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थाईलैंड के पीएम का वादा: सुलझेगा सीमा विवाद, बदलेगा संविधान

बैंकॉक 29 सितम्बर 2025

थाईलैंड के नए प्रधानमंत्री अनुतिन चर्नविराकुल ने संसद में अपना पहला संबोधन करते हुए यह साफ कर दिया कि उनकी सरकार का एजेंडा केवल सत्ता संभालना नहीं बल्कि देश की सबसे पुरानी और जटिल समस्याओं को हल करना है। उन्होंने ऐलान किया कि कंबोडिया के साथ हालिया सीमा विवाद को शांतिपूर्ण कूटनीति के ज़रिए सुलझाया जाएगा। अनुतिन ने संसद को बताया कि जुलाई में पांच दिन तक चले संघर्ष के बाद सीमा पर जो तनाव पैदा हुआ था, वह न केवल दोनों देशों के लिए बल्कि पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए एक खतरे की घंटी है। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सरकार जनता से राय लेकर मौजूदा सीमा समझौतों — वर्ष 2000 का भूमि समझौता और 2001 का समुद्री समझौता — पर जनमत संग्रह कराएगी और आवश्यकता पड़ने पर इन्हें रद्द कर नए समझौते करेगी। यह बयान थाईलैंड की विदेश नीति में बड़े बदलाव का संकेत है, क्योंकि अब तक यह विषय पिछली सरकारों में टालमटोल का शिकार रहा है।

प्रधानमंत्री अनुतिन ने संवैधानिक सुधारों को भी अपनी प्राथमिकता बताया और कहा कि देश को एक ऐसे संविधान की जरूरत है जो जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप हो। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि जल्द ही एक नई संविधान सभा का गठन किया जाएगा, जो नागरिकों की भागीदारी के साथ नया संविधान तैयार करेगी। इस कदम को थाईलैंड के लोकतांत्रिक इतिहास में मील का पत्थर माना जा रहा है, क्योंकि पिछली संवैधानिक प्रक्रियाओं पर अक्सर सेना और अभिजात वर्ग के प्रभाव का आरोप लगता रहा है। अनुतिन ने वादा किया कि उनका प्रशासन भ्रष्टाचार से सख्ती से निपटेगा, घरेलू कर्ज़ को कम करने के लिए ठोस आर्थिक पैकेज लाएगा और बढ़ती महंगाई, बिजली और ईंधन की कीमतों पर नियंत्रण करेगा। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार का मकसद केवल आर्थिक राहत देना नहीं बल्कि सामाजिक स्थिरता और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना है।

हालांकि अनुतिन की राह आसान नहीं होगी। संसद में उनके गठबंधन की स्थिति नाज़ुक है और उनकी सहयोगी पार्टी पीपल्स पार्टी ने साफ कर दिया है कि वह विपक्ष जैसी भूमिका निभाएगी। ऐसे में सरकार के हर प्रस्ताव को पास कराना चुनौतीपूर्ण होगा। इसके अलावा उन्होंने चार महीने के भीतर आम चुनाव कराने का वादा भी किया है, जिससे उनके पास बड़े निर्णय लागू करने के लिए सीमित समय बचता है। कंबोडिया सीमा विवाद को लेकर जनमत संग्रह कराने की उनकी योजना भी विवादित हो सकती है, क्योंकि समझौतों के रद्द होने पर एक कूटनीतिक शून्यता उत्पन्न होगी जिसे नए समझौतों और वार्ताओं से भरना होगा।

विश्लेषकों का मानना है कि यह नया दृष्टिकोण दक्षिण-पूर्व एशिया में शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है। कंबोडिया के प्रधानमंत्री के साथ शांतिपूर्ण वार्ता और सैनिकों की तैनाती में कमी लाने की पहल क्षेत्रीय तनाव को कम कर सकती है। लेकिन अगर यह प्रक्रिया असफल होती है तो सीमा पर फिर से हिंसा भड़क सकती है। ऐसे समय में थाईलैंड की आंतरिक राजनीति भी उथल-पुथल में है और आर्थिक चुनौतियां सिर पर खड़ी हैं। इसलिए अनुतिन की सरकार के लिए यह एक परीक्षा की घड़ी है कि वह घरेलू मोर्चे पर स्थिरता बनाए रखते हुए पड़ोसी देशों के साथ भरोसेमंद संबंध कैसे स्थापित करती है।

 

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