हिरन व्यास | अहमदाबाद 29 दिसंबर 2025
शिक्षा सब के लिए, शिक्षा का अधिकार सबके लिए, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, मिड डे मील योजना एवं अन्य सरकारी योजनाओं के बावजूद पीड़ादायक बात यह है कि देश का भविष्य यानी देश के नौनिहाल स्कूल और पढ़ाई छोड़ने के मामले में चिंताजन आंकड़े पेश कर रहे हैं। और यह आंकड़े लाखों की तादाद में हैं। बच्चे स्कूल ड्रॉप आउट हैं, स्कूलों को छोड़ रहे हैं और शिक्षण संस्थान और सरकारी शिक्षा केंद्रों पर ताला लग चुका है।और यह सब कहां हो रहा है? किस राज्य के विकास की पोल सबसे ज्यादा खुल रही है? यह दुर्दशा है मोस्ट हाइप्ड गुजरात मॉडल की। जिस गुजरात से नरेंद्र मोदी 11 साल से प्रधानमंत्री हैं, जहां से गृहमंत्री अमित शाह हैं और जहां से कई कैबिनेट मंत्री और अधिकारी आते हैं। गुजरात में स्कूल ड्रॉप आउट के आंकड़े भयावह गति से बढ़ते जा रहे हैं जो सोचने पर विवश करती है कि जमीनी हकीकत कितनी अलग है। विकास की बेसिक इकाई “शिक्षा” में भी जो राज्य इतने बुरे हाल में है उस राज्य की प्रचार तंत्र के माध्यम से सिर्फ झूठी गाथा देश और दुनिया के सामने पड़ोस कर मूर्ख बनाने का खेल खेल गया।
हाल के सालों में भारत के शिक्षा तंत्र में एक गहरी संकट-सी स्थिति उभर कर सामने आई है, जहाँ लाखों बच्चे अब स्कूलों से बाहर हो रहे हैं और कई सरकारी शिक्षा केंद्र बंद हो चुके हैं। गुजरात में 2020 से 2025 के बीच अकेले 2.4 लाख विद्यार्थी स्कूल नहीं जा रहे हैं, जिनमें से लगभग 1.1 लाख लड़कियाँ हैं — यह संख्या पिछले वर्षों के मुकाबले 341% तक बढ़ चुकी है, जिससे ‘बेटी पढ़ाओ’ जैसे नारों की चमक धुंधली पड़ गई है। ऐसे में कुल मिलाकर देश भर में करीब 65.7 लाख छात्रों के स्कूल छोड़ देने की रिपोर्टें हैं, जिनमें से करीब 30 लाख लड़कियाँ शामिल हैं, जो बच्चों और खासकर लड़कियों की शिक्षा के अधिकार को गंभीर चुनौती देती हैं।
विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का कहना है कि इसका एक बड़ा कारण सरकारी स्कूलों में निवेश और शिक्षकों की भारी कमी है — कई स्कूलों में स्टाफ़िंग इतनी कम है कि एक शिक्षक सभी कक्षाओं को संभाल रहा है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ा है। इसके साथ-साथ, गांवों में स्कूल बंद होने के बाद बच्चों को पास के स्कूल तक कई किलोमीटर पैदल जाना पड़ता है, जो विशेष रूप से लड़कियों के लिए एक बड़ी बाधा बनता है।
शिक्षक और शिक्षा विशेषज्ञ यह भी चिंता जताते हैं कि उच्च स्तर पर पूर्वाधार और नीतिगत कमजोरी के कारण बच्चों को पढ़ाई से जोड़कर रखने में कठिनाई हो रही है। कुछ लोगों के अनुसार, यह समस्या सिर्फ राज्य-स्तर की नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज और सरकारी प्राथमिकता के स्तर पर शिक्षा के प्रति एक गम्भीर चेतावनी है, जिससे भारत के भविष्य की उम्मीदें दांव पर हैं।
यह संकट सिर्फ आंकड़ों तक ही सीमित नहीं है — यह उन परिवारों, गांवों और समुदायों की वास्तविक ज़िंदगियों की कहानी भी है जहाँ शिक्षा की कमी से युवा पीढ़ी के सपने टूटते जा रहे हैं, और उनके उज्जवल भविष्य की राहें बाधित हो रही हैं।




