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बिहार का “ज्ञानेश मॉडल”: वोट सबसे ज़्यादा, सीटें सबसे कम

नई दिल्ली 16 नवंबर 2025

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का परिणाम ऐसा राजनीतिक पहेली बनकर सामने आया है, जिसने देशभर में चुनावी गणित, प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक तंत्र की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। एक ओर, जिस पार्टी को सबसे अधिक वोट प्रतिशत मिला, उसे सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ा; वहीं जिन दलों को कम वोट मिले, उन्हें सीटों का अप्रत्याशित लाभ मिल गया। ऐसा उलटफेर भारतीय चुनावी इतिहास में बहुत कम देखने को मिलता है और इसने यह बहस तेज़ कर दी है कि बिहार में मतों का अनुवाद सीटों में कैसे हुआ—या कहें कि किसने करवाया।

सबसे चौंकाने वाला उदाहरण राष्ट्रीय जनता दल (RJD) है। पूरे राज्य में 22.8% वोट शेयर के साथ यह सबसे अधिक मत पाने वाली पार्टी बनी, लेकिन उसे मिली सिर्फ 25 सीटें, जो उसके वोट प्रतिशत के बिल्कुल उलट है। लोकतांत्रिक तर्क कहता है कि सबसे अधिक वोट हासिल करने वाले दल को प्रतिनिधित्व भी अधिक मिलना चाहिए, परंतु इस चुनाव में ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। इसके उलट, जिन दलों को अपेक्षाकृत कम वोट मिले, उन्हें सीटें कहीं अधिक प्रदान की गईं, जिससे चुनावी गणित पूरी तरह संदिग्ध प्रतीत होता है।

दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी (BJP) को देखें—उसे 20.3% वोट मिले, यानी RJD से लगभग ढाई प्रतिशत कम, लेकिन सीटें 89। यह भारी अंतर एक सवाल को जन्म देता है कि समान वोट शेयर होने के बावजूद सीटों का यह असमान वितरण किस प्रकार हुआ? यह विसंगति तब और गहरी हो जाती है जब जदयू (JDU) के आंकड़े सामने आते हैं: 20% वोट शेयर, यानी RJD से लगभग 3% कम, परंतु सीटें 85। यह चुनावी व्यवस्था की वह चुप्पी है, जो हर आंकड़ा चीख-चीखकर तोड़ रहा है।

और भी दिलचस्प है LJP का मामला, जिसे महज़ 5% वोट मिले, लेकिन 21 सीटें मिल गईं—एक ऐसी स्थिति जिसमें वोट प्रतिशत और सीट प्राप्ति के बीच कोई तार्किक संतुलन दिखाई नहीं देता। वहीं कांग्रेस (INC) को 8.6% वोट के बावजूद सिर्फ 6 सीटें दी गईं, जो इस विसंगति को और गहरा करती है।

इन सभी आंकड़ों को एक साथ देखने पर परिणामों का पूरा ढांचा एक प्राकृतिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया की जगह एक “निर्मित” या “मैनेज्ड” संरचना जैसा प्रतीत होता है। चुनाव आयोग पर पहले से ही उठ रहे सवालों के बीच यह आंकड़े चुनावी प्रणाली की विश्वसनीयता को झकझोरते हैं। अब लोग खुलकर पूछ रहे हैं कि क्या यह ‘ज्ञानेश मॉडल’ का कमाल है, जहां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में ऐसा चुनावी गणित सामने आया है जिसमें जिनको सबसे ज़्यादा वोट मिले उन्हें सबसे कम सीटें और जिन्हें कम वोट मिले—उन्हें सीटों का पहाड़ मिल गया?

अब यह सवाल केवल विपक्ष का नहीं, बल्कि हर उस नागरिक का है जो मतदान की शक्ति पर विश्वास करता है—

आख़िर इस चुनाव में सीटें वोटों के हिसाब से नहीं, बल्कि किस फार्मूले से बांटी गईं?और सबसे महत्वपूर्ण—क्या यह परिणाम लोकतंत्र की आवाज़ है या व्यवस्था की चाल?

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