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30 साल बाद भी अधर में नेपाल का निजगढ़ एयरपोर्ट: सरकार ने फिर दी प्राथमिकता, पर्यावरण विवाद अब भी सबसे बड़ी बाधा

अंतरराष्ट्रीय/ नेपाल | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू | 1 जुलाई 2026

नेपाल सरकार ने एक बार फिर देश के बहुप्रतीक्षित निजगढ़ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा परियोजना को अपनी प्राथमिकता सूची में शामिल किया है। वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले ने बजट भाषण में घोषणा की कि अगले छह महीने के भीतर एयरपोर्ट निर्माण की रूपरेखा (मॉडेलिटी) तय कर ली जाएगी। हालांकि, करीब 30 वर्षों से अध्ययन, अदालतों, पर्यावरणीय विवादों और सरकारी समितियों के बीच फंसी यह परियोजना आज भी स्पष्ट दिशा का इंतजार कर रही है।

नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने मई 2022 में आदेश दिया था कि एयरपोर्ट का निर्माण तभी किया जाए जब तकनीकी रूप से उपयुक्त और पर्यावरण को न्यूनतम नुकसान पहुंचाने वाली जगह तय हो। अदालत के इस आदेश के तीन साल बाद भी सरकार यह स्पष्ट नहीं कर पाई है कि परियोजना के लिए कितनी भूमि चाहिए, कितने पेड़ काटे जाएंगे और निवेश का मॉडल क्या होगा।

दो समितियां बनीं, रिपोर्टें आईं, लेकिन लागू नहीं हुईं

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद विशेषज्ञ समितियां गठित की थीं। 2022 में बिरेंद्र बहादुर देउजा समिति और 2024 में पूर्व पर्यटन सचिव शंकर प्रसाद अधिकारी की समिति ने अपनी रिपोर्टें सौंपीं। दूसरी समिति ने एयरपोर्ट को BOOT (Build, Own, Operate and Transfer) मॉडल पर विकसित करने की सिफारिश की थी। लेकिन दोनों रिपोर्टें अब तक सार्वजनिक नहीं की गईं और उन पर अमल भी नहीं हुआ।

24 लाख से ज्यादा पेड़ काटने का प्रस्ताव बना विवाद

निजगढ़ एयरपोर्ट की अवधारणा 1995 में सामने आई थी, जब त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के विकल्प की तलाश शुरू हुई। विस्तृत परियोजना रिपोर्ट के अनुसार एयरपोर्ट के लिए लगभग 2,404 हेक्टेयर भूमि और 24.5 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई की जरूरत बताई गई थी।

इसी प्रस्ताव के खिलाफ पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। उनका कहना था कि इतनी बड़ी वन कटाई से जैव विविधता और पर्यावरण को अपूरणीय नुकसान होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण को दी प्राथमिकता

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि सरकार ने पर्यावरणीय प्रभावों का पर्याप्त और वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया। अदालत ने यह भी माना कि प्रस्तावित क्षेत्र घने जंगलों, वन्यजीवों और लगभग 200 वर्ष पुराने ‘भीम सखुवा’ वृक्ष सहित समृद्ध जैव विविधता वाला इलाका है।

अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी की कि “विकास केवल इच्छा या भावना का विषय नहीं, बल्कि तथ्य, वैज्ञानिक अध्ययन और टिकाऊ विकास पर आधारित होना चाहिए।”

सरकार के सामने अब भी कई बड़े सवाल

हालांकि सरकार ने परियोजना को फिर प्राथमिकता दी है, लेकिन कई अहम सवाल अब भी अनुत्तरित हैं—

– एयरपोर्ट आखिर किस स्थान पर बनेगा?

– कुल कितनी भूमि अधिग्रहित होगी?

– कितने पेड़ काटे जाएंगे?

– पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई कैसे होगी?

– परियोजना का वित्तीय मॉडल क्या होगा?

इन सवालों के जवाब मिलने तक नेपाल का सबसे महत्वाकांक्षी हवाई अड्डा परियोजना एक बार फिर योजनाओं और घोषणाओं तक ही सीमित दिखाई दे रही है। 30 वर्षों के बाद भी निजगढ़ एयरपोर्ट जमीन पर नहीं उतर पाया है और इसका भविष्य अब भी सरकारी फैसलों तथा पर्यावरणीय मंजूरियों पर निर्भर है।

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