पुणे, 28 अक्टूबर 2025
महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा मोड़ तब आया जब राज्य सरकार ने पुणे स्थित वसंतराव दादा शुगर इंस्टीट्यूट (VSI) के फंड की ऑडिट कराने का आदेश जारी किया। यह वही संस्थान है जिसके अध्यक्ष शरद पवार हैं और सदस्य अजित पवार। सरकार ने चीनी आयुक्त को निर्देश दिया है कि संस्थान को रिसर्च के लिए दिए गए फंड के उपयोग की विस्तृत जांच की जाए और इसके लिए एक कमेटी गठित की जाए।
अधिकारियों ने बताया कि यह निर्णय 30 सितंबर को हुई कैबिनेट मीटिंग में लिया गया था और सोमवार को उसके मिनट्स जारी हुए। चीनी आयुक्त संजय कोल्टे ने कहा, “राज्य की हर चीनी मिल से प्रति टन कुचले गए गन्ने पर 1 रुपया VSI के लिए वसूला जाता है। यह पैसा रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए इस्तेमाल होता है। अब कमेटी यह देखेगी कि यह फंड सही जगह खर्च हुआ या नहीं।”
हालांकि कोल्टे ने साफ कहा कि “फंड के दुरुपयोग की कोई शिकायत नहीं आई है। यह केवल कैबिनेट चर्चा के बाद लिया गया निर्णय है।”
लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस कदम को लेकर गहरी हलचल मच गई है। एनसीपी (शरद पवार गुट) के विधायक रोहित पवार ने सरकार के इस आदेश को “सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया” मानने से इनकार किया। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा, “मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का यह आदेश रूटीन नहीं है। ठाणे के बाद अब बीजेपी की नजर बारामती पर है। कल गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि बीजेपी को बैसाखी की जरूरत नहीं, और आज VSI की जांच का आदेश आ गया — क्या यह राजनीतिक बैसाखी कम करने की कोशिश नहीं?”
रोहित ने X (पूर्व ट्विटर) पर भी अपनी नाराजगी जाहिर की, “VSI ने महाराष्ट्र के चीनी उद्योग को नई ऊंचाई दी है। पवार साहेब, अजित दादा और अन्य नेताओं के नेतृत्व में यह संस्थान किसानों के हित में लगातार काम कर रहा है। लेकिन अब इसकी छवि खराब करने की साजिश हो रही है। विपक्ष जब करोड़ों के घोटालों के सबूत देता है, तब सरकार मौन रहती है, पर एक ईमानदार संस्थान को बदनाम करने पर उतारू है। यही है बीजेपी की नई राजनीति।”
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, यह विवाद केवल एक ऑडिट तक सीमित नहीं है — यह सीधे उस भूगोल को छूता है जहाँ से महाराष्ट्र की सत्ता का ‘शुगर बेल्ट’ तय होता है। ठाणे शिंदे का इलाका है, तो बारामती पवार परिवार का गढ़। ऐसे में VSI की जांच को सत्ता की रस्साकशी का नया अध्याय माना जा रहा है।
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या यह जांच ‘प्रशासनिक पारदर्शिता’ का हिस्सा है या फिर ‘राजनीतिक रणनीति’ का एक नया कदम — जिसका लक्ष्य 2029 से पहले बारामती की साख को कमजोर करना है।




