सरोज सिंह | पटना, 21 दिसंबर 2025
पटना के सियासी गलियारों में इन दिनों एक ही सवाल घूम रहा है—अप्रैल 2026 में बिहार से खाली होने वाली राज्यसभा की पांच सीटों पर किसका भाग्य चमकेगा? विधानसभा में एनडीए की मजबूत स्थिति (243 में से 202 विधायक) को देखते हुए यह लगभग तय माना जा रहा है कि सभी पांच सीटें एनडीए के खाते में जाएंगी। लेकिन असली मुकाबला सीटों की संख्या का नहीं, बल्कि आपसी बंटवारे और नए-पुराने चेहरों के चयन का है।
सूत्रों के मुताबिक, भाजपा इस बार नए और मजबूत चेहरों को आगे बढ़ाने के मूड में है। पार्टी के नए राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन का नाम सबसे आगे चल रहा है। बिहार सरकार में मंत्री और पांच बार के विधायक रहे नवीन को संगठन का अनुभवी और भरोसेमंद चेहरा माना जाता है। हाल में मिली राष्ट्रीय जिम्मेदारी के बाद उन्हें राज्यसभा भेजना भाजपा के लिए युवा नेतृत्व, संगठनात्मक संतुलन और सामाजिक संदेश—तीनों लिहाज से अहम कदम माना जा रहा है।
दूसरा नाम जो चर्चा में है, वह है भोजपुरी सुपरस्टार और भाजपा नेता पवन सिंह। पवन की लोकप्रियता खासकर ग्रामीण इलाकों और युवाओं में जबरदस्त मानी जाती है। पार्टी रणनीतिक तौर पर उन्हें राज्यसभा भेजकर सांस्कृतिक और सामाजिक संदेश देना चाहती है, जिससे आने वाले चुनावों में पार्टी की पकड़ और मजबूत हो। विधानसभा चुनाव न लड़ने के उनके फैसले के बाद राज्यसभा उनके लिए बेहतर और असरदार मंच साबित हो सकता है।
दूसरी ओर, केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के लिए तस्वीर थोड़ी कठिन दिख रही है। विधानसभा में उनकी पार्टी के पास सिर्फ चार विधायक हैं। एनडीए के भीतर इस बार सीटों का फैसला संख्या बल और राजनीतिक उपयोगिता के आधार पर होने की संभावना है। कुशवाहा का राज्यसभा कार्यकाल खत्म हो रहा है और अगर छोटे सहयोगियों को सीमित प्राथमिकता मिली, तो उनकी सीट पर संकट खड़ा हो सकता है। हालांकि, कुशवाहा समाज में उनकी पकड़ को देखते हुए एनडीए उन्हें किसी न किसी रूप में एडजस्ट करने की कोशिश कर सकता है।
गणित की बात करें तो राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए करीब 41 विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है। एनडीए के पास इतनी संख्या है कि वह बिना किसी परेशानी के सभी पांच सीटें निकाल सकता है। माना जा रहा है कि जदयू अपने कोटे से हरिवंश और रामनाथ ठाकुर जैसे अनुभवी चेहरों को दोबारा मौका दे सकती है, जबकि लोजपा (रामविलास) को भी एक सीट मिलने की उम्मीद है।
कुल मिलाकर, बिहार का यह राज्यसभा चुनाव सिर्फ सीटों की गिनती नहीं, बल्कि एनडीए के भीतर संतुलन साधने, नए चेहरों को आगे लाने और सामाजिक समीकरण मजबूत करने की बड़ी परीक्षा है। आने वाले महीनों में साफ हो जाएगा कि ऊपरी सदन में बिहार से कौन नए चेहरे पहुंचते हैं और किसे अभी इंतजार करना पड़ता है।




