राष्ट्रीय | अवधेश झा | ABC NATIONAL NEWS | 10 मई 2026
देश में किसानों की आत्महत्या का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक पोस्टर में दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री Narendra Modi के नेतृत्व वाली सरकार के 11 वर्षों के दौरान 2014 से 2024 के बीच 1,21,806 किसानों ने आत्महत्या की। पोस्टर में यह आंकड़ा NCRB यानी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के हवाले से बताया गया है। वायरल पोस्ट में किसानों की समस्याओं जैसे कर्ज, महंगाई, MSP और बेरोजगारी को प्रमुख मुद्दा बनाते हुए सरकार पर सवाल उठाए गए हैं। पोस्टर में लिखा गया है — “वादे बहुत किए, किसानों के लिए क्या किया?” इसके साथ ही “अन्नदाता रो रहा है, सत्ताधारी खामोश हैं” जैसे संदेश भी दिए गए हैं।
विपक्षी दल और किसान संगठनों से जुड़े सोशल मीडिया अकाउंट इस पोस्ट को शेयर कर केंद्र सरकार की कृषि नीतियों पर सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि किसानों की आय दोगुनी करने, लागत कम करने और MSP की कानूनी गारंटी जैसे मुद्दों पर सरकार अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाई। खासतौर पर छोटे और सीमांत किसानों की आर्थिक स्थिति को लेकर चिंता जताई जा रही है।
हालांकि बीजेपी और सरकार समर्थक नेताओं ने इन आरोपों को राजनीतिक प्रचार बताया है। उनका कहना है कि केंद्र सरकार ने पिछले वर्षों में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, फसल बीमा योजना, सिंचाई परियोजनाओं, डिजिटल कृषि मिशन और रिकॉर्ड कृषि बजट जैसे कई कदम उठाए हैं। बीजेपी नेताओं का दावा है कि कृषि क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीक आधारित बदलावों से किसानों को लंबे समय में फायदा होगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसान आत्महत्या का मुद्दा केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक चुनौती भी है। खेती की बढ़ती लागत, मौसम की अनिश्चितता, बाजार में अस्थिरता, कर्ज और फसल नुकसान जैसे कारण लंबे समय से किसानों पर दबाव बढ़ाते रहे हैं। कई राज्यों में यह समस्या लगातार गंभीर बनी हुई है।
NCRB के आंकड़ों को लेकर भी बहस जारी है। जानकारों का कहना है कि अलग-अलग श्रेणियों में दर्ज मामलों की व्याख्या राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से करते हैं। ऐसे में आंकड़ों की प्रस्तुति और उसके राजनीतिक इस्तेमाल पर भी सवाल उठ रहे हैं।
फिलहाल सोशल मीडिया पर वायरल यह पोस्ट देश में कृषि संकट, किसानों की आय और सरकारी नीतियों को लेकर नई राजनीतिक बहस को जन्म दे चुका है। विपक्ष इसे सरकार की “विफलता” बता रहा है, जबकि बीजेपी इसे “भ्रामक नैरेटिव” करार दे रही है। आने वाले समय में यह मुद्दा संसद से लेकर चुनावी मंचों तक और अधिक गरमा सकता है।




