नई दिल्ली 5 नवंबर 2025
जब Election Commission of India (ईसीआई) और Bharatiya Janata Party (बीजेपी) के बीच चुनावी विवाद छिड़ता है — विशेषकर जब विपक्ष आरोप लगाता है कि वोट-चोरी, फर्जी मतदाता या मतदाता सूची हेरफेर हुआ है — तब उनकी प्रतिक्रिया लगभग पूर्वानुमानित हो जाती है: “हम सही हैं, आप गलत हैं।” जिन्हें सवाल पूछने का साहस हुआ, उन्हें जवाब नहीं मिला, बल्कि उन्हें जवाबदेह बनने के बजाय बदनाम किया गया। जब Rahul Gandhi ने हरियाणा चुनाव में “H-Files” के नाम से 25 लाख फर्जी वोटों का आरोप लगाया और कहा कि हर आठ में से एक वोटर नकली था, तब आयोग ने तुरंत बयान जारी किया कि विपक्ष ने औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं की है और केवल 22 चुनाव याचिकाएँ ही हाई कोर्ट में पेंडिंग हैं।
यह प्रक्रिया उस लोकतंत्र-प्रक्रिया पर एक खतरनाक छाँव डलवा देती है जहाँ जांच नहीं होती, जवाब नहीं मिलता, लेकिन प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है — और वह प्रतिक्रिया जनादेश की वैधता पर सीधे प्रहार करती है। सवाल उठते हैं — जब मतदाता सूची में विवाद हो, जब फर्जी मतदाता का खुलासा हो, जब आयोग पर राजनीतिक पक्षपात का आरोप हो — तब क्या सिर्फ बयान देकर काम चल जाएगा? नहीं, लेकिन यही हो रहा है। विपक्ष ने acusa किया कि आयोग और सत्ता दल मिलकर व्यवस्था को संचालित कर रहे हैं ताकि निष्पक्षता खत्म हो जाए; वहीं आयोग और सरकार ने आरोप लगाने वालों को “माहित बढ़ाने वाले”, “धर्म-तंत्र को भड़काने वाले” करार दिया।
इसे देखकर यह चिंताजनक तथ्य उभरते हैं — जब आयोग के सामने गंभीर दस्तावेज-दावे होते हैं, जैसे कि मतदाता सूची में दसियों लाख नामों की गिरावट या डुप्लीकेट मतदाता, तो जवाब बड़े चुपचाप दिए जाते हैं: “आयोग को शिकायत नहीं मिली”, “दावा आधारहीन है”, “तथ्यों का आधार नहीं है”। लेकिन सवाल यह है — अगर शिकायत नहीं हुई है, तो क्या यह प्रक्रिया ही निष्पक्ष नहीं है? उदाहरण के तौर पर, हरियाणा में आयोग ने बताया कि मतदाता सूची पर कोई औपचारिक आपत्ति नहीं थी। इस जवाब ने विपक्ष के आरोपों को खारिज कर दिया — लेकिन साथ ही स्पष्ट किया कि जांच-विरोधी प्रक्रिया लोकतंत्र के लिए कितनी खतरनाक हो सकती है।
यह राजनीति-संचालित पैटर्न सिर्फ हरियाणा तक सीमित नहीं है। जब कभी मतदाता सूची के मसले उठते हैं, संयुक्त दलों और विपक्ष की आवाज़ बढ़ती है-लेकिन जवाब देने की गति कमजोर होती है। जैसे कि बिहार में 65 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने का आरोप लगा था, लेकिन आयोग-सरकार की प्रतिक्रिया नीचे तीखी और ऊपर कमजोर रही। इस प्रकार एक निर्विरोध मॉडल बन जाता है: आरोप लगते हैं, विरोध होता है, आयोग बचाव में हल्का सा बयान जारी करता है, फिर मामला शांत हो जाता है। परिणामस्वरूप, सवाल उठाने की प्रक्रिया को ही कट्टरता की श्रेणी में डाल दिया जाता है।
लोकतंत्र का मूल यही था कि संदेहों की जाँच हो सके — मतदाता की आवाज़ सुरक्षित हो सके — प्रक्रिया स्वच्छ हो सके। लेकिन जब आयोग और सरकार बार-बार वही राग दोहराते हैं: “हम सही हैं, तुम गलत हो”, तो वह राग लोकतंत्र के कानों में घोटाले का संगीत बजाने लगता है। सवाल झुकाया नहीं जा सके, जवाबदेही नहीं की जा सके, और विवादों के मध्य जवाब ही नहीं मिलते। आज राजनीति का माहौल ऐसा नहीं है जहाँ शंका को जवाब मिलता है — बल्कि वहाँ जहाँ शंका को आरोप बनाकर ठंडा कर दिया जाता है।
अगर यह प्रवृत्ति ऐसे ही जारी रही, तो यह सिर्फ एक विवाद नहीं रहेगा — यह चुनावी प्रक्रिया की हत्या बन जाएगी। क्योंकि लोकतंत्र सिर्फ नुमाइश नहीं कि वोट पड़े और सरकार बनी — बल्कि लोकतंत्र यह मांग करता है कि वोट की ताक़त, सूची की पारदर्शिता, जिम्मेदारी की मुहर और अधिकारियों का जवाबदेह होना सुनिश्चित हो। जब यही नहीं होगा — और जब आयोग-सरकार सिर्फ एक ही सुर में बोलेंगे — तो सवाल महज चुनाव का नहीं रहेगा, पूरे लोकतंत्र का होगा।




