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घाट की गहराई और सियासत की सतह

इंट्रो: जब ‘टोटकों के उस्ताद’ ने नाटक पहचान लिया

लीजिए — प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश आ गया। और इस बार उन्होंने शब्दों से नहीं, चुप्पी से जवाब दिया। विडंबना यह है कि मोदी खुद भी ऐसे प्रतीकात्मक ‘टोटके’ अपनाने में माहिर रहे हैं — कभी मंदिर की सीढ़ियों पर झाड़ू लगाना, कभी काशी में मां गंगा को प्रणाम कर डुबकी लगाना, तो कभी सिर पर गंगाजल रखकर आशीर्वाद लेना। लेकिन इस बार हल्ला इतना ज्यादा मचा, कैमरों की रोशनी इतनी तीखी हो गई, और कृत्रिम आस्था इतनी नकली दिखने लगी कि शायद वे भी समझ गए — “इस बार का नाटक, नौटंकी बहुत भारी पड़ने वाली है।”

और बस, प्रधानमंत्री ने वही किया जो सबसे प्रभावी राजनीतिक प्रतिक्रिया होती है — ना जाना।

प्रधानमंत्री का मौन संदेश — ‘ना जाना ही सबसे बड़ा बयान’

छठ पूजा के लिए दिल्ली में गंगा के फिल्टर पानी से बनाए गए कृत्रिम यमुना घाट पर प्रधानमंत्री मोदी नहीं पहुंचे। उनके न जाने भर से ही सारा सियासी परिदृश्य बदल गया। जो आयोजन सरकार की “धार्मिक छवि” चमकाने के लिए किया गया था, वही अब उसकी “सियासी फिसलन” का प्रतीक बन गया। प्रधानमंत्री के इस मौन कदम ने यह दिखा दिया कि कभी-कभी चुप्पी सबसे ऊँचा भाषण होती है। और इस बार यह भाषण इतना मुखर था कि हर चैनल की बहस, हर पोस्टर की चमक और हर राजनीतिक जुमला फीका पड़ गया।

मीडिया की असली डुबकी — जब नैरेटिव बह गया गंदे पानी में

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी हार गोदी मीडिया की हुई। वही मीडिया जिसने घंटों-घंटों के प्राइम टाइम में गंगा के फिल्टर पानी को यमुना की निर्मल धारा बताने का प्रयास किया। कैमरों के सामने डिबेट एंकर भावुक स्वर में बोले — “देखिए मां यमुना का चमत्कार!” — जबकि पीछे पाइपों से आता फिल्टर पानी झाग छोड़ रहा था।

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सोशल मीडिया ने जब असली वीडियो जारी किए, तो जनता ने टीवी बंद कर दिया और सच्चाई को देखा। अब जो एंकर वहां जाकर उस नकली घाट को यमुना नदी बताते घूम रहे थे, उन्हें शर्म तो नहीं आई होगी, लेकिन दफ्तरों में अब शायद कॉफी मशीन के पास खड़ा होना भी मुश्किल हो गया होगा।

रेखा गुप्ता की कोशिशें — मेहनत घाट बनाने में कम, असली साबित करने में ज्यादा

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के लिए यह दिन राजनीतिक रूप से बेहद निराशाजनक साबित हुआ। उन्होंने घाट बनाने में जितनी मेहनत नहीं की थी, उससे कहीं ज्यादा उसे “असली” सिद्ध करने में लगा दी। सोशल मीडिया कैम्पेन, हैशटैग #CleanYamuna और #DelhiChhath, सब चलाए गए — मगर पानी फिल्टर प्लांट से आता रहा और यमुना ‘निर्मल’ के बजाय ‘कृत्रिम’ ही रही। इस पूरे आयोजन में श्रद्धा से ज्यादा सियासी ब्रांडिंग बह रही थी। लेकिन जनता अब भक्त नहीं, जागरूक दर्शक बन चुकी है — जिसने नकली घाट की असलियत पहचान ली।

मीडिया की ‘सर्टिफिकेट फैक्ट्री’ और प्रधानमंत्री की समझदारी

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने जिस मीडिया से घाट की सफाई का प्रमाणपत्र लिया, वह वही मीडिया है जिसे प्रधानमंत्री मोदी सबसे अच्छे से पहचानते हैं। क्योंकि यही मीडिया हर चुनाव में चमत्कार दिखाता है और हर संकट में किसी को बलि का बकरा बना देता है।

इस बार जब चैनलों ने रिपोर्ट दी — “घाट तैयार है, सब सही है,” तब शायद प्रधानमंत्री मुस्कुरा दिए होंगे — “तो मतलब घाट गलत है।”

उनका यह न जाना सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं था, बल्कि रणनीतिक था — एक ऐसा संकेत जो कहता है कि अब नकली आस्था और फिल्टर भक्तिभाव का दौर जनता के सामने ज्यादा दिन नहीं टिकेगा।

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छठ का घाट, सियासत की लहरें और मीडिया की नैतिक हार

आखिरकार, इस छठ पर सबसे बड़ी डुबकी गोदी मीडिया ने ही लगाई। जब पत्रकारिता ‘भक्ति’ में बदलती है, तब सच्चाई डूब जाती है — चाहे पानी गंगा का हो या यमुना का। प्रधानमंत्री मोदी का मौन, विपक्ष की आक्रामकता और सोशल मीडिया की पैनी निगरानी — तीनों ने मिलकर दिखा दिया कि जनता अब ‘फिल्टर नैरेटिव’ नहीं, ‘अनफिल्टर्ड सच्चाई’ चाहती है।

और यही इस बार की सबसे बड़ी सीख है — घाट चाहे नकली हो या असली, लेकिन राजनीति की गंदगी अब छिपाई नहीं जा सकती। प्रधानमंत्री ने इस नाटक को पहचान लिया, लेकिन गोदी मीडिया अब भी भूमिका निभाने में जुटा है — शायद अगली बार किसी और फिल्टर के साथ।

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