अपराध / राष्ट्रीय / कर्नाटक | ABC NATIONAL NEWS | बेंगलुरु | 4 अक्टूबर 2026
कर्नाटक में मतदाता सूची से नाम हटाने को लेकर उठे सवाल अब सिर्फ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहे हैं। अलंद में सामने आए कथित वोटर-डिलीशन ऑपरेशन और मौजूदा SIR विवाद के बीच पुलिस कार्रवाई ने मामले को नया मोड़ दे दिया है। अलंद मामले की कर्नाटक पुलिस SIT जांच में सामने आया था कि कथित फर्जी मतदाता-विलोपन आवेदन तैयार करने के लिए एक डेटा सेंटर ऑपरेटर को हर आवेदन पर ₹80 का भुगतान किया गया। दिसंबर 2022 से फरवरी 2023 के बीच अलंद विधानसभा क्षेत्र में कुल 6,018 Form-7 आवेदन दाखिल किए गए थे। SIT के मुताबिक इन आवेदनों के पीछे भुगतान का एक संगठित नेटवर्क होने के संकेत मिले थे।
हालांकि, इस पूरे मामले में एक तथ्य को साफ रखना बेहद जरूरी है। 6,018 आवेदन दाखिल हुए थे, लेकिन इन सभी के आधार पर मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे—ऐसा कहना सही नहीं होगा। कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार जांच में सिर्फ 24 आवेदन सही पाए गए, जबकि 5,994 आवेदन गलत पाए गए और उन्हें खारिज कर दिया गया। यानी इन 5,994 मामलों में मतदाताओं के नाम हटाए नहीं गए। चुनाव अधिकारियों ने बड़े पैमाने पर आवेदन आने के बाद प्रत्येक आवेदन की जांच की थी।
लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता। असली सवाल यह है कि इतनी बड़ी संख्या में कथित गलत आवेदन आखिर किस उद्देश्य से और किसके जरिए तैयार किए गए? SIT की जांच में प्रति आवेदन ₹80 के भुगतान की बात सामने आना इस सवाल को और गंभीर बनाता है। 6,018 आवेदनों पर ₹80 के हिसाब से रकम करीब ₹4.8 लाख बैठती है। यही वह तथ्य है जिसने अलंद प्रकरण को महज मतदाता सूची की सामान्य गड़बड़ी के बजाय एक संभावित संगठित ऑपरेशन के रूप में चर्चा के केंद्र में ला दिया।
अब इसी पृष्ठभूमि में कर्नाटक में चल रहा Special Intensive Revision यानी SIR भी राजनीतिक और कानूनी विवाद का बड़ा केंद्र बन चुका है। बेलगावी में मतदाता नाम हटाने के लिए कथित तौर पर बड़े पैमाने पर Form-7 आवेदन इस्तेमाल किए जाने के आरोप सामने आए हैं। पुलिस ने 30 सितंबर को बेलगावी मार्केट थाने में BJP नेता डॉ. रवि पाटिल और 20-25 अन्य लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की। शिकायत में आरोप लगाया गया कि 198 मतदाताओं के नाम हटाने के लिए Form-7 आवेदन जमा करने की कोशिश की गई और कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों तथा गलत सूचनाओं का इस्तेमाल किया गया। इन आरोपों की जांच अभी जारी है और आरोप साबित होना बाकी है।
बेलगावी का मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि यह कार्रवाई SIR प्रक्रिया के दौरान हुई। शिकायत के मुताबिक 22 सितंबर को कुछ लोग करीब 200 Form-7 आवेदन लेकर एक Booth Level Officer के पास पहुंचे थे और कथित तौर पर उन नामों को हटाने का दबाव बनाया गया जिन्हें “बोगस” बताया जा रहा था। BLO ने आवेदन पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। बाद में मामला पुलिस तक पहुंचा।
इस बीच कर्नाटक में SIR को लेकर राजनीतिक टकराव भी तेज हो गया है। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने बड़े पैमाने पर Form-7 आवेदन दाखिल कर पात्र मतदाताओं के नाम हटाने के कथित प्रयासों को लेकर चुनाव अधिकारियों से आपराधिक कार्रवाई की मांग की थी। इसके बाद कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने सभी 224 विधानसभा क्षेत्रों के Electoral Registration Officers को गलत जानकारी देकर मतदाता सूची में बदलाव की कोशिश करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे भी मतदाता सूची से जुड़े इन मामलों पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं। उनका आरोप है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया और मतदाता के अधिकार के साथ किसी भी तरह का खिलवाड़ स्वीकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस की ओर से अलंद के पुराने मामले को मौजूदा SIR विवाद से जोड़ते हुए यह सवाल उठाया जा रहा है कि अगर मतदाता सूची में गलत तरीके से नाम हटाने की कोशिश होती है तो जिम्मेदारी तय करने और दोषियों पर कार्रवाई की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
हालांकि BJP ने बेलगावी समेत SIR से जुड़े आरोपों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए खारिज किया है और निष्पक्ष जांच की मांग की है।
यही वजह है कि अब पूरा मामला सिर्फ “किसका नाम वोटर लिस्ट में है” तक सीमित नहीं रह गया है। सवाल यह है कि किसने नाम हटाने के आवेदन तैयार किए, किसने उन्हें जमा कराया, किस उद्देश्य से कराया और इसके पीछे कोई संगठित नेटवर्क था या नहीं। FIR के बाद जांच एजेंसियों के सामने इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की चुनौती है।
अलंद में ₹80 प्रति आवेदन के भुगतान की SIT जांच और SIR के दौरान बेलगावी में दर्ज FIR—दोनों घटनाएँ अलग मामलों से जुड़ी हैं, लेकिन दोनों ने मतदाता सूची की शुचिता और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर बहस खड़ी कर दी है। अब असली परीक्षा जांच की है। आरोप चाहे किसी भी दल या व्यक्ति पर हों, अगर किसी ने जानबूझकर पात्र मतदाता का अधिकार छीनने की कोशिश की है तो उसकी पहचान, जिम्मेदारी और कानूनी जवाबदेही तय होनी चाहिए। क्योंकि वोटर लिस्ट में एक नाम सिर्फ एक नाम नहीं होता—वह लोकतंत्र में एक नागरिक के अधिकार की पहचान होता है।


