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संस्कृति की रक्षा मौलिक अधिकार, ग्रेट निकोबार परियोजना पर SC का बड़ा हस्तक्षेप

राष्ट्रीय / पर्यावरण | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 5 अक्टूबर 2026

ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि “संस्कृति का संरक्षण संविधान द्वारा संरक्षित मौलिक अधिकार है।” अदालत ने केंद्र सरकार की उस मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसमें परियोजना को चुनौती देने वाली याचिका पर कलकत्ता हाईकोर्ट में चल रही कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से मामले की सुनवाई कर मुद्दों पर बिना अनावश्यक देरी के फैसला करने को कहा।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के सामने यह मामला आया। याचिका पूर्व केंद्रीय पर्यावरण सचिव मीना गुप्ता ने दायर की है। इसमें ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट को द्वीप के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र, जंगलों और वहां रहने वाले आदिवासी समुदायों के अधिकारों के लिए गंभीर खतरा बताया गया है।

याचिका में दावा किया गया है कि परियोजना के लिए 130 वर्ग किलोमीटर से अधिक प्राकृतिक उष्णकटिबंधीय वन क्षेत्र के डायवर्जन से पर्यावरण को व्यापक नुकसान हो सकता है। इसके साथ ही याचिका में वन अधिकार कानून, 2006 के उल्लंघन और निकोबार में रहने वाले शोम्पेन तथा निकोबारी समुदायों की जीवनशैली और सांस्कृतिक पहचान पर पड़ने वाले प्रभाव को भी मुद्दा बनाया गया है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इस मामले को केवल पर्यावरणीय मंजूरी या वन क्षेत्र के इस्तेमाल का विवाद नहीं रहने देती। अदालत ने संस्कृति के संरक्षण को संवैधानिक मौलिक अधिकार से जोड़ते हुए यह संकेत दिया है कि किसी बड़े विकास प्रोजेक्ट का मूल्यांकन करते समय स्थानीय समुदायों की संस्कृति, जीवन-पद्धति और अधिकारों को भी गंभीरता से देखना होगा।

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कलकत्ता हाईकोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की थी, लेकिन पीठ ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। इसके बजाय अदालत ने हाईकोर्ट को मामले की सुनवाई आगे बढ़ाने और संबंधित मुद्दों पर जल्द निर्णय लेने को कहा।

ग्रेट निकोबार परियोजना लंबे समय से पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों को लेकर बहस के केंद्र में है। एक तरफ इसे रणनीतिक, बुनियादी ढांचे और आर्थिक विकास से जुड़ी महत्वपूर्ण परियोजना के रूप में देखा जाता है, वहीं दूसरी तरफ पर्यावरणविदों और आदिवासी अधिकारों से जुड़े पक्षों का कहना है कि इसके लिए प्राकृतिक जंगलों और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाला असर गंभीर हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के सोमवार के रुख ने फिलहाल परियोजना पर रोक नहीं लगाई है, लेकिन हाईकोर्ट में चल रही चुनौती को आगे बढ़ने का रास्ता जरूर साफ रखा है। अब कलकत्ता हाईकोर्ट को परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय प्रभाव, वन अधिकार कानून और स्थानीय समुदायों के अधिकारों से जुड़े सवालों पर विचार करना होगा।

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