिम्मेदारी नहीं लेतीं, तो आने वाला भविष्य और भी ज़हरीला होगा।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ऐसे मुद्दों पर जवाबदेही तय नहीं होती। नगर निगम, राज्य सरकार, जल आपूर्ति एजेंसियां—हर कोई एक-दूसरे की तरफ उंगली उठाता है, लेकिन आम आदमी को सिर्फ बीमारी और डर मिलता है। जांच समितियां बनती हैं, रिपोर्ट्स आती हैं, पर ज़मीन पर हालात वही रहते हैं। क्या 2047 का भारत ऐसा होगा, जहां आदमी को अपने ही शहर में जीने से डर लगे?
इंदौर से उठता यह सवाल असल में पूरे देश से जुड़ा है—क्या हम विकास को सिर्फ इवेंट और रैंकिंग में मापेंगे, या आदमी की सेहत और सम्मान को भी उसका हिस्सा मानेंगे? अगर आज पानी ज़हरीला है और हम चुप हैं, तो कल हवा और खाना भी सवालों के घेरे में होंगे। 2047 का सपना तभी मायने रखेगा, जब वह आदमी के गिलास में साफ पानी, उसके बच्चे के लिए सुरक्षित भविष्य और उसके जीवन में भरोसे के रूप में दिखे—वरना यह सपना भी कहीं किसी फाइल में दफन होकर रह जाएगा।




