[the_ad id="179"]
Home » National » CIC नियुक्ति पर घमासान: राहुल गांधी के सुझाए तीनों नाम खारिज, चयन प्रक्रिया पर उठे सवाल

CIC नियुक्ति पर घमासान: राहुल गांधी के सुझाए तीनों नाम खारिज, चयन प्रक्रिया पर उठे सवाल

राष्ट्रीय | प्रणव प्रियदर्शी | ABC NATIONAL NEWS | 29 अप्रैल 2026

केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के प्रमुख की नियुक्ति को लेकर सियासी माहौल गर्म हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा सुझाए गए तीनों नामों को अस्वीकार कर दिया, जिसके बाद यह मामला चर्चा और विवाद का विषय बन गया है। अब सवाल सिर्फ एक नियुक्ति का नहीं, बल्कि पूरे चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता का उठ रहा है। राहुल गांधी ने इस महत्वपूर्ण पद के लिए तीन नाम सुझाए थे—वरिष्ठ आईएएस अधिकारी सुमिता डावरा, पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर और शिक्षाविद प्रो. फैजान मुस्तफा। ये तीनों अपने-अपने क्षेत्र में स्थापित और अनुभवी माने जाते हैं। सुमिता डावरा के पास तीन दशक से अधिक प्रशासनिक अनुभव है और वे सार्वजनिक नीति में गहरी समझ रखती हैं। वहीं न्यायमूर्ति मुरलीधर न्यायपालिका में अपने निष्पक्ष फैसलों के लिए जाने जाते हैं और प्रो. फैजान मुस्तफा शिक्षा और कानून के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित नाम हैं।

लेकिन चयन समिति की बैठक में इन तीनों नामों पर सहमति नहीं बन सकी और अंततः एक अन्य नाम को मंजूरी दी गई, जिसे सरकार की ओर से प्रस्तावित बताया जा रहा है। यहीं से विवाद ने जन्म लिया। विपक्ष का कहना है कि जब इतने अनुभवी और योग्य नाम सामने थे, तो उन्हें खारिज करने के पीछे क्या वजह रही, यह साफ होना चाहिए। उनका आरोप है कि चयन में योग्यता से ज्यादा “अनुकूलता” को महत्व दिया जा रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम में खास तौर पर सुमिता डावरा के नाम को लेकर चर्चा ज्यादा हो रही है। एक महिला अधिकारी, जिसने लंबे समय तक प्रशासनिक सेवा में काम किया और उच्च शिक्षा के साथ मजबूत अनुभव हासिल किया, उन्हें मौका न मिलना कई सवाल खड़े करता है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यह सिर्फ एक व्यक्ति का मुद्दा नहीं, बल्कि यह उस सोच को दर्शाता है जिसमें योग्य और स्वतंत्र सोच रखने वाले लोगों को पीछे किया जाता है।

वहीं सरकार के पक्ष में यह दलील दी जा रही है कि चयन प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के अनुसार होती है और समिति का निर्णय सामूहिक विचार-विमर्श के बाद लिया जाता है। हालांकि, विपक्ष इस जवाब से संतुष्ट नहीं है और मांग कर रहा है कि चयन के आधार और कारणों को सार्वजनिक किया जाए, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

यह मामला अब राजनीतिक बहस से आगे बढ़कर आम लोगों के बीच भी चर्चा का विषय बन गया है। लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि देश की अहम संस्थाओं में नियुक्ति का आधार क्या होना चाहिए—सिर्फ प्रक्रिया या फिर योग्यता और निष्पक्षता का संतुलन। आने वाले समय में यह विवाद और गहराने की संभावना है, क्योंकि विपक्ष इसे बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी में है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *