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सत्ता की क्रूरता और नैतिक दिवालियापन : रेप पीड़िता पर मंत्री ओमप्रकाश राजभर का ठहाकों के साथ कहना…. “घर तो उनका उन्नाव है”

एबीसी डेस्क 24 दिसंबर 2025

उन्नाव रेप पीड़िता, जिसने वर्षों तक डर, अपमान और न्याय की थकाने वाली लड़ाई लड़ी है, उसके जख्मों पर उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने सार्वजनिक तौर पर ठहाके लगाकर नमक छिड़क दिया। जब मीडियाकर्मियों ने मंत्री से सवाल किया कि पीड़िता को सुरक्षा के लिए पुलिस इंडिया गेट से उठाकर दूसरी जगह ले गई, तो मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने जवाब देने के बजाय तेज ठहाका लगाया और व्यंग्य भरे लहजे में कहा— “इंडिया गेट? घर तो उनका उन्नाव है!” यह हंसी किसी हल्के पल की नहीं थी, यह उस महिला के संघर्ष पर थी, जिसने अपने पिता को खोया, जिसने धमकियां झेलीं, जिसने अपनी जिंदगी के सबसे कीमती साल अदालतों और डर के साए में गुजारे। एक बलात्कार पीड़िता की सुरक्षा, उसका भय, उसका मानसिक आघात—इन सब पर हंसना सिर्फ व्यक्तिगत असंवेदनशीलता नहीं, सत्ता की क्रूरता और नैतिक दिवालियापन है। एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति अगर इस तरह ठहाकों के साथ किसी रेप पीड़िता की स्थिति को तुच्छ बताए, तो यह बयान नहीं, इंसानियत का अपमान है।

यह सिर्फ असंवेदनशील बयान नहीं था, पीड़िता की पीड़ा का खुला उपहास था। मंच पर हंसते हुए कहा गया— “घर तो उनका उन्नाव में है…”—और यही एक वाक्य सत्ता की उस बेरहम सोच को उजागर करने के लिए काफी था, जिसमें बलात्कार पीड़िता का दर्द भी मजाक का विषय बन जाता है। यह मजाक इसलिए भी ज्यादा घिनौना है क्योंकि यह उस पीड़िता के भरोसे को कुचलता है, जिसने पहले ही सिस्टम से बार-बार धोखा खाया है। एक तरफ वह महिला है, जो आज भी सुरक्षा को लेकर आशंकित है, दूसरी तरफ सत्ता में बैठा मंत्री है, जो उसकी पीड़ा पर हंस रहा है। सवाल उठता है—क्या यही वह “सुशासन” है, जहां बलात्कार पीड़िताओं के दर्द पर ठहाके लगाए जाते हैं?

मंत्री ओमप्रकाश राजभर का यह रवैया सिर्फ उन्नाव की पीड़िता के लिए नहीं, बल्कि देश की हर उस महिला के लिए डरावना संदेश है, जो यौन हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने का साहस जुटाती है। अगर सत्ता में बैठे लोग ही इस तरह मजाक उड़ाएंगे, तो पीड़िताएं किससे उम्मीद करें—न्याय से या संवेदना से? आज यह मामला किसी एक मंत्री या एक बयान तक सीमित नहीं है। यह हमारे समाज और राजनीति के सामने आईना है। क्या हम इतने निर्दय और क्रूरता की हद पार कर चुके हैं कि किसी महिला के सबसे गहरे जख्म हमें हंसने का मौका दे दें? आज जरूरत केवल माफी या सफाई की नहीं, बल्कि उस सोच को कटघरे में खड़ा करने की है, जो ठहाकों के बीच एक पीड़िता के दर्द को कुचल देती है। क्योंकि जब सत्ता हंसती है, तब न्याय शर्मिंदा होता है और पीड़ित की चुप्पी और भी गहरी हो जाती है।

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