व्यापार/ अर्थव्यवस्था | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 15 सितंबर 2026
महंगा तेल और कमजोर रुपया—दोहरी मार
भारत की अर्थव्यवस्था के सामने मंगलवार को एक साथ दो बड़ी चुनौतियां दिखाई दीं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़कर करीब 106.9 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई, वहीं भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 95.79 रुपये प्रति डॉलर पर आ गया। रुपये में करीब 0.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई और यह लगभग एक महीने के अपने सबसे कमजोर स्तर के आसपास पहुंच गया। इसी दबाव के बीच बाजार के चार कारोबारियों के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई ने विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया, ताकि रुपये में अचानक और ज्यादा गिरावट न आए।
आरबीआई ने डॉलर बेचकर रुपये को संभाला?
रॉयटर्स से बात करने वाले चार कारोबारियों के अनुसार, सरकारी बैंकों को बाजार में डॉलर बेचते हुए देखा गया। कारोबारियों का मानना है कि ये डॉलर बिक्री आरबीआई की ओर से की जा रही थी। हालांकि डॉलर की बिक्री बहुत भारी मात्रा में नहीं थी। मुंबई के एक बैंक के कारोबारी के अनुसार, इसका उद्देश्य रुपये की गिरावट को पूरी तरह पलटना नहीं, बल्कि बाजार में जरूरत से ज्यादा उतार-चढ़ाव को रोकना हो सकता है। यानी आरबीआई फिलहाल रुपये को किसी एक स्तर पर जबरन रोकने के बजाय बाजार में अचानक आने वाले झटके को कम करने की कोशिश कर रहा हो सकता है।
रुपया 95.79 तक क्यों फिसला?
रुपये पर इस समय कई तरफ से दबाव बन रहा है। सबसे बड़ा दबाव महंगे कच्चे तेल का है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो भारत को तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ती है। इससे डॉलर की मांग बढ़ सकती है और रुपये पर दबाव आ सकता है। आसान भाषा में समझें तो तेल महंगा होने पर भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं और इससे रुपये के कमजोर होने का खतरा बढ़ता है।
106.9 डॉलर का तेल भारत के लिए क्यों चिंता की बात है?
ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत मंगलवार को करीब 106.9 डॉलर प्रति बैरल रही, जो पिछले स्तर से लगभग 1.2 प्रतिशत ज्यादा थी। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए कच्चे तेल की कीमत में लगातार बढ़ोतरी महत्वपूर्ण है। महंगा तेल सिर्फ पेट्रोल-डीजल की कीमतों का सवाल नहीं है। इसका असर परिवहन, माल ढुलाई, विमानन, उद्योग और कई दूसरी वस्तुओं की लागत पर भी पड़ सकता है। अगर तेल लंबे समय तक महंगा रहता है, तो देश के आयात बिल और व्यापार घाटे पर भी दबाव बढ़ सकता है।
अमेरिका की ब्याज दर भी रुपये के लिए चुनौती
रुपये पर सिर्फ तेल का दबाव नहीं है। बाजार में इस सप्ताह अमेरिका में ब्याज दर बढ़ने की संभावना को लेकर भी दांव बढ़ रहे हैं। अगर अमेरिकी ब्याज दर बढ़ती है या बाजार को ऐसा संकेत मिलता है कि अमेरिकी दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं, तो डॉलर मजबूत हो सकता है। ऐसी स्थिति में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बढ़ सकता है। भारत का रुपया भी इससे प्रभावित होता है।
आरबीआई का लक्ष्य रुपये को बचाना नहीं, ज्यादा झटका रोकना भी हो सकता है
यह समझना जरूरी है कि विदेशी मुद्रा बाजार में आरबीआई के हस्तक्षेप का मतलब यह जरूरी नहीं कि केंद्रीय बैंक रुपये को हमेशा किसी निश्चित स्तर पर बनाए रखना चाहता है। केंद्रीय बैंक के पास विदेशी मुद्रा भंडार होता है और जरूरत पड़ने पर वह डॉलर खरीद या बेचकर बाजार में तरलता और उतार-चढ़ाव को प्रभावित कर सकता है। इस मामले में कारोबारियों का अनुमान है कि डॉलर की बिक्री बहुत भारी नहीं थी, जिससे संकेत मिलता है कि उद्देश्य रुपये को किसी कीमत पर ऊपर उठाना नहीं, बल्कि अचानक होने वाली तेज गिरावट को नियंत्रित करना हो सकता है।
आम आदमी तक इसका असर कैसे पहुंच सकता है?
रुपया कमजोर होने और तेल महंगा होने का असर तुरंत हर चीज पर दिखाई नहीं देता, लेकिन अगर यह स्थिति बनी रहती है तो इसका प्रभाव धीरे-धीरे व्यापक अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है। विदेश से आने वाला कच्चा माल, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक सामान और ऊर्जा से जुड़ी चीजें महंगी हो सकती हैं। तेल महंगा होने पर परिवहन लागत बढ़ सकती है। इसका असर कंपनियों की लागत पर पड़ सकता है और कुछ मामलों में इसका भार अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।
भारत के लिए असली चिंता तेल और डॉलर का मेल
एक तरफ अगर कच्चे तेल की कीमत बढ़ रही हो और दूसरी तरफ रुपया कमजोर हो रहा हो, तो भारत के लिए दबाव और बढ़ जाता है। उदाहरण के तौर पर भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल खरीदने के लिए डॉलर देने पड़ते हैं। अगर तेल की डॉलर कीमत बढ़ जाए और उसी समय एक डॉलर खरीदने के लिए ज्यादा रुपये देने पड़ें, तो घरेलू मुद्रा में तेल की लागत पर दोहरा दबाव बन सकता है। यही वजह है कि तेल की कीमत और रुपये की कीमत भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक-दूसरे से जुड़ी हुई बड़ी चिंताएं हैं।
अब बाजार की नजर आरबीआई और तेल दोनों पर
आने वाले दिनों में दो चीजें बेहद महत्वपूर्ण होंगी—पहली, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत कहां जाती है और दूसरी, अमेरिकी ब्याज दर को लेकर क्या फैसला और संकेत सामने आते हैं। अगर तेल और डॉलर दोनों मजबूत रहते हैं, तो रुपये पर दबाव बना रह सकता है। ऐसे में बाजार की नजर इस बात पर भी रहेगी कि आरबीआई विदेशी मुद्रा बाजार में कितनी और किस तरह की भूमिका निभाता है।
फिलहाल तस्वीर साफ है—महंगा कच्चा तेल भारत के आयात बिल पर दबाव डाल रहा है, रुपया 95.79 तक कमजोर हुआ है और बाजार में आरबीआई के हस्तक्षेप के संकेत मिल रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अगर तेल 100 डॉलर से ऊपर लंबे समय तक बना रहा और डॉलर भी मजबूत होता गया, तो क्या सिर्फ आरबीआई का हस्तक्षेप रुपये और महंगाई के दबाव को लंबे समय तक रोक पाएगा?



