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ऑन-स्क्रीन Kissing दिखावा, 100 लोगों के बीच रोमांस, कोई फील नहीं, बस कैमरा और पसीना : गिरिजा ओक

श्रेया चौहान | मुंबई 22 नवंबर 2025

मराठी सिनेमा की प्रतिभाशाली और अब सोशल मीडिया की नई नेशनल क्रश कही जा रही एक्ट्रेस गिरिजा ओक इन दिनों चर्चा के केंद्र में हैं। हाल ही में उनकी ब्लू साड़ी में एक तस्वीर ने इंटरनेट पर सनसनी मचा दी, जिसकी तुलना मोनिका बेलुची और हॉलीवुड स्टार सिडनी स्वीनी तक से की जाने लगी। लेकिन इस ग्लैमर और सराहना के बीच गिरिजा ने ऐसा बयान दिया जिसने बॉलीवुड और दर्शकों की रोमांटिक कल्पनाओं पर करारा प्रहार कर दिया। उन्होंने खुलकर कहा कि ऑन-स्क्रीन रोमांस और Kissing सीन असल में जितने इमोशनल और पैशनेट दिखाई देते हैं, उतने होते बिल्कुल नहीं—बल्कि कई बार तो ऐसा लगता है जैसे कार्डबोर्ड को Kiss कर रहे हों!

गिरिजा ने बताया कि जब भी वह महिला दर्शकों के बीच किसी इवेंट में जाती हैं, उनसे सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला सवाल यही होता है कि वो किसी अजनबी पुरुष के साथ कैमरे के सामने इतनी रोमांटिक केमिस्ट्री कैसे बना लेती हैं? दर्शक अक्सर सोचते हैं कि रोमांटिक सीन किसी सपनों की दुनिया की तरह होते हैं—सॉफ्ट लाइटिंग, संगीत, भावनाएं और दो कलाकारों के बीच असली रोमांस। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। उन्होंने मनोज बाजपेयी के साथ अपनी फिल्म ‘इंस्पेक्टर जेंडे’ का उदाहरण देते हुए कहा कि लोग नहीं जानते कि रोमांटिक सीन्स की शुरुआत तकनीकी अफरा-तफरी से होती है—लाइटिंग, एंगल, साउंड, और कैमरा फ्रेमिंग। कलाकारों के लिए सबसे पहले ये सभी चीजें मायने रखती हैं, भावनाएं बाद में आती हैं, वो भी तब जब डायरेक्टर की ‘कट!’ की आवाज़ नहीं गूंज रही हो।

उन्होंने हंसते हुए बताया कि सेट पर अक्सर 100 से 150 लोग मौजूद होते हैं। पंखे और AC बंद कर दिए जाते हैं ताकि साउंड में दिक्कत न आए, जिसकी वजह से कलाकार पसीने से तरबतर हो जाते हैं। कॉस्ट्यूम भारी होते हैं, माइक्रोफोन ट्रांसमीटर गर्म हो रहा होता है, और कोई हेयर ड्रायर लेकर उनके पसीने सुखा रहा होता है। ऐसे माहौल में जब दर्जनों जोड़ी आँखें आपको तकनीकी नजर से देख रही हों, तो रोमांस या इंटीमेट सीन करना इंसानी भावनाओं से ज्यादा एक मशीन की तरह काम करना होता है। गिरिजा ने साफ कहा—“उस समय ऑन-स्क्रीन Kissing सिर्फ दिखावा लगता है, जैसे किसी कार्डबोर्ड को Kiss कर रहे हों…कोई फीलिंग नहीं होती।”

एक और चौंकाने वाली बात उन्होंने यह बताई कि कई इमोशनल क्लोज-अप सीन बिना को-एक्टर के शूट होते हैं। वो कैमरे के सामने खड़ी होती हैं, लेकिन सामने कोई इंसान नहीं होता—सिर्फ एक थर्मोकोल का टुकड़ा, एक लाइट स्टैंड या काले कपड़े का टुकड़ा। दर्शक जो संवाद कलाकारों के बीच गहरे प्यार के भाव से सुनते हैं, वो अक्सर एक निर्जीव वस्तु को देखते हुए बोला गया होता है। इस खुलासे ने फैंस को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि पर्दे पर जो रोमांस इतना असली लगता है, असल में वह कितना कृत्रिम और तकनीकी प्रक्रियाओं से बना हुआ होता है।

वर्कफ्रंट की बात करें तो गिरिजा ओक ने कम उम्र में मराठी फिल्म ‘गोश्त छोटी डोंगराएवधी’ से करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद उन्होंने ‘गुलमोहर’, ‘मानिनी’, ‘अडगुले मडगुले’, ‘तारे जमीन पर’, ‘शोर इन द सिटी’ और हाल ही में ब्लॉकबस्टर ‘जवान’ जैसी फिल्मों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। उनकी खूबसूरती ही नहीं, बल्कि अभिनय की गंभीरता और सहजता ने भी दर्शकों का दिल जीता है, जिसकी वजह से वह आज नेशनल लेवल पर पहचान बना चुकी हैं।

उनका यह बयान एक ऐसी हकीकत सामने लाता है जिसे दर्शक शायद ही कभी समझ पाते हैं—फिल्मों की चमकती स्क्रीन के पीछे की दुनिया कितनी असहज, तकनीकी और कभी-कभी भावनाहीन होती है। लेकिन फिर भी, कैमरे पर वही सीन जादू की तरह दिखाई देता है, जो लाखों दिलों को धड़काता है। यही है सिनेमा की असली शक्ति—भ्रम को वास्तविक बना देना। गिरिजा ओक का यह ईमानदार स्वीकार न सिर्फ रोचक है, बल्कि फिल्मी दुनिया की चमक-दमक के पीछे छिपी कठिनाई और पेशेवराना अनुशासन को भी उजागर करता है।

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