राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता/नई दिल्ली | 24 जून 2026
पश्चिम बंगाल की राजनीति में भूचाल आ चुका है। जिस तृणमूल कांग्रेस को कभी ममता बनर्जी की व्यक्तिगत राजनीतिक शक्ति का पर्याय माना जाता था, आज वही पार्टी अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। पार्टी के भीतर बगावत अब केवल असंतोष नहीं रह गई, बल्कि खुले विभाजन में बदल चुकी है।
58 विधायकों द्वारा पार्टी नेतृत्व को चुनौती देने के बाद अब बागी गुट ने ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने का दावा करते हुए अपना अलग राष्ट्रीय कार्यकारी ढांचा घोषित कर दिया है। इतना ही नहीं, बागी गुट चुनाव आयोग पहुंचकर तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिन्ह पर भी दावा ठोक चुका है।
यह घटनाक्रम केवल एक पार्टी का आंतरिक विवाद नहीं है। यह उस राजनीतिक मॉडल पर सवाल है जो पूरी तरह एक व्यक्ति और उसके परिवार के इर्द-गिर्द खड़ा किया गया था।
तृणमूल कांग्रेस की स्थापना 1998 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर की थी। लगभग तीन दशक तक पार्टी का हर बड़ा फैसला ममता बनर्जी और उनके सबसे करीबी राजनीतिक घेरे के माध्यम से संचालित होता रहा। लेकिन अब पार्टी के भीतर असंतोष का बड़ा कारण अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका को बताया जा रहा है।
बागी नेताओं का आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस धीरे-धीरे जनाधारित राजनीतिक संगठन की बजाय सीमित नेतृत्व वाले सत्ता केंद्र में बदल गई। यही कारण है कि कई वरिष्ठ नेता खुलकर विद्रोह के रास्ते पर निकल पड़े।
अब सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई चुनाव आयोग में होगी। आयोग को तय करना होगा कि असली तृणमूल कांग्रेस कौन है। क्या पार्टी पर अधिकार ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले मूल संगठन का रहेगा या फिर बहुमत का दावा कर रहा बागी गुट पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर कब्जा हासिल कर पाएगा?
भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरण पहले भी सामने आ चुके हैं। शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और समाजवादी पार्टी जैसे मामलों में चुनाव आयोग ने संगठनात्मक और विधायी समर्थन के आधार पर निर्णय दिए हैं। यदि तृणमूल का विवाद भी उसी दिशा में बढ़ता है तो ममता बनर्जी को अपनी सबसे कठिन राजनीतिक लड़ाई लड़नी पड़ सकती है।
यह संकट इसलिए भी बड़ा है क्योंकि पश्चिम बंगाल में अगले चुनाव दूर नहीं हैं। यदि पार्टी दो हिस्सों में बंटती है तो इसका सीधा लाभ बीजेपी और कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन को मिल सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत उसका मजबूत संगठन नहीं, बल्कि ममता बनर्जी की व्यक्तिगत लोकप्रियता रही है। लेकिन जब संगठन का बड़ा हिस्सा नेतृत्व के खिलाफ खड़ा हो जाए तो केवल करिश्मा पर्याप्त नहीं होता।
एक समय था जब ममता बनर्जी वाम मोर्चे जैसी मजबूत सत्ता को उखाड़ फेंकने वाली जननेता के रूप में उभरी थीं। आज वही नेता अपनी ही बनाई पार्टी को बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह सिर्फ एक विभाजन नहीं है, बल्कि सत्ता, उत्तराधिकार और नेतृत्व की वैधता की लड़ाई है। आने वाले दिनों में चुनाव आयोग का फैसला और विधायकों-सांसदों की वास्तविक संख्या तय करेगी कि तृणमूल कांग्रेस का भविष्य क्या होगा।
लेकिन इतना तय है कि बंगाल की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रहेगी। तृणमूल कांग्रेस के भीतर शुरू हुई यह जंग केवल पार्टी का नहीं, पूरे राज्य के राजनीतिक समीकरणों का भविष्य तय कर सकती है।




