[the_ad id="179"]
Home » National » मौत की आहट! जब मोहम्मद रफी को अपनी आख़िरी रिकॉर्डिंग का एहसास हो गया था…

मौत की आहट! जब मोहम्मद रफी को अपनी आख़िरी रिकॉर्डिंग का एहसास हो गया था…

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 25 जून 2026

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ आवाज़ें कभी बूढ़ी नहीं होतीं। वे समय की सीमाओं को पार कर पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के दिलों में जीवित रहती हैं। ऐसी ही एक अमर आवाज़ थी महान पार्श्वगायक मोहम्मद रफी की। 31 जुलाई 1980… हिंदी फिल्म संगीत का वह दिन, जब करोड़ों दिलों की धड़कन जैसी एक आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो गई। लेकिन उनकी मृत्यु से कुछ घंटे पहले घटी एक घटना आज भी लोगों को भावुक कर देती है।

कहानी धर्मेंद्र और हेमा मालिनी अभिनीत फिल्म “आस पास” के टाइटल गीत की रिकॉर्डिंग से जुड़ी है। उस दिन रफी साहब स्टूडियो में गीत रिकॉर्ड कर रहे थे। रिकॉर्डिंग लगभग पूरी हो चुकी थी, लेकिन कुछ पंक्तियाँ बाकी रह गई थीं। संगीतकारों और तकनीशियनों ने तय किया कि बची हुई चार लाइनें अगले दिन रिकॉर्ड कर ली जाएँगी।

रफी साहब स्टूडियो से निकलकर अपनी कार में बैठ गए। लेकिन कुछ ही देर बाद अचानक वापस लौट आए।

उन्होंने कहा, “नहीं… ये चार लाइनें आज ही रिकॉर्ड करनी हैं।”

स्टूडियो में मौजूद लोग हैरान थे। कोई विशेष कारण नहीं था कि रिकॉर्डिंग अगले दिन न हो सके। लेकिन रफी साहब जैसे किसी अदृश्य एहसास से प्रेरित होकर लौटे थे। उन्होंने बची हुई पंक्तियाँ रिकॉर्ड कीं, गीत पूरा किया और फिर अपने घर चले गए।

किसी को नहीं पता था कि यह उनकी जिंदगी की आख़िरी रिकॉर्डिंग साबित होगी।

उसी रात उन्हें दिल का दौरा पड़ा और कुछ ही घंटों बाद भारतीय संगीत जगत ने अपनी सबसे मधुर आवाज़ खो दी।

यह घटना वर्षों से संगीत प्रेमियों के बीच एक भावनात्मक स्मृति की तरह सुनाई जाती है। कई लोग इसे महज संयोग मानते हैं, तो कई इसे एक कलाकार की उस रहस्यमयी संवेदना से जोड़ते हैं, जो शायद आने वाले समय को महसूस कर लेती है।

मोहम्मद रफी केवल एक गायक नहीं थे, बल्कि भारतीय संगीत की आत्मा थे। अपने लगभग तीन दशक लंबे करियर में उन्होंने हजारों गीत गाए। भजन, ग़ज़ल, कव्वाली, देशभक्ति गीत, रोमांटिक नगमे, दर्द भरे गीत या मस्ती से भरपूर धुनें—रफी साहब ने हर शैली को अपनी आवाज़ से अमर बना दिया।

“चौदहवीं का चाँद हो”, “बहारों फूल बरसाओ”, “ये दुनिया ये महफ़िल”, “कर चले हम फ़िदा”, “क्या हुआ तेरा वादा” जैसे अनगिनत गीत आज भी करोड़ों लोगों की जिंदगी का हिस्सा हैं।

31 जुलाई 1980 को जब उनके निधन की खबर फैली, तो मुंबई की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा। बताया जाता है कि उनके अंतिम संस्कार में लाखों लोग शामिल हुए थे। बारिश हो रही थी, लेकिन लोगों की आँखों से बहते आँसू उस बारिश से कहीं ज्यादा थे।

शायद इसी वजह से मोहम्मद रफी केवल एक नाम नहीं, एक भावना हैं।

और जब भी “आस पास” का वह गीत सुनाई देता है, तो संगीत प्रेमियों को यह कहानी याद आ जाती है—एक ऐसे कलाकार की, जिसने शायद अपनी आख़िरी धुन गाते हुए ही महसूस कर लिया था कि अब उसकी आवाज़ हमेशा के लिए अमर होने जा रही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *