राष्ट्रीय/ स्वास्थ्य | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 8 अक्टूबर 2026
फार्मास्यूटिकल कंपनियों की ओर से डॉक्टरों को कथित तौर पर दिए जाने वाले गिफ्ट, मुफ्त यात्राओं और नकद लाभ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को ऐसी कथित अनैतिक मार्केटिंग और दवा प्रचार की शिकायतों पर विचार करने के लिए एक कमेटी गठित करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि कमेटी संबंधित सुझावों और अभ्यावेदनों पर विचार करेगी और उसके बाद सरकार को अपनी सिफारिशें देगी।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र को कमेटी गठित करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि कमेटी इस मामले से जुड़े सुझावों और प्रस्तुतियों पर विचार करके अपनी सिफारिशें केंद्र सरकार को सौंपेगी। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए 29 जनवरी को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है। उस दिन केंद्र सरकार की ओर से कमेटी के गठन और कार्रवाई को लेकर अनुपालन हलफनामा अदालत के सामने रखा जाएगा।
यह मामला Federation of Medical and Sales Representatives Associations of India और अन्य की ओर से दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिका में फार्मास्यूटिकल कंपनियों द्वारा स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े पेशेवरों के सामने दवाओं के मार्केटिंग और प्रचार को लेकर सख्त नियमन की मांग की गई थी। याचिका में विशेष रूप से ऐसी कथित प्रथाओं पर नियंत्रण की मांग की गई है, जिनमें डॉक्टरों को दवा कंपनियों की ओर से विभिन्न प्रकार के लाभ दिए जाने के आरोप सामने आते रहे हैं।
मामले का व्यापक सवाल यह है कि दवाओं के प्रचार और डॉक्टरों के पेशेवर निर्णय के बीच किसी भी तरह के अनुचित आर्थिक या अन्य लाभ का प्रभाव न पड़े। दवाओं की बिक्री बढ़ाने के लिए किए जाने वाले प्रचार और मरीजों के इलाज से जुड़े चिकित्सकीय निर्णय के बीच स्पष्ट नैतिक सीमा बनाए रखना स्वास्थ्य व्यवस्था में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि किसी डॉक्टर को किसी कंपनी की ओर से कोई लाभ मिलता है और उसका असर दवा लिखने के निर्णय पर पड़ता है, तो इसका सीधा संबंध मरीज के हित और इलाज की लागत से जुड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब केंद्र द्वारा गठित की जाने वाली कमेटी इस पूरे विषय पर सुझावों और शिकायतों का अध्ययन करेगी। कमेटी किन नियमों में बदलाव की सिफारिश करती है, फार्मा कंपनियों के प्रचार पर किस तरह के अतिरिक्त नियंत्रण की जरूरत बताती है और डॉक्टरों के साथ कंपनियों के आर्थिक संबंधों को लेकर क्या व्यवस्था सुझाती है—इन सवालों पर आगे की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
अदालत का यह कदम ऐसे समय आया है जब स्वास्थ्य क्षेत्र में दवाओं की कीमत, डॉक्टरों के प्रिस्क्रिप्शन और फार्मास्यूटिकल कंपनियों की मार्केटिंग रणनीतियों को लेकर पारदर्शिता और नैतिकता पर लगातार चर्चा होती रही है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से अब यह मामला केवल आरोपों और शिकायतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि केंद्र द्वारा गठित कमेटी के स्तर पर इन मुद्दों की औपचारिक समीक्षा होगी।
अब अगली बड़ी नजर 29 जनवरी की सुनवाई पर होगी। उस दिन केंद्र को कमेटी की कार्रवाई और अनुपालन से संबंधित जानकारी अदालत के सामने रखनी होगी। इसके बाद यह स्पष्ट होगा कि फार्मा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को कथित फ्रीबीज और अन्य लाभ देने की शिकायतों पर सरकार किस तरह की नियामकीय व्यवस्था आगे बढ़ाती है।



