तिरुवनंतपुरम, केरल
13 अगस्त 2025
मुन्नार: चाय की घाटियों में बसी हरियाली की कविता
केरल के सबसे प्रसिद्ध हिल स्टेशन मुन्नार को यूं ही नहीं ‘चाय की घाटी’ कहा जाता है। यहां की मखमली ढलानों पर फैले हुए चाय-बागान केवल आंखों को नहीं लुभाते, बल्कि आत्मा को भी सुकून देते हैं। 2025 में केरल सरकार ने मुन्नार को “Eco-Heritage Hill Zone” घोषित कर दिया है। अब पर्यटक यहाँ केवल ट्रैवलर नहीं रहते, बल्कि ग्रीन गेस्ट कहलाते हैं जो चाय की पत्तियों की तोड़ाई में भाग लेते हैं, जैविक खेती की विधि सीखते हैं, और स्थानीय महिलाओं के साथ पारंपरिक चाय बनाने की प्रक्रिया को समझते हैं। नीलकुरिंजी फूलों के खिलने का दुर्लभ नज़ारा भी अब एक संरक्षित ट्रेकिंग कार्यक्रम का हिस्सा बन गया है। टॉप स्टेशन, मैट्टुपेट्टी डैम और कुंडला झील जैसे प्राकृतिक स्थलों ने मुन्नार को एस्थेटिक टूरिज्म का नया चेहरा बना दिया है।
वायनाड: आदिवासी धरोहर और जैव विविधता का अद्भुत संगम
वायनाड का नाम लेते ही मन में एक ऐसी छवि उभरती है जहाँ जंगल की सघनता में छिपे होते हैं लोकगीत, गुफाएं और अनछुए अनुभव। यहाँ की एडक्कल गुफाएं, जहाँ पत्थरों पर इतिहास खुदा हुआ है, अब केवल ऐतिहासिक स्थल नहीं — बल्कि “Cave to Culture” नामक कार्यक्रम के तहत एंथ्रोपोलॉजिकल टूरिज़्म का केंद्र बन चुकी हैं। 2025 में वायनाड को “आदिवासी सांस्कृतिक क्षेत्र” घोषित किया गया, जिसमें पर्यटक स्थानीय कुरिच्या, पनिया, और अडिया जनजातियों के साथ रहकर उनके जीवन, कुटीर उद्योग और वन्य जीवन ज्ञान को प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। कुरुवा द्वीप और बाणासुरा सागर जैसे स्थल अब “Slow Travel Villages” के रूप में विकसित हो रहे हैं — जहाँ यात्रा समय के विरुद्ध नहीं, समय के साथ चलती है।
पूनमुड़ी: पक्षियों की ध्वनि और धुंध में लिपटी चुप्पियाँ
तिरुवनंतपुरम के करीब बसा पूनमुड़ी, शोरगुल से दूर एक ऐसी जगह है जहाँ मौन ही संगीत है। यहाँ के हर मोड़ पर फैली हुई धुंध और हरियाली, मन को एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जहाँ संवाद शब्दों से नहीं, दृष्टि से होता है। 2025 में यहां “Forest Mindfulness Retreat” की शुरुआत हुई, जहाँ लोग वन योग, साइलेंस मेडिटेशन और पक्षी निरीक्षण के जरिये आंतरिक शांति प्राप्त करते हैं। गोल्डन वैली, डियर पार्क और वन ट्रेल्स अब “Soul Spaces” कहलाते हैं। एक खास बात यह भी है कि यहाँ पर केवल सोलर लाइट्स और बायो-कॉम्पोस्ट वाले होमस्टे की अनुमति दी गई है, ताकि पर्यावरण संरक्षण और अनुभव दोनों में संतुलन बना रहे।
इडुक्की: बाँध, घाटियाँ और पवन ऊर्जा की प्रेरक कहानियाँ
इडुक्की का उल्लेख आते ही भारत का सबसे ऊँचा आर्क डैम मन में आता है, लेकिन 2025 में यह क्षेत्र केवल बाँधों का नहीं, हरित ऊर्जा और रोमांच के मेल का गढ़ बन गया है। रामक्कलमेडु का विंड फार्म अब “Wind Walk Experience” के लिए प्रसिद्ध हो चुका है, जहाँ लोग पवनचक्कियों के बीच ट्रेक करते हुए ‘हवा से संवाद’ करते हैं। इडुक्की की घाटियाँ अब “Green Engineering Tourism” का हिस्सा हैं, जिसमें स्कूली छात्र और युवा पर्यटक यहाँ के जल संरक्षण और अक्षय ऊर्जा मॉडल का अध्ययन करते हैं। यह वह जगह है जहाँ प्रकृति और तकनीक की साझेदारी देखने लायक होती है — बिना एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाए।
नेल्लियम्पथी: शांत, सुगंधित और संतुलित जीवन की खुली पाठशाला
पालक्कड़ की यह पर्वतीय भूमि अब भीड़ से दूर है, लेकिन अब यह ‘Offbeat Luxury & Wellness Tourism’ के मानचित्र पर आ चुकी है। कॉफी और संतरे के बागान, आयुर्वेदिक वनस्पतियाँ और वन्यजीवों की आवाजाही के साथ यह इलाका 2025 में ‘Nature Farm Living’ का आदर्श बन गया है। यहाँ पर्यटक फार्महाउस में रहते हैं, खुद जैविक खेती करते हैं और ‘Farm to Fork’ सिद्धांत के तहत जो उगाते हैं, वही खाते हैं। नेल्लियम्पथी का हर व्यू पॉइंट अब “साइलेंस रिंग” बना दिया गया है, जहाँ शोर मचाना मना है — केवल प्रकृति को सुना और महसूस किया जाता है।
रामक्कलमेडु: पौराणिक कथाओं और पवनों का अद्भुत संयोग
यह स्थल न केवल अपनी ऊंचाई के लिए जाना जाता है, बल्कि इसके पीछे की रामायण कथा के लिए भी — जहाँ कहा जाता है कि भगवान राम ने यहीं से लंका की दिशा में देखा था। 2025 में इस स्थान को “Mythology Meets Nature” ट्रेल के रूप में सजाया गया है। विशालकाय पवन चक्कियाँ यहाँ की पहचान हैं, और अब पर्यटक यहाँ “Wind Meditation Retreat” में भाग लेते हैं — जहाँ शरीर, श्वास और पवन के बीच संबंध को साधा जाता है। यहाँ स्थापित विशाल ‘Kuravan & Kurathi’ की मूर्तियाँ, मानव और प्रकृति के ऐतिहासिक संघर्ष और प्रेम की कथा कहती हैं।
2025 में केरल हिल स्टेशन पर्यटन की उपलब्धियाँ
इस वर्ष केरल के पर्वतीय पर्यटन से ₹1800 करोड़ की आय हुई, जो अब तक का रिकॉर्ड है। 1.9 लाख विदेशी पर्यटक केवल पर्वतीय क्षेत्रों में आए। 12,000 से अधिक स्थानीय युवाओं को गाइड, होमस्टे प्रबंधक, ट्रेक आयोजक और इको-फार्मिंग एक्सपर्ट के रूप में रोज़गार मिला। सभी हिल स्टेशन को ‘Plastic-Free Green Zone’ घोषित किया गया और पर्यटकों से ‘Eco Pledge’ दिलवाया गया, जिसके तहत वे स्वयं कचरा उठाकर लाते हैं।
जब पहाड़ केवल दृश्य नहीं, आत्मिक अनुभव बन जाएं
केरल के हिल स्टेशन अब केवल तस्वीरों के फ्रेम नहीं — जीवन दर्शन के दर्पण बन चुके हैं। यहाँ की घाटियाँ, हवा, जंगल और मौन आपको भीतर की यात्रा पर ले जाते हैं। जब कोई सैलानी मुन्नार में धुंध के बीच चाय की चुस्की लेता है, वायनाड में किसी आदिवासी की कहानी सुनता है, या पूनमुड़ी की घाटियों में मौन साधना करता है — तब वह केवल पर्यटक नहीं रहता, वह स्वयं प्रकृति का एक रूप बन जाता है।




