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ओपिनियन | NEET पास करने के बावजूद असुरक्षा: नफरत की राजनीति में कितना बदल गया भारत

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अवधेश कुमार | नई दिल्ली 10 जनवरी 2026

भारत को लंबे समय तक दुनिया के सामने एक ऐसे लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में पेश किया जाता रहा है, जहाँ मेहनत, योग्यता और समान अवसर ही तरक्की की असली कसौटी माने जाते हैं। भारतीय संविधान हर आदमी को यह भरोसा देता है कि उसकी पहचान, उसका धर्म या उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि उसकी काबिलियत के रास्ते में दीवार नहीं बनेगी। यही वह विचार था, जिसने इस देश को एकजुट रखा, जिसने लाखों गरीब और साधारण परिवारों को सपने देखने की हिम्मत दी। लेकिन माता वैष्णो देवी ट्रस्ट से जुड़े मेडिकल कॉलेज की मान्यता रद्द होने की घटना इस भरोसे को भीतर तक तोड़ देती है। यह मामला सिर्फ एक संस्थान का नहीं है, बल्कि यह बताता है कि आज का भारत धीरे-धीरे उस रास्ते पर बढ़ रहा है, जहाँ भीड़, नफरत और कट्टरपंथ योग्यता से ऊपर बैठकर फैसले लेने लगे हैं, और यही किसी भी लोकतंत्र के पतन की सबसे खतरनाक शुरुआत होती है।

माता वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज में हुए दाख़िले किसी गुप्त सौदे, सिफारिश, बैकडोर एंट्री या धार्मिक कोटे के ज़रिये नहीं हुए थे। ये दाख़िले NEET जैसी राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से हुए थे, जिसे भारत सरकार, सुप्रीम कोर्ट और पूरी व्यवस्था देश की सबसे निष्पक्ष और पारदर्शी परीक्षा बताती है। NEET का मूल विचार यही है कि देश का हर छात्र—चाहे वह किसी भी राज्य, भाषा या धर्म से हो—एक ही सवाल-पत्र, एक ही नियम और एक ही मेरिट लिस्ट के आधार पर परखा जाएगा। यही परीक्षा तय करती है कि कौन डॉक्टर बनने के योग्य है। लेकिन जैसे ही परिणाम सामने आए और यह तथ्य उजागर हुआ कि 50 सीटों में से 42 मुस्लिम छात्र, 1 सिख और 7 हिंदू छात्र सफल हुए हैं, पूरा विमर्श बदल गया। अचानक योग्यता गौण हो गई और धर्म केंद्र में आ गया। सवाल यह नहीं पूछा गया कि क्या परीक्षा में कोई तकनीकी गड़बड़ी हुई थी, बल्कि सवाल यह बना दिया गया कि “इतने ज़्यादा मुस्लिम कैसे पास हो गए?”

यह सवाल अपने आप में उस बीमार मानसिकता को उजागर करता है, जो आज देश के एक हिस्से में गहराई से बैठ चुकी है। इसका साफ़ अर्थ यह है कि योग्यता तब तक स्वीकार्य है, जब तक उसके नतीजे किसी खास वैचारिक या धार्मिक अपेक्षा के अनुरूप हों। जैसे ही परिणाम उस सोच से बाहर निकलते हैं, पूरे सिस्टम को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। यह सोच सिर्फ इन छात्रों के लिए नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र के लिए ज़हर है, क्योंकि इससे यह संदेश जाता है कि मेहनत, प्रतिभा और ईमानदार प्रतिस्पर्धा की कोई गारंटी नहीं है—अगर आपकी पहचान “गलत” मानी जाती है।

माता के नाम पर नफरत: आस्था का राजनीतिक अपमान

माता वैष्णो देवी करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक हैं। उनके दरबार में हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं, जहाँ न कोई धर्म पूछा जाता है, न जाति, न पहचान। लेकिन इस पूरे विवाद में जिस तरह माता के नाम का इस्तेमाल किया गया, वह आस्था का नहीं बल्कि राजनीतिक और वैचारिक अपमान है। यह कहा गया कि “माता का पैसा मुसलमानों पर क्यों खर्च होगा?” यह तर्क न सिर्फ असंवैधानिक है, बल्कि नैतिक और धार्मिक रूप से भी खोखला है। माता वैष्णो देवी ट्रस्ट कोई निजी धार्मिक जागीर नहीं है, बल्कि एक सार्वजनिक ट्रस्ट है, जिसका उद्देश्य सेवा, शिक्षा और मानव कल्याण है। क्या माता की करुणा किसी एक धर्म तक सीमित है? क्या माता के दरबार में प्रवेश से पहले कोई धर्म का प्रमाण-पत्र दिखाना पड़ता है?

इन छात्रों ने माता से कोई विशेष रियायत नहीं मांगी थी। उन्होंने सिर्फ NEET दी थी—वही परीक्षा, जो हर हिंदू, सिख, ईसाई और मुस्लिम छात्र देता है। लेकिन कट्टरपंथी ताकतों ने माता की आस्था को भी नफरत के हथियार में बदल दिया। यही वह राजनीति है, जिसमें धर्म को जोड़ने के बजाय तोड़ने का औज़ार बना दिया जाता है, और आस्था को इंसानियत के खिलाफ खड़ा कर दिया जाता है।

मान्यता रद्द करना: बच्चों के भविष्य पर सामूहिक वार

कॉलेज की मान्यता रद्द होना सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि सीधे-सीधे बच्चों के भविष्य पर सामूहिक हमला है। इन 50 छात्रों ने सालों मेहनत की, कठिन प्रतिस्पर्धा का सामना किया, अपने माता-पिता की उम्मीदों और सीमित संसाधनों के बीच एक सपना देखा और उसे हासिल किया। लेकिन एक झटके में उनके सपनों को अधर में डाल दिया गया। इससे एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—अगर NEET जैसी राष्ट्रीय परीक्षा पास करने के बाद भी छात्रों का भविष्य सुरक्षित नहीं है, तो इस देश में शिक्षा की विश्वसनीयता क्या रह जाती है?

इस फैसले से नुकसान सिर्फ छात्रों का नहीं हुआ, बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी गहरी चोट पहुंची है। दुनिया अब यह पूछेगी कि क्या भारत में राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं का कोई वास्तविक महत्व है, या फिर यहां परिणाम धर्म देखकर बदले जा सकते हैं। यह संदेश शिक्षा, निवेश और वैश्विक सहयोग—हर स्तर पर भारत को कमजोर करता है।

संघ–बीजेपी की विचारधारा और खामोशी की राजनीति

संघ, बीजेपी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह बार-बार “सबका साथ, सबका विकास” की बात करते हैं। वे दावा करते हैं कि वे मेरिट के खिलाफ नहीं हैं और सभी नागरिकों को समान अवसर देना चाहते हैं। लेकिन जब ऐसे मामले सामने आते हैं, तो उनकी चुप्पी बहुत कुछ कह जाती है। यह वही चुप्पी है, जो नफरत को मौन समर्थन देती है। अगर आज सत्ता में बैठे लोग साफ़ शब्दों में यह नहीं कहते कि योग्यता धर्म से ऊपर है, तो यह संदेश जाता है कि वे भीड़ के दबाव के आगे झुकने को तैयार हैं।

यह मानसिकता देश को उस रास्ते पर ले जा रही है, जहाँ फैसले अदालतों, संस्थाओं और संविधान से नहीं, बल्कि सड़कों पर लगे नारों से तय होंगे। यही भीड़तंत्र की पहचान है, और इतिहास गवाह है कि भीड़तंत्र ने कभी किसी देश को मजबूत नहीं किया।

जश्न का नैतिक दिवालियापन

सबसे भयावह तथ्य यह है कि कॉलेज की मान्यता रद्द होने के बाद कुछ लोगों ने इसे “जीत” के रूप में मनाया। यह जश्न किस बात का था? उन छात्रों के टूटे सपनों का? उन माता-पिता की उम्मीदों का, जिन्होंने अपने बच्चों को डॉक्टर बनने का सपना दिखाया था? या इस बात का कि “हमने उन्हें सबक सिखा दिया”? यह जश्न बताता है कि समाज का एक हिस्सा अब नफरत को नैतिक जीत मानने लगा है। और जब नफरत जीत का कारण बन जाए, तो समाज का नैतिक पतन तय हो जाता है।

आज मुसलमान, कल कौन?

यह मान लेना एक बड़ी भूल होगी कि यह समस्या सिर्फ मुसलमानों तक सीमित है। आज निशाने पर मुस्लिम छात्र हैं, कल कोई और होगा। आज मेडिकल कॉलेज है, कल कोई और विश्वविद्यालय। आज डॉक्टर बनने का सपना कुचला गया है, कल इंजीनियर, वैज्ञानिक या अफसर बनने का। अगर योग्यता को धर्म के तराजू पर तौला जाने लगा, तो कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा।

भारत के सामने आख़िरी सवाल

माता वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज का मामला एक चेतावनी है। यह हमें बताता है कि अगर हमने आज योग्यता, संविधान और इंसानियत के पक्ष में खड़े होने का साहस नहीं दिखाया, तो कल यह देश सिर्फ नाम का लोकतंत्र रह जाएगा। सवाल यह नहीं है कि 42 मुस्लिम छात्र क्यों पास हुए। असली सवाल यह है कि क्या हम उस भारत को बचा पाएंगे, जहाँ मेहनत की इज़्ज़त होती थी? अगर जवाब “हां” है, तो नफरत के खिलाफ बोलना होगा। अगर जवाब “नहीं” है, तो हमें स्वीकार करना होगा कि हम भीड़तंत्र की ओर बढ़ चुके हैं। और यह स्वीकारोक्ति, किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे खतरनाक क्षण होती है।

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