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19 लाख EVM गायब — लोकतंत्र की तिजोरी में सबसे बड़ा सेंध, जवाबदेही गायब और साज़िश के साए गहरे

नई दिल्ली 5 नवंबर 2025

बात थोड़ी पुरानी है। लेकिन याद रखनी जरूरी है। क्योंकि गायब करने वाले ही वोट चोर हैं, देश के गद्दार हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है और अगर इस लोकतंत्र की नींव को एक शब्द में समझना हो, तो वह है — मत। यही मत उस मशीन में सुरक्षित होता है जिसे हम ईवीएम कहते हैं। लेकिन जब इस लोकतांत्रिक तिजोरी से ही 19 लाख से अधिक ईवीएम मशीनें बिना कोई ट्रेस, बिना कोई जवाब और बिना कोई पारदर्शिता के गायब हो जाती हैं, तो सवाल यह उठना ज़रूरी हो जाता है कि क्या सिर्फ मतदाता ही गायब हुआ है या लोकतंत्र की आत्मा भी किसी गहरे अंधेरे में गायब करा दी गई है?

यह मामला पहली बार कर्नाटक विधानसभा में मार्च 2022 की बहस के दौरान सामने आया। कांग्रेस नेता एच.के. पाटिल ने RTI जवाबों के आधार पर सदन में बताया कि 2016 से 2018 के बीच भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ECIL) द्वारा चुनाव आयोग को भेजी गई लाखों मशीनों का कोई रिकॉर्ड आयोग के पास मौजूद ही नहीं है। BEL कहता है कि उसने 9,64,270 मशीनें दीं और ECIL का दावा है कि उसने 9,29,992 मशीनें भेजीं — मतलब कुल मिलाकर 19 लाख से ज़्यादा मशीनें चुनाव आयोग की सूची में नहीं दिखतीं। इसके अलावा, 2014 की 62,183 मशीनें जिनके बारे में चुनाव आयोग यह तक कह पाने में विफल रहा कि वह उन्हें कभी मिली भी थीं या नहीं। यह गंभीर आरोप है — और उतना ही गंभीर है इस पर चुनाव आयोग की चुप्पी।

अब बड़ा प्रश्न यह है कि यह चुप्पी पैदा कैसे हुई? चुनाव आयोग जैसी संस्था, जिसका स्वर जनता की आस्था और लोकतंत्र की सुरक्षा में सबसे प्रबल होना चाहिए, वह ऐसे गंभीर खुलासे पर मौन क्यों है? क्या यह तकनीकी लापरवाही है — या तयशुदा हेरफेर की संगठित जमीन? ईवीएम कोई पेन-ड्राइव या स्टेशनरी नहीं होती जिसे भुला दिया जाए — इन मशीनों की मौजूदगी किसी भी चुनाव की वैधता का प्रमाण होती है। अगर मशीनें गायब हैं — तो किस चुनाव में किन मशीनों का उपयोग हुआ? क्या उनके साथ छेड़छाड़ संभव थी? किस ट्रक में, किस गोदाम से, कहाँ लेते हुए वे गायब हो गईं? क्या वे अवैध चुनावी खेल का हिस्सा बनीं?

यह सिर्फ संख्या का सवाल नहीं, यह राष्ट्र के भविष्य का सवाल है। हर गायब मशीन एक चोरी हुआ वोट हो सकती है। और यदि मशीनों का कोई हिसाब नहीं, तो फिर किस आधार पर हम चुनाव परिणामों को अंतिम मानें? यह चिंता तब और बढ़ जाती है जब सत्ता पक्ष से नज़दीकी होने के आरोपों के बीच आयोग की चुप्पी सहयोग जैसी दिखाई देने लगती है। अगर हर बार वही दल विजयी होता दिखे जिसे सिस्टम पर सबसे अधिक पकड़ का लाभ मिल रहा हो — तो क्या यह सिर्फ संयोग है?

इस विवाद ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर अभूतपूर्व चोट की है। और सच यह है कि अगर लोकतंत्र की संरक्षक संस्था पर ही भरोसा नहीं बचे, तो मतदाता का विश्वास किस सहारे जिंदा रहेगा? स्वतंत्र जांच, सीरियल नंबर का सार्वजनिक खुलासा, डिलीवरी रिकॉर्ड और सभी गायब मशीनों की फॉरेंसिक जाँच — यह सब तुरंत होना चाहिए। अन्यथा हर आगामी चुनाव संदेह की दीवार में कैद हो जाएगा।

आज इस देश को यह तय करना पड़ेगा — क्या हमें चुनाव सिर्फ करवाने हैं या निष्पक्ष चुनाव करवाने हैं? अगर यह सवाल अब भी अनुत्तरित रह गया —तो यह सिर्फ ईवीएम नहीं, लोकतंत्र की अंतिम सांसों का गायब होना होगा।

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