अंतरराष्ट्रीय / कूटनीति/ राजनीति | अमित भास्कर | ABC NATIONAL NEWS | ओस्लो | 18 मई 2026
प्रधानमंत्री Narendra Modi का नॉर्डिक देशों का दौरा इस बार केवल औपचारिक कूटनीतिक यात्रा नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बदलते वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक हालात के बीच बेहद अहम माना जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी सोमवार को नॉर्वे पहुंच रहे हैं, जहां वह नॉर्वे के प्रधानमंत्री Jonas Gahr Støre के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। खास बात यह है कि पिछले 43 वर्षों में यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली द्विपक्षीय नॉर्वे यात्रा है। ऐसे समय में यह दौरा हो रहा है जब दुनिया ऊर्जा संकट, वैश्विक सप्लाई चेन की चुनौतियों और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव से जूझ रही है।
सूत्रों के मुताबिक इस दौरे में व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, नई तकनीक, ग्रीन एनर्जी और वैश्विक संघर्षों पर सबसे अधिक फोकस रहेगा। नॉर्वे दुनिया के बड़े तेल और गैस निर्यातक देशों में गिना जाता है और भारत लगातार अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखने की दिशा में नए साझेदारों की तलाश कर रहा है। हाल ही में होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ी वैश्विक चिंताओं और तेल सप्लाई पर मंडराते खतरे के बीच यह यात्रा और भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत की कोशिश है कि ऊर्जा आपूर्ति केवल मध्य पूर्व पर निर्भर न रहे, बल्कि यूरोपीय और नॉर्डिक देशों के साथ भी मजबूत सहयोग विकसित किया जाए।
प्रधानमंत्री मोदी और नॉर्वे के प्रधानमंत्री के बीच होने वाली बातचीत में भारत-ईएफटीए व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौते यानी TEPA की प्रगति की भी समीक्षा होगी। यह समझौता आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड जैसे देशों के साथ अक्टूबर 2025 में लागू हुआ था। भारत इस समझौते को यूरोपीय बाजारों तक अपनी पहुंच मजबूत करने के बड़े अवसर के रूप में देख रहा है। माना जा रहा है कि इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के उद्योग जगत के प्रतिनिधियों के बीच भी कई अहम चर्चाएं होंगी। व्यापारिक सहयोग बढ़ाने के लिए बिजनेस समिट का आयोजन भी प्रस्तावित है, जहां नई तकनीक, समुद्री व्यापार, हरित ऊर्जा और डिजिटल नवाचार जैसे मुद्दों पर साझेदारी को आगे बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह दौरा केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारत अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखते हुए नए सहयोगी देशों के साथ संबंध मजबूत करने की नीति पर काम कर रहा है। नॉर्डिक देश तकनीक, जलवायु परिवर्तन, आर्कटिक रिसर्च और सतत विकास के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में माने जाते हैं। भारत इन देशों के अनुभव और निवेश का लाभ उठाना चाहता है।
प्रधानमंत्री मोदी के इस दौरे के दौरान रक्षा सहयोग और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी चर्चा होने की संभावना जताई जा रही है। हिंद महासागर से लेकर आर्कटिक क्षेत्र तक बदलते सामरिक समीकरणों के बीच भारत और नॉर्डिक देशों के बीच रणनीतिक सहयोग को नई दिशा मिल सकती है। सूत्रों के अनुसार भारत विशेष रूप से ग्रीन शिपिंग, समुद्री तकनीक और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में नॉर्डिक देशों के साथ सहयोग बढ़ाने को लेकर गंभीर है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह यात्रा प्रधानमंत्री मोदी की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत भारत यूरोप और स्कैंडिनेवियाई देशों के साथ अपने आर्थिक और सामरिक रिश्तों को नई ऊंचाई देना चाहता है। हाल के वर्षों में भारत और पश्चिमी देशों के बीच संबंध तेजी से मजबूत हुए हैं और अब भारत वैश्विक सप्लाई चेन, ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी सहयोग में बड़ी भूमिका निभाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब दुनिया नई आर्थिक चुनौतियों और वैश्विक अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। ऐसे में भारत की कोशिश केवल व्यापार बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह खुद को एक स्थिर, भरोसेमंद और रणनीतिक साझेदार के रूप में स्थापित करना चाहता है। ओस्लो में होने वाली यह बैठक आने वाले वर्षों में भारत-नॉर्डिक संबंधों की दिशा तय करने वाली अहम कड़ी मानी जा रही है।




