रक्षाबंधन भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का उत्सव है, जो इस बार 9 अगस्त 2025, शनिवार को मनाया जाएगा। यह पर्व केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक ऐसी परंपरा है जिसमें भावनाओं, आस्था और सुरक्षा का अद्वितीय संगम होता है। रक्षाबंधन पर बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधते हुए एक विशेष मंत्र का जप करती हैं —
“येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल: तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल:”।
इस मंत्र का अर्थ है — “जिस रक्षा सूत्र से बलवान राजा बलि को बांधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांध रही हूं, यह रक्षा तुम्हारी स्थिर और अटूट रहे।” यह मंत्र केवल शब्द नहीं, बल्कि रक्षा सूत्र में दिव्य ऊर्जा और आशीर्वाद का संचार करता है।
राखी बांधने की शास्त्रीय विधि भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना उसका भावार्थ। शुभ दिन पर सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और सबसे पहले भगवान गणेश तथा श्रीकृष्ण की पूजा करें। भाई को पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठाना अत्यंत शुभ माना गया है। बहनें सिर पर चुनरी और भाई रुमाल या कपड़ा रखकर पूजा प्रारंभ करती हैं। थाली में रोली, अक्षत, दीपक, राखी, मिठाई, इलायची और नारियल सजाया जाता है। बहनें सबसे पहले भाई की मुट्ठी में इलायची और अक्षत रखती हैं, फिर उसके माथे पर रोली और चावल का तिलक लगाकर दीपक से आरती उतारती हैं। आरती के बाद उपरोक्त मंत्र का जप करते हुए भाई की दाहिनी कलाई पर राखी बांधी जाती है, और फिर मिठाई खिलाई जाती है। परंपरा के अनुसार राखी बांधने के बाद इलायची और अक्षत को घर के शुभ स्थान — जैसे तिजोरी या मंदिर — में रखा जाता है, ताकि घर में सुख-समृद्धि बनी रहे।
रक्षाबंधन पर भाई अपनी बहन को उपहार देकर उसकी रक्षा का वचन देता है। यह वचन केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि एक जीवनभर का संकल्प है। शास्त्रों में यह भी उल्लेख है कि राखी बांधने के बाद भाई को कम से कम 21 दिन तक या जन्माष्टमी तक इसे कलाई से नहीं उतारना चाहिए, ताकि रक्षा सूत्र का प्रभाव स्थिर और सशक्त बना रहे। इस वर्ष रक्षाबंधन के अवसर पर ‘आयुष्मान योग’, ‘सर्वार्थ सिद्धि योग’ और ‘सौभाग्य योग’ जैसे शुभ संयोग भी बन रहे हैं, जो इस पर्व के महत्व को और बढ़ा देते हैं। इन विशेष योगों में किया गया कोई भी शुभ कार्य दीर्घकालिक फल देता है और घर में समृद्धि का आशीर्वाद लाता है।
इस तरह रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते का प्रतीक नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था, पारिवारिक मूल्यों और भारतीय संस्कृति की जीवंत मिसाल है। मंत्रोच्चारण, शास्त्रीय विधि और प्रेमपूर्ण भावना — ये तीनों मिलकर राखी को एक साधारण धागे से एक अटूट और पवित्र बंधन में बदल देते हैं।




