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अमेरिका-भारत ट्रेड डील में देशहित गिरवी, किसान और ऊर्जा सुरक्षा पर संकट : कांग्रेस

एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 16 फरवरी 2026

कांग्रेस प्रवक्ता और सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला ने अमेरिका-भारत ट्रेड डील को लेकर मोदी सरकार पर जोरदार हमला बोला है। उन्होंने कहा कि यह समझौता भारत के दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों, किसानों की आजीविका और देश की ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डालने वाला साबित हो सकता है। सुरजेवाला ने आरोप लगाया कि सरकार ने पारदर्शिता के बिना और संसद को विश्वास में लिए बिना ऐसे वादे कर दिए हैं, जिनका आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव आने वाले वर्षों तक देश को भुगतना पड़ सकता है।

“बराबरी नहीं, दबाव में हुआ समझौता”—कांग्रेस का सीधा आरोप

रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि उपलब्ध व्यापार आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में भारत ने अमेरिका को 81 बिलियन डॉलर का निर्यात किया, जबकि अमेरिका से 43 बिलियन डॉलर का आयात किया। इस प्रकार भारत के पक्ष में 38 बिलियन डॉलर का व्यापार अधिशेष था। उनके अनुसार, जब भारत मजबूत स्थिति में था, तब अगले पाँच वर्षों तक हर साल 100 बिलियन डॉलर के अमेरिकी सामान की खरीद का वादा करना यह दर्शाता है कि सरकार ने अपनी रणनीतिक बढ़त खो दी। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यह समझौता परस्पर सम्मान और बराबरी पर आधारित है या अमेरिकी दबाव का परिणाम?

“45 लाख करोड़ की खरीद की बाध्यता”—अर्थव्यवस्था पर संभावित दबाव

सुरजेवाला ने कहा कि यदि भारत हर साल 100 बिलियन डॉलर का अमेरिकी सामान खरीदेगा, तो पाँच वर्षों में यह राशि लगभग 45 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच सकती है। उनका आरोप है कि यह प्रतिबद्धता भारतीय अर्थव्यवस्था, विदेशी मुद्रा भंडार और घरेलू उद्योगों पर भारी दबाव डाल सकती है। उन्होंने कहा कि सरकार ने इस खरीद की बाध्यता के वित्तीय प्रभाव, रोजगार पर असर और लघु एवं मध्यम उद्योगों की प्रतिस्पर्धा पर पड़ने वाले संभावित परिणामों पर कोई स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।

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“कपास से करघों तक संकट”—किसानों और वस्त्र उद्योग पर असर

कांग्रेस नेता ने दावा किया कि इस समझौते का सीधा असर कपास उत्पादक किसानों और वस्त्र उद्योग पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि अमेरिका-बांग्लादेश समझौते में अमेरिकी कपास पर शून्य शुल्क है, जबकि भारतीय निर्यात पर 18 प्रतिशत शुल्क लगाया जाता है। यदि भारत में अमेरिकी कपास के आयात को बढ़ावा दिया गया, तो महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। सुरजेवाला ने यह भी कहा कि 2024-25 में भारत ने 3,428 करोड़ रुपये का अमेरिकी कपास आयात किया, जबकि घरेलू बाजार में कपास MSP से नीचे बिकता रहा। उन्होंने सवाल किया कि यदि सस्ता विदेशी कपास बाजार में आएगा, तो भारतीय किसानों और कपड़ा उद्योग का भविष्य क्या होगा?

“मक्का, ज्वार, सोयाबीन और फलों का आयात”—कृषि बाजार में असंतुलन की आशंका

सुरजेवाला ने आरोप लगाया कि समझौते के तहत प्रोसेस्ड मक्का, ज्वार, सोयाबीन ऑयल और विभिन्न फलों के आयात को बढ़ावा दिया जा सकता है। उनका कहना है कि भारत हर साल बांग्लादेश को लगभग 24,550 करोड़ रुपये का कपास व धागा निर्यात करता है। यदि क्षेत्रीय व्यापार संतुलन बदलता है और अमेरिकी उत्पादों को प्राथमिकता मिलती है, तो भारतीय कृषि और प्रसंस्करण उद्योग को गंभीर झटका लग सकता है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति देश के कृषि बाजार में असंतुलन पैदा कर सकती है और किसानों की आय पर सीधा प्रभाव डाल सकती है।

“नॉन-टैरिफ बैरियर्स और GM फसलों पर सवाल”—जैव विविधता पर चिंता

कांग्रेस ने यह भी आशंका जताई कि ‘नॉन-टैरिफ बैरियर्स’ हटाने के नाम पर GM फसलों के लिए रास्ता तैयार किया जा सकता है। सुरजेवाला ने कहा कि भारत की नीति अब तक बीज शुद्धता और जैव विविधता की रक्षा पर आधारित रही है। यदि इस समझौते के माध्यम से GM उत्पादों को अप्रत्यक्ष अनुमति दी जाती है, तो यह देश की पारंपरिक कृषि व्यवस्था और जैव विविधता के लिए गंभीर खतरा हो सकता है। उन्होंने सरकार से स्पष्ट करने की मांग की कि इस संबंध में क्या प्रतिबद्धताएँ दी गई हैं।

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“ऊर्जा सुरक्षा से समझौता?”—तेल आयात पर गंभीर आरोप

ऊर्जा क्षेत्र पर बोलते हुए सुरजेवाला ने कहा कि यदि अमेरिका के दबाव में रूस या ईरान से कच्चा तेल खरीदने पर प्रतिबंधात्मक रुख अपनाया गया, तो यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए हानिकारक होगा। उन्होंने दावा किया कि फरवरी 2022 से जनवरी 2026 के बीच रियायती दरों पर तेल आयात से देश को बड़ी बचत हुई। यदि अब महंगे स्रोतों से तेल खरीदना पड़ेगा, तो इसका सीधा असर महंगाई और आम आदमी की जेब पर पड़ेगा। उन्होंने इसे आत्मनिर्भरता की अवधारणा के विपरीत बताया।

“मजबूत या मजबूर?”—सरकार से जवाब की मांग

अंत में रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि देश यह जानना चाहता है कि क्या यह समझौता राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए किया गया है या बाहरी दबाव के कारण। उन्होंने मांग की कि सरकार संसद में इस समझौते की शर्तें सार्वजनिक करे, विस्तृत चर्चा कराए और किसानों, उद्योग जगत व ऊर्जा विशेषज्ञों को विश्वास में ले। कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि जब तक इन सवालों के तथ्यात्मक जवाब नहीं दिए जाते, तब तक यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस का केंद्र बना रहेगा।

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