नई दिल्ली 16 नवंबर 2025
वोट चोरी का असली खेल: सच छुपाओ, जनता भटकाओ
भारतीय चुनावी राजनीति के सबसे चिंताजनक पहलुओं में से एक है—वोटर लिस्ट में धांधली, बूथ-स्तर पर राजनीतिक दखल, और उसके बाद होने वाली डिजिटल व आख़बारी “मैनेजमेंट”। यह सब मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाते हैं, जिसमें असली मतदाता धीरे-धीरे किनारे कर दिए जाते हैं और नक़ली पैटर्न को “जनादेश” का नाम दे दिया जाता है। मगर यह पूरी प्रक्रिया जितनी जटिल है, उससे कहीं ज़्यादा परिशुद्धता से BJP IT Cell की डिजिटल सेना इसे ढकने का काम करती है। हर बार जब नागरिक वोट चोरी की शिकायत करते हैं—चाहे वह वोटर लिस्ट में नाम कटना हो, फर्जी मतदाता जोड़ना हो, या पुलिस द्वारा विपक्षी मतदाताओं को रोकना—IT Cell तुरंत एक “पैटर्न” सक्रिय कर देता है। वे मुद्दे को असल जड़ से हटाकर “अवैध प्रवासियों” की तरफ़ मोड़ देते हैं। जैसे ही कोई नागरिक शिकायत करता है, तुरंत उन्हें कहा जाता है—“अरे, आप अवैध प्रवासियों को वोट दिलाना चाहते हैं, इसलिए परेशान हैं।”
पहले मतदाता हटाओ, फिर सवाल करने वालों को दोष दो—यही है असली खेल
पूरी प्रक्रिया की शुरुआत पहले से तय होती है—वोटर लिस्ट के ड्राफ्ट तैयार होने से पहले ही लाखों वास्तविक मतदाताओं के नाम बिना किसी सूचना के काट दिए जाते हैं। और जब नागरिकों को इसका पता चलता है, तो जवाब यही मिलता है—“अब क्यों रो रहे हो? पहले शिकायत क्यों नहीं की?” जबकि असलियत यह है कि यह deletions गुप्त रूप से होती हैं। उसके बाद जब ड्राफ्ट लिस्ट जारी होती है, तब भी जिन समुदायों को राजनीतिक रूप से “अनुकूल” नहीं माना जाता, उनके नाम व्यवस्थित ढंग से हटाए जाते हैं। और जब वे शिकायत करते हैं, तो IT Cell पूछता है—“क्यों नहीं बोला पहले?” इस ‘लूप’ का उद्देश्य यह नहीं कि प्रक्रिया सुधरे, बल्कि यह कि नागरिक थक जाएँ, हार मान लें और धांधली के खिलाफ आवाज़ उठाना बंद कर दें।
चुनाव के दिन पुलिस—और बूथ के अंदर “एजेंट”—अपना अलग खेल खेलते हैं
चुनाव के दिन यह तंत्र और भी ख़तरनाक रूप ले लेता है। कई क्षेत्रों से शिकायतें आती हैं कि पुलिस उन मतदाताओं को रोकती है जो किसी वैकल्पिक दल को वोट दे सकते हैं। उन्हें बुलाया जाता है, रोका जाता है, कभी डराया जाता है, और कभी कहा जाता है कि “लाइन खत्म हो गई है, बाद में आना।” बूथ के अंदर, CCTV मृत कोने में, अंत के घंटों में “प्रॉक्सी वोटिंग” के आरोप लगातार आते हैं—जहाँ उन लोगों के नाम पर वोट डाले जाते हैं जिन्हें पूरे दिन बाहर रोका गया। ऐसे नामों में “Brazilian Sweety” और “Brazilian Saraswati” जैसे अजीबोगरीब नाम तक पाए गए हैं, जिनसे यह पता चलता है कि डेटा के साथ किस तरह का खिलवाड़ किया गया है। दिन खत्म होते ही IT Cell तैयार स्क्रिप्ट लेकर आता है—“देखिए, चुनाव शांतिपूर्ण—टर्नआउट बढ़ा!” जबकि हर स्थानीय नागरिक जानता है कि यह वृद्धि वास्तविक मतदाताओं की नहीं, बल्कि ‘अंदरूनी संचालन’ की देन है।
नतीजे आने के बाद—फिर वही झूठ, वही सवाल: “पहले क्यों नहीं बोले?”
जब चुनाव परिणाम आते हैं और डेटा साफ़ दिखाता है कि वोट हटाने और बूथ कैप्चरिंग जैसे तरीकों ने लगभग 202 सीटों में से 128 पर बड़ा अंतर पैदा किया—तब भी यही डिजिटल सेना कहती है—“अब क्यों रो रहे हो? पहले बोलते!” यह वही लोग होते हैं जिन्होंने ड्राफ्ट लिस्ट में कटौती पर कहा—“क्यों अभी? पहले कहो।” चुनाव के दिन कहा—“10 बजे क्यों? 5 बजे कहते।” 5 बजे कहा—“हम व्यस्त हैं, बाद में आओ।” नतीजों के बाद कहा—“अब देर हो गई।” यह हमेशा एक चक्र होता है—एक गोल-गोल बहाना, जिसका उद्देश्य सच दबाना नहीं, नागरिक को मानसिक रूप से थका देना होता है।
ECI की ओर भेजो? जाकर देखो कितने सालों से फाइलें धूल खा रही हैं
जब नागरिक, उम्मीदवार या संगठन किसी धांधली की औपचारिक शिकायत करते हैं, तो IT Cell की अगली लाइन होती है—“ECI के पास जाओ, 45 दिन में शिकायत करो।” लेकिन सच्चाई यह है कि ECI में वर्षों से शिकायतें लंबित हैं। यदि कोई RTI फाइल करे, तो उसे यही पता चलता है कि अधिकतर शिकायतें या तो अनसुनी रहती हैं, या उन्हें दर्ज करके ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। अदालतें कहती हैं—“पहले ECI जाओ।” ECI कहता है—“हम जांच करेंगे।” और यह “जांच” कई चुनावों के चक्र पूरे कर देती है। यही कारण है कि नागरिक न तो ECI पर विश्वास कर पाते हैं और न अदालतों पर।
और जब अदालत की बात आती है—याद कीजिए एक पूर्व CJI ने ही क्या कहा था
भारतीय लोकतंत्र के लिए यह क्षण बेहद कड़वा था जब देश के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने स्वयं कहा—“कोर्ट कौन जाता है? आप कोर्ट जाते हैं और पछताते हैं।” उनके इस बयान में देश की न्याय व्यवस्था की वास्तविकता और उस पर लोगों के भरोसे का संकट दोनो झलकते हैं। जब वही व्यक्ति, जिसे न्यायिक तंत्र का संरक्षक होना था, यह स्वीकार करे कि अदालतें आम नागरिक के लिए उपयोगी नहीं रह गईं—तो यह लोकतंत्र में नागरिकों की असुरक्षा को और भी गहरा कर देता है।
सच्चाई साफ़ है: जिन्हें पता है धांधली होती है, वे उसे रोकना नहीं—सुरक्षित रखना चाहते हैं
जो लोग सच्चे मन से मानते हैं कि चुनाव निष्पक्ष होते हैं, उन्हें तथ्यों का विश्लेषण करना चाहिए। और जिन्हें पता है कि चुनावी तंत्र से कैसे खिलवाड़ किया जाता है, वे चुप नहीं हैं—बल्कि वे इस धांधली का समर्थन करते हैं। सोशल मीडिया पर उनकी सलाह—“ये क्यों नहीं किया, वो क्यों नहीं किया”—सिर्फ दिखावा है। भीतर से वे चाहते हैं कि और ज़्यादा वास्तविक मतदाता हटाए जाएँ और और ज़्यादा नकली वोट डाले जाएँ। यही वह मानसिकता है जो कभी उपनिवेशवादियों की सेवा में पेंशन लेकर आज़ादी आंदोलन के खिलाफ खड़ी थी, और आज सत्ता के गलियारों में अवसरवाद की चादर ओढ़कर घूम रही है।
नागरिकों को सावधान रहने की ज़रूरत है—क्योंकि लोकतंत्र तभी जीवित रहता है जब जनता आँखें खुली रखे
भारत में लोकतंत्र का भविष्य उसी दिन खतरे में पड़ता है, जब जनता यह मान ले कि “कुछ नहीं बदल सकता” या “सब सिस्टम का हिस्सा है।” वोटर लिस्ट से नाम काटना, बूथ पर दबाव, फर्जी वोट, और शिकायतों को लटकाना—यह सब मिलकर लोकतंत्र की रीढ़ तोड़ते हैं। और जब इन सबको ढकने के लिए डिजिटल बहसें, फर्जी नैरेटिव, अपमानजनक सवाल और भ्रम फैलाने वाली तकनीकें इस्तेमाल होती हैं—तो नागरिकों का सतर्क रहना और भी जरूरी हो जाता है। यह समय है जागने का, क्योंकि सोते हुए लोकतंत्रों को इतिहास बार-बार चेतावनी देता आया है—एक बार अधिकार छीन लिए जाएँ, तो उन्हें वापस पाना कई पीढ़ियों का संघर्ष बन जाता है।





