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पुतिन डिनर में थरूर की ‘अकेली मौजूदगी’ ने कांग्रेस में बढ़ाया तूफ़ान—विभीषण वाली भूमिका में दिख रहे शशि थरूर

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। मुश्किल अंग्रेज़ी शब्दों और भाषाई भव्यता से प्रभावित करने वाले थरूर पर यह आरोप लंबे समय से लगता रहा है कि उनकी राजनीति में वैचारिक स्थिरता और पार्टीनिष्ठा का अभाव है। उनकी पहचान भाषणों और अभिव्यक्ति की शैली तक सीमित रह गई है, और ज़मीनी राजनीति में उन्हें अक्सर हल्का माना जाता है। इसी पृष्ठभूमि में पुतिन के सम्मान में आयोजित विशेष डिनर ने उनकी छवि को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है।

मामला यह है कि इस डिनर के लिए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी को न्योता नहीं दिया गया था। पार्टी में सामान्य समझ यह थी कि ऐसे में कांग्रेस का कोई भी नेता उस समारोह में उपस्थित न हो, ताकि सामूहिक सम्मान और राजनीतिक संदेश दोनों सुरक्षित रहें। लेकिन शशि थरूर का इस कार्यक्रम में अकेले शामिल होना न केवल चौंकाने वाला कदम था, बल्कि पार्टी की विचारधारा और अनुशासन से सरासर विपरीत भी। यह कदम कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेतृत्व दोनों के लिए असहज स्थिति पैदा कर रहा है। आलोचकों का कहना है कि अगर थरूर ऐसी सरकारी गतिविधियों का हिस्सा बनने के लिए इतने उत्सुक हैं, तो उन्हें पहले कांग्रेस छोड़ देनी चाहिए—क्योंकि कांग्रेस में रहकर बीजेपी निकटता दिखाना न तो पार्टी समर्थकों को स्वीकार है और न ही बीजेपी खेमे को।

भारतीय समाज में “विभीषण” का नाम विश्वासघात और भेदियेपन का प्रतीक माना जाता है। इसलिए कोई अपने बच्चे का नाम विभीषण नहीं रखता। विभीषण की यही छवि—अपनों के बीच रहकर अपने ही पक्ष को कमजोर करने वाली—आज कई कांग्रेस कार्यकर्ता शशि थरूर के हालिया व्यवहार में देख रहे हैं। पुतिन डिनर में उनका जाना इस छवि को और मजबूत करता है कि वे संगठन की लाइन से अलग चलकर अपनी निजी राजनीति साध रहे हैं। यह व्यवहार न केवल कांग्रेस की एकजुटता को ठेस पहुंचाता है बल्कि थरूर की राजनीतिक विश्वसनीयता और गंभीरता पर भी गहरा सवाल खड़ा करता है।

राजनीति में व्यक्तित्व और विचार—दोनों की कसौटी होती है। शशि थरूर का यह निर्णय एक बार फिर दिखाता है कि वे किस पक्ष को अधिक महत्व देते हैं। पुतिन डिनर विवाद ने कांग्रेस के भीतर चल रहे संगठनात्मक संघर्ष को भी उजागर कर दिया है। फिलहाल, इतना तय है कि थरूर की यह ‘अकेली मौजूदगी’ पार्टी के भीतर लंबी चर्चा, तीखी प्रतिक्रिया और गहरे अविश्वास की वजह बनेगी।

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