नई दिल्ली, 23 अक्टूबर 2025:
‘तानाशाही का डिजिटल संस्करण’, अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सीधा हमला
भारतीय लोकतंत्र के नाम पर केंद्र सरकार ने स्वयं को ‘डिजिटल प्रहरी’ की एक नई और विवादास्पद भूमिका में स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। केंद्र सरकार द्वारा लाए गए आईटी नियम 2021 में किए गए हालिया संशोधन को लेकर देश भर में तीखी बहस छिड़ गई है। आलोचक और विशेषज्ञ इस संशोधन को “तानाशाही का डिजिटल संस्करण” करार दे रहे हैं, जो भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा और सुनियोजित हमला है। नए नियमों के तहत अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, वेबसाइट्स और सभी डिजिटल मीडिया संस्थानों को सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों से जुड़ी किसी भी “भ्रामक या झूठी जानकारी” को हटाने या प्रसारित होने से रोकने का कड़ा निर्देश दिया गया है।
इस संशोधन का सीधा अर्थ यह है कि यदि कोई वेबसाइट, स्वतंत्र पत्रकार या वैकल्पिक मीडिया सरकार की नीतियों की गंभीर आलोचना करता है, या शासन पर सवाल उठाता है, तो उसे सरकार द्वारा नियुक्त निकाय द्वारा आसानी से “फेक न्यूज” का ठप्पा लगाकर दबाया जा सकता है, जिससे स्वतंत्र मीडिया के लिए एक अभूतपूर्व खतरा उत्पन्न हो गया है।
सरकार की दलील और विरोध की मुखर आवाज़
सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस कदम का बचाव करते हुए दावा किया है कि यह बदलाव देश में “खुले, सुरक्षित और जवाबदेह इंटरनेट” के माहौल को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है। उनके अनुसार, यह संशोधन फेक न्यूज, डीपफेक वीडियो जैसी तेज़ी से बढ़ती समस्याओं पर अंकुश लगाने में सहायक होगा, और सरकार स्वयं भी अपने डिजिटल कार्यों में अधिक जवाबदेह बनेगी।
हालांकि, सरकार की इस दलील को डिजिटल विशेषज्ञों, स्वतंत्र मीडिया संस्थानों और मानवाधिकार संगठनों ने सिरे से खारिज कर दिया है। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन जैसे संगठनों ने इस संशोधन को “गहरा चिंताजनक” बताते हुए कहा है कि, “अगर सरकार स्वयं ही यह तय करेगी कि क्या झूठ है और क्या सच, तो लोकतंत्र का असली सच कौन बोलेगा?” पत्रकारों और वेब संपादकों के बीच सबसे बड़ा डर ‘भ्रामक’ शब्द की अस्पष्टता को लेकर है, जिसके चलते अब हर असहज सवाल, हर तीखी आलोचना, और हर खोजी पत्रकारिता को आसानी से सत्ता के असंतोष के कारण दबाया जा सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह संशोधन भारत को उसी रास्ते पर ले जा सकता है, जो कई देशों में डिजिटल सेंसरशिप की ओर गया है—जिसमें चीन की तरह नियंत्रित इंटरनेट या रूस जैसे सीमित मीडिया स्पेस की झलक भारत में दिखने लगी है।
संवैधानिक स्वतंत्रता पर नियंत्रण और ‘डिजिटल आपातकाल’ की चेतावनी
आईटी नियमों में किए गए इस संशोधन का संभावित असर यह होगा कि अब किसी भी डिजिटल संस्था को “सरकारी संतोष” बनाए रखना अनिवार्य होगा, अन्यथा उन प्लेटफॉर्म्स और संस्थाओं पर कानूनी कार्रवाई या सामग्री हटाने का दबाव संभव है। यह स्थिति विशेष रूप से स्वतंत्र वेबसाइट्स, वैकल्पिक मीडिया आउटलेट्स और आलोचनात्मक आवाजों के लिए खतरे की घंटी है, क्योंकि जो संस्था या व्यक्ति सरकार की आलोचना करेगा, उसे तुरंत ‘फेक न्यूज’ का आरोपी ठहराया जा सकता है।
कानूनी विशेषज्ञों ने इस संशोधन को लेकर कड़ी चेतावनी जारी की है, जिसमें कहा गया है कि सरकार ने “डिजिटल जवाबदेही” की आड़ में संवैधानिक स्वतंत्रता पर नियंत्रण की तैयारी की है। उनकी राय में, यह आईटी नियम 2021 का एक ऐसा खतरनाक संस्करण है जिसमें ‘लोकतंत्र’ शब्द का प्रयोग तो किया गया है, लेकिन उसकी मूल आत्मा (अभिव्यक्ति की आज़ादी) को क्षीण कर दिया गया है।
निष्कर्ष रूप में, भले ही सरकार इस संशोधन को फेक न्यूज के खिलाफ एक आवश्यक हथियार बता रही हो, लेकिन विपक्ष, नागरिक समाज और मीडिया जगत का स्पष्ट मानना है कि “यह बिल नहीं, बल्कि देश में लागू किए जा रहे एक अघोषित डिजिटल आपातकाल का प्रील्यूड है,” जो भारत की लोकतांत्रिक जड़ों को कमजोर करने की क्षमता रखता है।




