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नई ‘हाइब्रिड भाषा’ पर उठे सवाल: न हिंदी रही, न अंग्रेज़ी — चिदंबरम

एबीसी डेस्क | 21 दिसंबर 2025

देश में भाषा को लेकर छिड़ी बहस अब केवल शब्दों तक सीमित नहीं रही, बल्कि पहचान और समझ के संकट में बदलती जा रही है। इसी संदर्भ में पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने बीजेपी सरकार की भाषा नीति पर तीखा सवाल उठाया है। उनका कहना है कि सरकार जिस तरह हिंदी शब्दों को अंग्रेज़ी के अक्षरों में लिखने को बढ़ावा दे रही है, उससे एक ऐसी ‘हाइब्रिड भाषा’ पैदा हो रही है, जो न हिंदी की रह जाती है और न अंग्रेज़ी की।

चिदंबरम के इस बयान के पीछे ज़मीनी हकीकत भी सामने रखी जा रही है। हिंदी केवल बोलने की भाषा नहीं, बल्कि उसकी अपनी लिपि, संरचना और सांस्कृतिक आत्मा है। जब हिंदी शब्दों को रोमन लिपि में लिखा जाता है, तो हिंदी जानने वाला आदमी उसे सहज रूप से पढ़ नहीं पाता। वहीं, अंग्रेज़ी जानने वाला आदमी शब्द तो पढ़ लेता है, लेकिन अर्थ से जुड़ नहीं पाता। यही वजह है कि यह भाषा संवाद को आसान करने के बजाय और उलझा देती है।

यही स्थिति हेडलाइन को सही ठहराती है—यह भाषा न हिंदी रह जाती है, क्योंकि उसमें देवनागरी और उसकी गहराई नहीं बचती, और न अंग्रेज़ी बन पाती है, क्योंकि शब्दों का अर्थ और संदर्भ अंग्रेज़ी व्याकरण से मेल नहीं खाता। नतीजा यह कि दोनों भाषाओं के पाठक खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं।

आलोचकों का कहना है कि अगर उद्देश्य लोगों को जोड़ना होता, तो भाषाओं की शुद्धता और सम्मान बनाए रखा जाता। हिंदी को हिंदी की तरह और अंग्रेज़ी को अंग्रेज़ी की तरह इस्तेमाल किया जाता। लेकिन जब दोनों को बिना सोच-विचार के मिलाया जाता है, तो वह एक ऐसी भाषाई अव्यवस्था बन जाती है, जिसमें न स्पष्टता रहती है और न संवेदना।

भाषाविद और सामाजिक कार्यकर्ता भी इस चिंता को गंभीर मानते हैं। उनके अनुसार भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास और सामूहिक स्मृति का आधार होती है। भाषा के साथ इस तरह का प्रयोग आने वाली पीढ़ियों के लिए खतरे की घंटी है, क्योंकि इससे न शुद्ध हिंदी बचेगी और न ही स्पष्ट अंग्रेज़ी।

यही वजह है कि देश में यह सवाल तेज़ी से उठ रहा है कि क्या यही बीजेपी सरकार की भाषा नीति है—एक ऐसी नीति, जिसमें दो जीवित और समृद्ध भाषाओं को इस तरह मिला दिया जाए कि अंत में कोई भी अपनी मूल पहचान के साथ खड़ी न रह सके।

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