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दिल्ली में ‘इंडो-अमेरिका’ के नाम पर बड़ा स्कैम! होटल ऑफिस, निजी हेलिकॉप्टर और ‘डिप्लोमैट’ बनाकर ऐसे फंसाए निवेशक

क्राइम/ दिल्ली | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 सितंबर 2026

दिल्ली में निवेश के नाम पर कथित धोखाधड़ी का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें कंपनी ने खुद को अमेरिका की संघीय सरकार और अमेरिकी रक्षा विभाग यानी DOD से जुड़ा बताकर निवेशकों का भरोसा जीतने की कोशिश की। कंपनी की ओर से कथित तौर पर दावा किया गया कि उसे अमेरिका सरकार और DOD ने ‘प्रिंसिपल डेवलपर’ के तौर पर मान्यता दी है और वह ‘इंडो-यूएस पैसिफिक पीस ट्रीटी’ के तहत भारत और अमेरिका से जुड़े एक बड़े बुनियादी ढांचा विकास कार्यक्रम पर काम कर रही है। आधिकारिक जैसे दिखने वाले दस्तावेज, राष्ट्रीय प्रतीकों का इस्तेमाल और अमेरिकी सरकारी समर्थन के दावे इस कथित योजना का हिस्सा बताए गए हैं।

मामला VPVV टेक्नो कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल सितंबर में संजीव राव ने कंपनी में ₹1.08 लाख का निवेश किया था। उन्हें कंपनी के बारे में एक ऐसे परिचित से जानकारी मिली थी, जो खुद पहले इसमें पैसा लगा चुका था। यानी निवेश का भरोसा केवल कंपनी के दावों से नहीं बल्कि परिचित लोगों के जरिए भी बनाया जा रहा था। एक व्यक्ति के निवेश के बाद दूसरे व्यक्ति तक कंपनी की जानकारी पहुंचना और फिर बड़े अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट का हवाला देकर निवेश के लिए तैयार करना, जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण पहलू माना जा रहा है।

कंपनी ने कथित तौर पर खुद को एक सामान्य निजी कारोबारी संस्था के बजाय भारत और अमेरिका के बीच चलने वाली किसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय परियोजना से जुड़ी संस्था के रूप में पेश किया। इसके लिए ऐसे दस्तावेजों और प्रतीकों का इस्तेमाल किए जाने का आरोप है, जो देखने में आधिकारिक नजर आते थे। अमेरिकी सरकार और उसके रक्षा विभाग का नाम जुड़ने से कंपनी की विश्वसनीयता का ऐसा माहौल तैयार हो सकता था, जिससे निवेशकों को यह विश्वास हो कि उनके पैसे किसी बड़े सरकारी या अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट में लगाए जा रहे हैं।

लेकिन कहानी सिर्फ दस्तावेजों और सरकारी नामों तक सीमित नहीं थी। रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी की पूरी प्रस्तुति में आलीशान होटल में कार्यालय, निजी हेलिकॉप्टर और एक ‘डिप्लोमैट’ जैसी मौजूदगी भी दिखाई गई। यानी निवेशकों के सामने केवल कागज नहीं रखे गए, बल्कि ऐसा पूरा माहौल तैयार किए जाने का आरोप है जिससे कंपनी आर्थिक रूप से बेहद प्रभावशाली और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़ी हुई दिखाई दे। किसी निवेशक के लिए ऐसे माहौल में कंपनी के दावों पर भरोसा करना आसान हो सकता है।

दिल्ली पुलिस ने मामले में कंपनी के 3 प्रमोटरों—वेंकिता वेंकट, हितेश कुमार और राहुल राजीव नायर—को 28 अगस्त को गिरफ्तार किया था। हालांकि बाद में तीनों को जमानत मिल गई। इसलिए गिरफ्तारी को अपराध साबित होने के तौर पर नहीं देखा जा सकता। अब जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान यह सामने आना बाकी है कि कंपनी ने निवेशकों के सामने कौन-कौन से दावे किए, उन दावों के पीछे वास्तविक दस्तावेज क्या थे और निवेश के रूप में जुटाई गई रकम का इस्तेमाल किस तरह किया गया।

जांच का एक बड़ा सवाल यह भी है कि कंपनी द्वारा अमेरिकी सरकार और DOD से कथित संबंधों का जो दावा किया गया, उसकी वास्तविकता क्या थी। यदि किसी निजी कंपनी को किसी विदेशी सरकार या उसके रक्षा विभाग से औपचारिक मान्यता या परियोजना मिली हो, तो उसके दस्तावेज और आधिकारिक रिकॉर्ड संबंधित सरकारी संस्थाओं से सत्यापित किए जा सकते हैं। इसलिए इस मामले में कथित दस्तावेजों की सत्यता और उनके स्रोत की जांच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

पुलिस के सामने अब यह पता लगाना भी अहम होगा कि कंपनी ने कुल कितने निवेशकों से संपर्क किया, कितनी रकम जुटाई, निवेशकों को किस तरह के रिटर्न या परियोजना से जुड़े लाभ का भरोसा दिया गया और इस पूरी प्रक्रिया में कौन-कौन लोग सक्रिय थे। साथ ही यह भी जांच का विषय होगा कि कंपनी की कथित ‘इंडो-अमेरिका’ पहचान तैयार करने और उसे निवेशकों तक पहुंचाने में किन माध्यमों का इस्तेमाल किया गया।

इस मामले में निवेशकों के लिए भी एक महत्वपूर्ण सबक है। किसी कंपनी का महंगा कार्यालय, निजी हेलिकॉप्टर, विदेशी सरकार का नाम, सरकारी प्रतीक या आधिकारिक दिखने वाला दस्तावेज अपने आप में निवेश की सुरक्षा की गारंटी नहीं है। किसी भी बड़े निवेश से पहले कंपनी का पंजीकरण, सरकारी परियोजना की वास्तविक स्वीकृति, संबंधित विभाग की आधिकारिक पुष्टि, वित्तीय रिकॉर्ड और परियोजना से जुड़े दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच जरूरी है।

दिल्ली का यह मामला अब पुलिस जांच और अदालत की प्रक्रिया के बीच है। फिलहाल कंपनी और उसके प्रमोटरों पर लगाए गए आरोपों की न्यायिक जांच बाकी है और अंतिम जिम्मेदारी अदालत के फैसले से तय होगी। लेकिन इस पूरे प्रकरण ने एक गंभीर सवाल जरूर सामने ला दिया है—अगर किसी निजी कंपनी को अंतरराष्ट्रीय सरकारी परियोजना से जुड़ा दिखाने के लिए आधिकारिक प्रतीकों, सरकारी नामों और प्रभावशाली माहौल का इस्तेमाल किया जाए, तो आम निवेशक उसकी असलियत कैसे पहचाने? यही सवाल इस कथित निवेश घोटाले की जांच के केंद्र में रहेगा।

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