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रूस का पाकिस्तान को JF-17 इंजन देने का फैसला मोदी की ‘व्यक्तिगत कूटनीति’ की नाकामी: कांग्रेस का तीखा हमला

नई दिल्ली, 5 अक्टूबर 

रूस द्वारा पाकिस्तान को JF-17 थंडर लड़ाकू विमानों के लिए इंजन सप्लाई करने के फैसले ने भारत की राजनीति और विदेश नीति दोनों में हलचल मचा दी है। कांग्रेस ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘व्यक्तिगत कूटनीति की सबसे बड़ी विफलता’ करार देते हुए कहा है कि यह घटना भारत की दशकों पुरानी रणनीतिक साझेदारी पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। पार्टी ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को “इवेंट मैनेजमेंट” और “फोटो-ऑप डिप्लोमेसी” तक सीमित कर दिया है, जिसका नतीजा यह हुआ कि भारत का पारंपरिक सहयोगी रूस अब पाकिस्तान जैसे देश को भी उन्नत सैन्य तकनीक उपलब्ध करा रहा है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा कि प्रधानमंत्री की लगातार बढ़-चढ़कर की जाने वाली विदेश यात्राएं, मंच साझा करने की रणनीतियां और व्यक्तिगत मित्रता की बातें केवल ‘लोकप्रियता के प्रचार’ तक सीमित रह गई हैं। उन्होंने कहा कि भारत ने रूस को स्पष्ट रूप से अपनी चिंता जताई थी कि पाकिस्तान को कोई भी सैन्य तकनीक या इंजन देना भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय संतुलन के लिए खतरनाक होगा, लेकिन इसके बावजूद रूस ने भारत की आपत्तियों को नज़रअंदाज़ कर दिया। रमेश ने कहा कि यह इस बात का प्रमाण है कि मोदी की तथाकथित व्यक्तिगत कूटनीति ने न केवल भारत की स्थिति को कमजोर किया है, बल्कि उसने यह भी दिखा दिया है कि भारत की “दोस्ताना विदेश नीति” अब प्रभावी नहीं रही।

रूस ने पाकिस्तान को जिन इंजनों की सप्लाई का फैसला किया है, वे RD-93MA इंजन हैं, जिन्हें JF-17 Block-III लड़ाकू विमानों में लगाया जाएगा। यह वही विमान हैं जो चीन के सहयोग से पाकिस्तान ने तैयार किए हैं और जिनका इस्तेमाल भारत-पाक सीमा के पास तैनात किया जा सकता है। रक्षा विश्लेषकों के मुताबिक, इस नए इंजन से पाकिस्तान वायुसेना की ताकत कई गुना बढ़ जाएगी। इसके जरिए पाकिस्तान अब चीन से मिली PL-15 लंबी दूरी की मिसाइलों का प्रयोग अधिक प्रभावी ढंग से कर सकेगा। भारत के लिए यह एक गंभीर रणनीतिक खतरा है, क्योंकि JF-17 Block-III के ये वर्जन अब भारतीय वायुसीमा की सुरक्षा चुनौतियों को और बढ़ा सकते हैं।

कांग्रेस ने सवाल उठाया है कि आखिर भारत की विदेश नीति इतनी निष्क्रिय क्यों दिख रही है? जयराम रमेश ने कहा कि रूस जैसे मित्र देश का इस तरह का फैसला यह बताता है कि मोदी सरकार की विदेश नीति अब भरोसेमंद नहीं रही। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की “मित्रता कूटनीति” ने भारत को रणनीतिक तौर पर अलग-थलग कर दिया है। यह वही रूस है जिसे भारत ने हर मुश्किल वक्त में समर्थन दिया, अरबों डॉलर के हथियार सौदे किए और संयुक्त राष्ट्र में लगातार उसका पक्ष लिया। फिर भी, जब भारत की सुरक्षा की बात आई, तो रूस ने हमारे हितों को दरकिनार कर पाकिस्तान को उन्नत तकनीक बेचने का निर्णय लिया।

रमेश ने तीखे शब्दों में कहा, “प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत कूटनीति अब पूरी तरह असफल हो चुकी है। यह घटना मोदी सरकार की विदेश नीति की असलियत उजागर करती है। भारत की विदेश नीति अब व्यक्तिगत शो बन गई है, जबकि राष्ट्रहित कहीं पीछे छूट गया है।” उन्होंने मांग की कि सरकार को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि क्या उसने इस डील का विरोध किया था, और यदि किया, तो रूस ने भारत की बात क्यों नहीं मानी। कांग्रेस ने यह भी कहा कि सरकार को इस सौदे के भारत की सुरक्षा पर प्रभाव को लेकर संसद में विस्तृत बयान देना चाहिए।

रूस का पाकिस्तान को इंजन देने का यह फैसला भारत-रूस संबंधों में एक नई दरार की तरह देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह न केवल रक्षा साझेदारी में असंतुलन पैदा करेगा, बल्कि भारत को अब अपने वैश्विक रक्षा आपूर्तिकर्ताओं की नीति पर भी पुनर्विचार करना पड़ेगा। अमेरिका, फ्रांस और इज़राइल पहले ही भारत को आधुनिक रक्षा तकनीक दे रहे हैं, लेकिन रूस का पाकिस्तान की ओर झुकाव भारत के लिए चिंता का विषय है। यह उस दौर में हो रहा है जब भारत रूस-यूक्रेन युद्ध में संतुलित रुख अपनाने की कोशिश कर रहा है ताकि दोनों पक्षों के साथ उसके संबंध बने रहें।

राजनीतिक तौर पर यह विवाद और गहरा गया है। कांग्रेस के अलावा कई रक्षा विशेषज्ञों ने भी सवाल उठाया है कि अगर रूस भारत की बात नहीं मान रहा है, तो क्या यह भारत की राजनयिक साख में गिरावट का संकेत नहीं है? वहीं, भाजपा ने पलटवार करते हुए कहा है कि कांग्रेस राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों को राजनीति का औजार बना रही है। भाजपा नेताओं का कहना है कि मोदी सरकार किसी भी देश से अपने संबंध भारत के हितों के आधार पर तय करती है, न कि विपक्ष की कल्पनाओं पर।

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस ने मोदी की विदेश नीति पर सवाल उठाया हो। इससे पहले भी विपक्ष कई बार “मित्रता कूटनीति” को लेकर सरकार पर हमला कर चुका है — चाहे वह अमेरिका के साथ संबंधों में तनाव की बात हो, चीन के साथ सीमा विवाद, या अब रूस के इस नए रुख को लेकर आलोचना हो। लेकिन इस बार मामला गंभीर है क्योंकि यह सीधे भारत की रक्षा क्षमता और सामरिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।

रूस का यह कदम दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को बदल सकता है। भारत को अब यह तय करना होगा कि वह अपने पुराने साझेदार पर भरोसा बनाए रखे या नए विकल्प तलाशे। लेकिन कांग्रेस का संदेश साफ है — “राष्ट्रहित से बड़ी कोई व्यक्तिगत कूटनीति नहीं होती।”

 

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