राष्ट्रीय/ शिक्षा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 28 अक्टूबर 2026
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र संघ चुनाव की मांग को लेकर जारी आंदोलन अब विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। छात्र अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए अनशन पर बैठे हैं, लेकिन उनके आंदोलन का जवाब संवाद और समाधान से देने के बजाय परिसर में बंदिशों, अवरोधों और भारी सुरक्षा व्यवस्था की खबरें सामने आ रही हैं। गेट सील किए जाने, रास्तों पर दीवारें खड़ी करने और अनशनकारी छात्रों को बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलने की शिकायतें बेहद गंभीर हैं। अगर विश्वविद्यालय में अपने प्रतिनिधि चुनने की मांग करने वाले छात्रों को ही इस तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़े, तो प्रशासन की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
जामिया प्रशासन जवाब दो—छात्रों से आखिर इतनी दुश्मनी क्यों?
किसी विश्वविद्यालय का प्रशासन छात्रों की समस्याएं सुनने, उनकी शिक्षा और सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा लोकतांत्रिक माहौल बनाए रखने के लिए होता है। लेकिन जामिया में जारी घटनाक्रम ने इस बुनियादी जिम्मेदारी पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। छात्र संघ चुनाव की मांग कोई अपराध नहीं है। यह छात्रों के प्रतिनिधित्व और अपनी समस्याओं को उठाने के अधिकार से जुड़ा मुद्दा है।
कुलपति मजहर आसिफ और रजिस्ट्रार को स्पष्ट करना चाहिए कि इतने दिनों से जारी आंदोलन का समाधान निकालने के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए। छात्रों को भरोसे में लेने के बजाय टकराव बढ़ने की नौबत क्यों आई? आखिर चुनाव की मांग को लेकर बैठे छात्रों के सामने इतनी बड़ी सुरक्षा व्यवस्था खड़ी करने की जरूरत क्यों पड़ी?
गेट सील, रास्ते बंद, दीवारें खड़ी—क्या आवाज को कैद किया जाएगा?
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, जामिया के कुछ गेट बंद किए गए हैं, बैरिकेडिंग की गई है और एक गेट पर दीवार बनाने तथा गेटों को वेल्डिंग से बंद करने की कार्रवाई हुई है। इन कदमों को लेकर छात्रों की आवाजाही और परिसर के माहौल पर सवाल उठ रहे हैं।
सवाल सीधा है—क्या रास्ते बंद करने से छात्र संघ चुनाव की मांग खत्म हो जाएगी? क्या दीवारें खड़ी करके छात्रों के सवालों को दबाया जा सकता है? क्या किसी विश्वविद्यालय में असहमति का जवाब बंद दरवाजों और सुरक्षा घेरे से दिया जाना चाहिए?
प्रशासन को बताना होगा कि ये कदम किस आदेश के तहत उठाए गए हैं, इनके पीछे क्या कारण हैं और छात्रों की आवाजाही तथा जरूरी सुविधाओं को सुरक्षित रखने के लिए क्या व्यवस्था की गई है। विश्वविद्यालय कोई जेल नहीं है, जहां सवाल पूछने वालों के रास्ते बंद कर दिए जाएं।
भूखे-प्यासे अनशनकारी छात्र, पानी और टॉयलेट पर गंभीर सवाल
सबसे चिंताजनक शिकायतें अनशन कर रहे छात्रों की बुनियादी जरूरतों को लेकर हैं। छात्रों की ओर से आरोप लगाए जा रहे हैं कि पीने का पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा, पानी की आपूर्ति बाधित है और शौचालयों तक पहुंचने में परेशानी हो रही है। टॉयलेट की लाइट काटे जाने और पानी का कनेक्शन बंद किए जाने की शिकायतें भी सामने आई हैं।
यदि ये शिकायतें सही हैं, तो मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही का नहीं, बल्कि छात्रों की सेहत, सुरक्षा और मानवीय गरिमा का है। अनशन कर रहे छात्रों को पानी, स्वच्छ शौचालय, रोशनी और चिकित्सा सहायता से वंचित नहीं किया जा सकता। किसी भी आंदोलन को समाप्त कराने के लिए बुनियादी जरूरतों पर दबाव बनाना अस्वीकार्य होगा।
कुलपति और रजिस्ट्रार तत्काल स्पष्ट करें कि पानी और बिजली की आपूर्ति की वास्तविक स्थिति क्या है। अनशनकारी छात्रों को पीने का पानी, शौचालय, स्वच्छता और चिकित्सा सहायता सुनिश्चित की जाए। इन शिकायतों की स्वतंत्र जांच हो और यदि किसी स्तर पर जानबूझकर सुविधाएं रोकी गई हैं, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
भारत-विरोधी नारों का मामला—आंदोलन को बदनाम करने की आशंका की जांच हो
इस पूरे विवाद के बीच भारत-विरोधी नारों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आंदोलन से जुड़े लोगों की आशंका है कि ऐसे नारों के जरिए शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश की गई। इस मामले में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले निष्पक्ष जांच जरूरी है।
यदि ऐसे नारे लगाए गए, तो उनकी सत्यता, समय, स्थान और जिम्मेदार लोगों की पहचान प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए। यदि किसी ने जानबूझकर आंदोलन को बदनाम करने के लिए ऐसी स्थिति पैदा की, तो उसकी भी जांच होनी चाहिए। किसी भी पक्ष को बिना प्रमाण दोषी ठहराना उचित नहीं है। लेकिन किसी गंभीर घटना को राजनीतिक या प्रशासनिक सुविधा के अनुसार इस्तेमाल करना भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।
जामिया प्रशासन और पुलिस को उपलब्ध वीडियो, सीसीटीवी फुटेज तथा अन्य संबंधित साक्ष्यों के आधार पर तथ्य सामने रखने चाहिए। छात्रों की पूरी आवाज को किसी विवादित नारे के सहारे खारिज नहीं किया जा सकता।
2006 से छात्र संघ नहीं—आखिर चुनाव कराने में देरी क्यों?
जामिया में छात्र संघ की बहाली की मांग लंबे समय से चली आ रही है। छात्र 12 अक्टूबर से अनशन कर रहे हैं और उनकी प्रमुख मांग है कि छात्र संघ चुनाव की प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से पूरी की जाए।
प्रशासन की ओर से जारी नोटिस में कहा गया था कि छात्र संघ के संविधान को मंजूरी मिलने के 15 दिन बाद चुनाव कराए जाएंगे। निलंबन और कारण बताओ नोटिस वापस लेने तथा विरोध के दौरान सुरक्षा कर्मचारियों की कार्रवाई की जांच के लिए समिति बनाने की बात भी सामने आई थी। इसके बावजूद गतिरोध खत्म नहीं हुआ।
अब प्रशासन को केवल आश्वासन देने के बजाय स्पष्ट समयसीमा घोषित करनी चाहिए। संविधान कब तैयार होगा, उसे कब मंजूरी मिलेगी और चुनाव किस तारीख को होंगे—इन सवालों के ठोस जवाब जरूरी हैं। छात्रों को अनिश्चितता में रखकर समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता।
जामिया टीचर्स एसोसिएशन की बहाली और शिक्षकों की जिम्मेदारी
विश्वविद्यालय में लोकतांत्रिक माहौल का सवाल केवल छात्रों तक सीमित नहीं है। जामिया टीचर्स एसोसिएशन (JTA) की बहाली का मुद्दा भी उठता रहा है। शिक्षकों के स्वतंत्र संगठन और छात्रों के लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सवाल एक-दूसरे से जुड़े हैं।
विश्वविद्यालय में ऐसा माहौल होना चाहिए जहां छात्र और शिक्षक बिना भय के अपनी बात रख सकें। यदि असहमति जताने पर कार्रवाई का डर बना रहे, तो शिक्षा और स्वतंत्र विचार की बुनियाद कमजोर होती है। शिक्षकों को भी इस समय अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए संवाद, निष्पक्षता और लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।
VC-रजिस्ट्रार जवाब दो—दमन बंद करो, चुनाव कराओ!
जामिया प्रशासन को अब जवाबदेही से बचने के बजाय सामने आना होगा। कुलपति और रजिस्ट्रार बताएं कि गेट बंद करने, रास्तों पर अवरोध लगाने और सुरक्षा बलों की तैनाती के फैसले क्यों लिए गए। पानी, बिजली और शौचालय से जुड़ी शिकायतों पर तत्काल स्थिति स्पष्ट की जाए। अनशनकारी छात्रों की सेहत की जिम्मेदारी तय हो और उनकी सभी बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित की जाएं।
छात्र संघ का संविधान तैयार करने और चुनाव कराने की स्पष्ट समयसीमा घोषित हो। छात्रों के खिलाफ जारी निलंबन और कारण बताओ नोटिस की समीक्षा की जाए। विरोध के दौरान सुरक्षा कर्मचारियों के व्यवहार की जांच निष्पक्ष ढंग से पूरी की जाए। साथ ही, भारत-विरोधी नारों से जुड़े दावों की भी प्रमाणों के आधार पर जांच हो, ताकि किसी निर्दोष छात्र को निशाना न बनाया जाए और किसी दोषी को बचाया भी न जा सके।
जामिया की गरिमा पुलिस बल की संख्या से नहीं, वहां मिलने वाली शिक्षा, स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों से तय होती है। छात्रों की मांगों का जवाब दीवारों, बंद गेटों और डर के माहौल से नहीं दिया जा सकता।
अत्याचारी रवैया बंद करो! जामिया प्रशासन शर्म करो! छात्रों की बुनियादी सुविधाएं बहाल करो, आंदोलन को बदनाम करने के आरोपों की जांच कराओ और छात्र संघ चुनाव की तारीख घोषित करो। जामिया में तालीम चाहिए, दमन नहीं। लोकतंत्र चाहिए, डर नहीं। छात्रों की आवाज सुनो!



