राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 अगस्त 2026
अमित शाह के इस्तीफे की मांग पर पीछे नहीं हटेगा छात्र आंदोलन
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा ने साफ कर दिया है कि 20 जुलाई को दिल्ली में पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों और कार्यकर्ताओं पर हुई कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग जारी रहेगी। नेहा के मुताबिक आंदोलन अब केवल पेपर लीक या उस दिन हुई पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि केंद्र सरकार और पुलिस व्यवस्था की जवाबदेही तय करने की व्यापक लड़ाई बन चुका है। उन्होंने कहा कि आंदोलनकारी अमित शाह के इस्तीफे के साथ दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार को पद से हटाने और गिरफ्तार प्रदर्शनकारियों की रिहाई की मांग भी जारी रखेंगे। नेहा का कहना है कि इतनी बड़ी कार्रवाई की जिम्मेदारी केवल निचले स्तर के पुलिस अधिकारियों पर डालकर मामले को खत्म नहीं किया जा सकता और यह स्पष्ट होना चाहिए कि 20 जुलाई की कार्रवाई के फैसले किस स्तर पर लिए गए थे।
23 दिन की भूख हड़ताल कर चुकी हैं नेहा
आंदोलन के दौरान 23 दिन तक भूख हड़ताल पर रहीं AISA अध्यक्ष नेहा ने PTI को दिए इंटरव्यू में कहा कि छात्र आंदोलन अब जवाबदेही के सवाल को केंद्र में रखकर आगे बढ़ेगा। उनका कहना है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई कथित पुलिस कार्रवाई को केवल कुछ पुलिसकर्मियों की व्यक्तिगत गलती बताकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। यदि छात्रों के खिलाफ बल प्रयोग हुआ तो उसकी पूरी प्रशासनिक श्रृंखला की जवाबदेही तय होनी चाहिए। नेहा ने जोर देकर कहा कि आंदोलन का उद्देश्य केवल किसी छोटे अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करवाना नहीं, बल्कि उन लोगों की जिम्मेदारी तय करवाना भी है जिनके अधीन पूरी व्यवस्था काम करती है। इसी कारण अमित शाह के इस्तीफे और दिल्ली पुलिस कमिश्नर को हटाने की मांग को आंदोलन के प्रमुख मुद्दों में बनाए रखा जाएगा।
पेपर लीक से शुरू हुई लड़ाई अब पुलिस जवाबदेही तक पहुंची
छात्रों का आंदोलन मूल रूप से सार्वजनिक परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग को लेकर शुरू हुआ था, लेकिन 20 जुलाई की घटनाओं के बाद आंदोलन का स्वरूप बदल गया। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि दिल्ली में आंदोलन के दौरान पुलिस ने उनके खिलाफ अत्यधिक बल का इस्तेमाल किया। इसके बाद छात्रों और विभिन्न संगठनों ने सवाल उठाया कि शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध से निपटने के लिए पुलिस कार्रवाई की सीमा क्या होनी चाहिए और यदि बल प्रयोग अनुपातहीन था तो इसकी जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होगी। नेहा के मुताबिक अब आंदोलन केवल परीक्षा व्यवस्था में सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है कि लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करने वाले छात्रों के साथ राज्य और पुलिस का व्यवहार कैसा होना चाहिए।
‘जवाबदेही केवल निचले अधिकारियों तक सीमित नहीं हो सकती’
नेहा ने पुलिस जवाबदेही के मुद्दे पर विशेष जोर देते हुए कहा कि किसी बड़ी पुलिस कार्रवाई के बाद केवल निचले स्तर के अधिकारियों या कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहरा देना पर्याप्त नहीं है। उनके मुताबिक यह पता लगना चाहिए कि कार्रवाई के आदेश किसने दिए, निर्णय लेने की प्रक्रिया क्या थी और वरिष्ठ स्तर पर इसकी निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी। छात्र संगठनों का तर्क है कि यदि पुलिस बल के इस्तेमाल को लेकर गंभीर आरोप हैं तो निष्पक्ष जांच के जरिए पूरी कमांड और प्रशासनिक जिम्मेदारी की पड़ताल होनी चाहिए। नेहा का कहना है कि आंदोलन तब तक जवाबदेही की मांग उठाता रहेगा जब तक इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता।
गिरफ्तार प्रदर्शनकारियों की रिहाई भी आंदोलन की बड़ी मांग
AISA अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि अमित शाह के इस्तीफे और दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार को हटाने की मांग के साथ गिरफ्तार किए गए प्रदर्शनकारियों की रिहाई भी आंदोलन के एजेंडे में बनी रहेगी। छात्र संगठनों का कहना है कि पेपर लीक जैसे मुद्दे पर आवाज उठाना युवाओं के भविष्य से जुड़ा लोकतांत्रिक अधिकार है और ऐसे आंदोलनों से निपटने में सरकार तथा पुलिस को संयम दिखाना चाहिए। दूसरी ओर, पुलिस कार्रवाई को लेकर कानून-व्यवस्था और पुलिसकर्मियों के घायल होने जैसे पहलुओं पर भी बहस सामने आई है। ऐसे में आंदोलनकारियों की मांग है कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच हो, ताकि प्रदर्शनकारियों और पुलिस दोनों से जुड़े तथ्यों को सामने लाया जा सके और यह तय किया जा सके कि किस स्तर पर क्या हुआ।
आंदोलन की भाषा पर विवाद, नेहा ने कहा—मुद्दा पुलिस कार्रवाई से न भटके
आंदोलन के दौरान इस्तेमाल की गई भाषा को लेकर पैदा हुए राजनीतिक विवाद के बीच नेहा ने जोर दिया कि मुख्य बहस 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई और उसकी जवाबदेही से नहीं हटनी चाहिए। उनका कहना है कि आंदोलन के किसी नारे, बयान या भाषा को लेकर असहमति हो सकती है, लेकिन उससे उन सवालों का जवाब नहीं मिलता जो पुलिस कार्रवाई को लेकर उठाए गए हैं। छात्र आंदोलन का कहना है कि सार्वजनिक विमर्श का केंद्र इस बात पर रहना चाहिए कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कितना बल इस्तेमाल किया गया, वह जरूरी और अनुपातिक था या नहीं और यदि कहीं ज्यादती हुई तो उसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों और निर्णयकर्ताओं पर क्या कार्रवाई होगी।
पेपर लीक पर कानून सख्त, लेकिन छात्रों के सवाल अभी खत्म नहीं
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों और पेपर लीक से निपटने वाले संशोधित कानून को मंजूरी दे दी है। संशोधित कानून में पेपर लीक से जुड़े मामलों में सख्त कार्रवाई और तेजी से सुनवाई के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों का रास्ता खोलने जैसे प्रावधान किए गए हैं। हालांकि छात्र आंदोलन का कहना है कि कानून में बदलाव के बावजूद पिछले घटनाक्रम और 20 जुलाई की कथित पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही का सवाल खत्म नहीं होता। उनके लिए अब दो मुद्दे समानांतर हैं—एक ओर निष्पक्ष और सुरक्षित परीक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करना और दूसरी ओर आंदोलन के दौरान हुई कथित पुलिस ज्यादती की जवाबदेही तय करवाना।
अब आंदोलन का केंद्र ‘किसने आदेश दिया’ का सवाल
AISA अध्यक्ष के बयान से साफ है कि आने वाले दिनों में छात्र आंदोलन का जोर केवल पेपर लीक के खिलाफ कार्रवाई पर नहीं, बल्कि 20 जुलाई को हुई पुलिस कार्रवाई की निर्णय प्रक्रिया पर भी रहेगा। अमित शाह के इस्तीफे और दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार को हटाने की मांग इस आंदोलन को सीधे केंद्र सरकार की राजनीतिक जवाबदेही से जोड़ती है। सरकार और पुलिस का पक्ष अपनी जगह है, लेकिन आंदोलनकारियों का कहना है कि लोकतंत्र में किसी बड़ी पुलिस कार्रवाई के बाद सवाल पूछना और जवाबदेही की मांग करना नागरिकों का अधिकार है। अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि 20 जुलाई को वास्तव में क्या हुआ, पुलिस कार्रवाई किस परिस्थिति में हुई, उसके आदेश किस स्तर से आए और क्या बल प्रयोग परिस्थितियों के अनुरूप था। इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि यह विवाद केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप बनकर रह जाता है या इससे पुलिस जवाबदेही और लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार पर कोई व्यापक बहस और ठोस कार्रवाई सामने आती है।




