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दुष्कर्मी आज़ाद, न्याय करने वाली गिरफ़्तार — इज़राइल का क्रूर सच दुनिया के सामने

इज़राइल के स्डे टायमन अत्याचार केंद्र में फ़िलिस्तीनी बंदी के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया है। लेकिन इस दर्दनाक घटना से भी अधिक भयावह है वह दृश्य, जब इस जघन्य अपराध के आरोपी इज़राइली सैनिकों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का दुस्साहस किया, और खुलेआम अपनी विजय का ‘जश्न’ मनाते हुए कहा—“हम आज़ाद हैं और हम ही जीतेंगे!”। यह बयान किसी लोकतांत्रिक देश की न्यायव्यवस्था पर विश्वास को पूरी तरह चकनाचूर कर देता है। इससे साफ़ दिखता है कि अपराधियों को सत्ता और सेना का संरक्षण प्राप्त है, और वहाँ न्याय नहीं, हथियार और क्रूरता ही कानून तय करते हैं।

इन सैनिकों पर फ़िलिस्तीनी कैदी को यातनाओं के बीच सामूहिक रूप से दुष्कर्म करने और घटना का वीडियो रिकॉर्ड करने का आरोप है। लेकिन सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिस सैन्य तंत्र से उन्हें रोकना चाहिए था, वही तंत्र उन्हें बचाने में लगा रहा। सेना प्रमुख (Chief of Staff), रक्षा मंत्री और खुद प्रधानमंत्री नेतन्याहू पर यह आरोप है कि उन्होंने जांच को कमजोर करने और मामले को दफनाने के लिए भारी दबाव बनाया। यह दर्शाता है कि मामले की जड़ सिर्फ कुछ सैनिकों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे सैन्य-सत्ता ढांचे में सड़ांध फैल चुकी है। न्याय की उम्मीद जिस व्यवस्था से थी, वही व्यवस्था अत्याचार की ढाल बन गई है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस भीषण मानवाधिकार अपराध को उजागर करने की कोशिश करने वाली सैन्य अभियोजक (military prosecutor) को ही प्रताड़ित किया जा रहा है। वही अभियोजक जिसने अपने ही सिस्टम की काली सच्चाई को सामने लाने का साहस किया, अब उसी पर वीडियो लीक करने, जांच में बाधा डालने और गोपनीयता भंग करने के आरोप लगाकर हिरासत में डाल दिया गया है। दबाव और अपमान की चरम सीमा यह रही कि आरोपी सैनिकों की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान हुई मानसिक यातना से तंग आकर उन्होंने आत्महत्या का प्रयास किया। यह घटना अपने आप में एक भारी पड़ताल है—इज़राइल की न्याय व्यवस्था वास्तव में किस पक्ष में खड़ी है? अपराधियों के साथ या पीड़ितों के साथ?

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इस शर्मनाक घटनाक्रम को युद्ध अपराधों की पराकाष्ठा बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है। दुनिया यह सवाल पूछ रही है कि क्या फ़िलिस्तीनी होने का अर्थ न्याय से हमेशा के लिए वंचित होना है? क्या वहाँ जातीय श्रेष्ठता के अहंकार ने इंसानियत और कानून दोनों को कुचल डाला है? एक ओर सेना के संरक्षित दुष्कर्मी हैं, जो कानून को अपनी बूटों तले रौंद रहे हैं—दूसरी ओर सत्य का साथ देने वाली एक अधिकारी है, जिसे उसी न्यायव्यवस्था में अपराधी बना दिया गया।

यह पूरा प्रकरण सिर्फ एक अपराध की कहानी नहीं है—यह राज्य-समर्थित अत्याचार और दंडमुक्ति की गवाही है। इज़राइल के सत्ता-प्रणाली में व्याप्त क्रूरता की यह तस्वीर दुनिया को याद दिला रही है कि जब न्याय को राजनीति, सेना और ताकत की जंजीरों में जकड़ दिया जाता है, तो अपराधी शासक बन जाते हैं और इंसाफ़ मांगने वाले ही गुनहगार। सवाल साफ़ है—ऐसे देश में लोकतंत्र और मानवाधिकारों की बात करना क्या सिर्फ एक मज़ाक नहीं?

 

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