राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 13 अक्टूबर 2026
दिल्ली में 10 अक्टूबर को लोकतांत्रिक विरोध के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों की हिरासत और मेट्रो तथा रेल सेवाओं में व्यवधान को लेकर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। इन घटनाओं से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने सरकार को अपना पक्ष रखना है। मंगलवार को केंद्र ने अदालत को बताया कि जवाबी हलफनामा तैयार है, लेकिन उसे अंतिम रूप देने के लिए और समय चाहिए। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने सरकार को 15 अक्टूबर 2026 तक की मोहलत दे दी।
जब सरकार का जवाब तैयार है, तो उसे अदालत में पेश करने के लिए अतिरिक्त समय क्यों चाहिए? यह सवाल अब सार्वजनिक बहस का हिस्सा है। लोकतंत्र में विरोध करने वालों को हिरासत में लेना, उनकी आवाजाही प्रभावित करना और पत्रकारों के काम में बाधा डालना जैसे गंभीर आरोप केवल प्रशासनिक औपचारिकताओं से खत्म नहीं हो सकते। सरकार और पुलिस को हर कार्रवाई का स्पष्ट कानूनी आधार बताना होगा।
दिल्ली में कार्रवाई पर सवाल, जवाबदेही से बच नहीं सकती सरकार
10 अक्टूबर के प्रदर्शनों के बाद अदालत में दाखिल याचिकाओं में प्रदर्शनकारियों की हिरासत और सार्वजनिक परिवहन सेवाओं में व्यवधान को चुनौती दी गई है। मामला अब सुप्रीम कोर्ट के सामने है और केंद्र को बताना होगा कि उस दिन प्रशासन ने क्या कदम उठाए, किन कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की गई और हिरासत में लिए गए लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई गई।
कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन यह जिम्मेदारी नागरिक स्वतंत्रता को कुचलने का लाइसेंस नहीं है। शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र की बुनियादी पहचान है। यदि किसी प्रदर्शनकारी को बिना वैध आधार के हिरासत में लिया गया, किसी नागरिक की आवाजाही पर अनुचित रोक लगाई गई या पत्रकारों को अपना काम करने से रोका गया, तो इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। वर्दी और सरकारी पद किसी को कानून से ऊपर नहीं बनाते।
सरकारी ताकत का इस्तेमाल या कानून का राज?
10 अक्टूबर की घटनाओं को लेकर उठे सवालों ने एक बड़ा मुद्दा सामने रखा है—क्या विरोध के समय प्रशासन कानून के दायरे में काम करता है या असहमति को नियंत्रित करने के लिए सरकारी ताकत का इस्तेमाल किया जाता है? इस सवाल का जवाब नारों से नहीं, बल्कि आदेशों, पुलिस रिकॉर्ड, हिरासत से जुड़े दस्तावेजों और अदालत में पेश किए जाने वाले तथ्यों से मिलना चाहिए।
सरकार और दिल्ली पुलिस को यह स्पष्ट करना होगा कि प्रदर्शन के दौरान लिए गए फैसलों के पीछे क्या कारण थे। यदि कार्रवाई कानून के अनुरूप थी, तो उसके दस्तावेजी प्रमाण सामने रखे जाने चाहिए। और यदि किसी अधिकारी ने अधिकारों का उल्लंघन किया, तो उसके खिलाफ जवाबदेही तय होनी चाहिए। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस की शक्ति असीमित नहीं हो सकती।
इसी तरह, प्रदर्शन के दौरान हिंसा या कानून-व्यवस्था से जुड़ी कोई स्थिति पैदा हुई हो, तो उसकी जांच भी निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए। लेकिन किसी भी घटना को आधार बनाकर सभी प्रदर्शनकारियों के अधिकारों को नकारना या बिना उचित प्रक्रिया के हिरासत में रखना न्यायसंगत नहीं होगा।
ज्ञानेश कुमार और SIR विवाद के बीच बढ़ा तनाव
दिल्ली में विरोध प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को रद्द करने की विपक्षी मांगों से भी जुड़े रहे हैं। विपक्ष ने चुनावी प्रक्रिया में अनियमितताओं और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर सवाल उठाए हैं। इन मुद्दों पर राजनीतिक दलों के आरोपों और जवाबों की जांच दस्तावेजों तथा संबंधित प्रक्रियाओं के आधार पर होनी चाहिए।
लेकिन चुनावी विवाद अपनी जगह है और नागरिक अधिकारों का सवाल अपनी जगह। किसी भी राजनीतिक मतभेद के बीच शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के अधिकारों की रक्षा करना प्रशासन का दायित्व है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना को अपराध की तरह नहीं देखा जा सकता; कार्रवाई हो तो उसका आधार कानून होना चाहिए, राजनीतिक असहमति नहीं।
15 अक्टूबर को सरकार को देना होगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को जवाब दाखिल करने के लिए 15 अक्टूबर तक का समय दिया है। अब सरकार के हलफनामे से पता चलेगा कि वह हिरासत, पुलिस कार्रवाई और परिवहन सेवाओं में व्यवधान से जुड़े सवालों पर क्या तथ्य और कानूनी आधार पेश करती है।
अदालत से समय मिलना न तो आरोपों की पुष्टि है और न ही सरकार को दोषमुक्त करने वाला फैसला। लेकिन इससे सरकार की जवाबदेही खत्म नहीं होती। जनता यह जानना चाहती है कि 10 अक्टूबर को क्या हुआ, किसके आदेश पर हुआ और क्या हर कार्रवाई कानून के अनुरूप थी।
लोकतंत्र में सवाल पूछने वालों को जवाब चाहिए, बहाने नहीं। सरकार के पास यदि तथ्य हैं, तो उन्हें अदालत के सामने रखने में पारदर्शिता दिखनी चाहिए। दिल्ली पुलिस को भी अपनी कार्रवाई का हिसाब देना होगा। 15 अक्टूबर की तारीख अब केवल हलफनामा दाखिल करने की समयसीमा नहीं, बल्कि उन गंभीर सवालों के जवाब की कसौटी है, जिनका संबंध नागरिक स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण विरोध और कानून के राज से है।



