बिहार बीजेपी में पिछले 24 घंटे में ऐसा राजनीतिक तूफ़ान खड़ा हुआ है जिसने प्रदेश ही नहीं, केंद्रीय कमान तक हलचल मचा दी है। प्रदेश कार्यालय द्वारा “पार्टी-विरोधी गतिविधियों” के आरोप में जारी कारण-पत्र (Show Cause Notice) के बाद बीजेपी के वरिष्ठ नेता आर के सिंह ने न सिर्फ पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया, बल्कि अपने जवाब और त्यागपत्र—दोनों की प्रतियाँ सार्वजनिक कर दीं। इन दस्तावेज़ों के सामने आते ही बिहार बीजेपी में भारी असहजता फैल गई है और टिकट वितरण से लेकर आंतरिक अनुशासन तक, हर स्तर पर सवाल उठने लगे हैं।
प्रदेश कार्यालय की तरफ से भेजे गए नोटिस में कहा गया था कि उनकी गतिविधियाँ पार्टी अनुशासन के खिलाफ हैं और इससे संगठन को “गंभीर नुकसान” पहुँचा है। नोटिस में एक सप्ताह के भीतर जवाब माँगा गया था और यह भी पूछा गया था कि उन्हें पार्टी से निष्कासित क्यों न किया जाए?
लेकिन मोड़ तब आया जब नेता ने अपने जवाबी पत्र में लिखा कि—न तो आरोप बताए गए, न गतिविधि; ऐसे में जवाब किस बात का दूँ? उन्होंने पार्टी पदाधिकारियों से सीधा सवाल किया कि “अगर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को टिकट देने पर आपत्ति जताना पार्टी-विरोधी है, तो फिर पार्टी किस दिशा में जा रही है?”
अपने पत्र में उन्होंने स्पष्ट कहा कि उन्होंने सिर्फ इतना कहा था कि अपराधी छवि वाले लोगों को टिकट नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि इससे बीजेपी की छवि धूमिल होगी और लोकतांत्रिक मूल्यों को चोट पहुँचेगी। उन्होंने लिखा कि जब कुछ मंत्रियों पर भ्रष्टाचार और आपराधिक बैकग्राउंड के आरोप लगे थे, तब भी उन्होंने केवल पार्टी की प्रतिष्ठा बचाने की बात कही थी—लेकिन यह बात “कुछ लोगों को नागवार गुज़री।”

पत्र में उन्होंने तीखे शब्दों में लिखा, “क्या आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को टिकट न देना पार्टी-विरोधी है? क्या भ्रष्टाचार पर सवाल उठाना अपराध है?” नेता ने यह भी आरोप लगाया कि पार्टी के भीतर कुछ लोग अपराध और भ्रष्टाचार के विरोध में उठाई गई आवाज़ से असहज थे, और इसी वजह से उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की पहल की गई।
इसी विवाद और कारण-पत्र के माहौल में उन्होंने तत्काल प्रभाव से बीजेपी की प्राथमिक सदस्यता त्यागने की घोषणा करते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष को औपचारिक त्यागपत्र भेज दिया। अंग्रेज़ी में भेजे गए त्यागपत्र में उन्होंने लिखा कि आरोप अस्पष्ट हैं, निर्दिष्ट नहीं हैं, इसलिए उन पर सफाई देना संभव ही नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ बोलना पार्टी-विरोधी नहीं, बल्कि सार्वजनिक नैतिकता का कर्तव्य है।
उन्होंने राष्ट्रीय अध्यक्ष को भेजे पत्र में लिखा:
“It appears that some people in the party are not comfortable with my stand against criminalization of politics.”
पत्रों के सार्वजनिक होते ही बिहार बीजेपी में उथल-पुथल मच गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह घटना न केवल टिकट वितरण में बढ़ती अंदरूनी नाराज़गी को सामने लाती है, बल्कि बिहार बीजेपी में गुटबाज़ी और नेतृत्व के बीच टकराव को भी उजागर करती है।
सूत्रों के अनुसार, इस घटना के बाद पार्टी हाईकमान ने पूरे मामले पर विस्तृत रिपोर्ट माँगी है और आने वाले दिनों में इस प्रकरण से जुड़े और खुलासे हो सकते हैं। राज्य के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह मामला बिहार बीजेपी में बड़े बदलावों का संकेत हो सकता है।






