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केरल फ़ूड टूरिज्म: स्वाद और परंपरा की लज़ीज़ यात्रा

तिरुवनंतपुरम, केरल

11 अगस्त 2025

पर्यटन जब स्वाद से जुड़ता है, तो वह केवल पेट नहीं, संस्कृति और आत्मा की भूख भी मिटाता है। केरल में भोजन कोई व्यंजन मात्र नहीं — यह जीवनशैली, परंपरा और रिश्तों की अभिव्यक्ति है। केरल टूरिज्म ने 2025 में इस पहचान को निखारते हुए एक अभिनव पहल की — “स्वाद की यात्रा: फूड टूरिज़्म सर्किट”, जो अब अंतरराष्ट्रीय पर्यटन में भारत के सबसे जीवंत और स्वादिष्ट अनुभवों में गिना जाता है।

यह केवल खाने की बात नहीं — यह एक कहानी, स्मृति और साझा अनुभव की थाली है, जिसमें हर निवाला अपने साथ एक गाथा लेकर आता है।

क्या है फूड टूरिज्म सर्किट?

इस योजना के तहत केरल को छह प्रमुख फूड ज़ोन में विभाजित किया गया है — हर क्षेत्र अपनी विशेष थाली, पकवान शैली, मसालों और कहानियों के साथ। पर्यटक अब केवल रेस्तराँ में जाकर भोजन नहीं करते, बल्कि खेत, रसोई और परंपरा के बीच खुद उस भोजन को बनते, पकते और परोसे जाते हुए देखते हैं।

कोट्टायम – नादान स्वाद और पारंपरिक शुद्धता

यहाँ का खाना शुद्ध नारियल तेल में बना, ‘नाडान’ शैली में तैयार होता है। ‘पुट्टु-कडला करी’, ‘नैथली मीन फ्राय’, और ‘मोरो करी’ यहाँ की पहचान हैं। 2025 में “Cook with Grandma” प्रोग्राम में पर्यटक किसी गाँव की अम्माची के साथ बैठकर पुट्टु बनाना सीखते हैं और उसकी कहानी भी सुनते हैं — कैसे वह पकवान उनके बचपन की सबसे मीठी याद रहा।

अल्लेप्पी — बैकवाटर की मछलियों की थाली

यहाँ की किचन में समुद्र और बैकवाटर एक साथ बोलते हैं। “Fish in Five Styles” नामक सी-फूड वर्कशॉप अब यात्रियों के बीच सबसे लोकप्रिय है — जहाँ कराइमीन पोलिचाथु, मीन मोइली, मछली का ठेचा, फ्राय और करी बनाना सिखाया जाता है। साथ ही बताया जाता है कि मछुआरे किस ऋतु में कौनसी मछली पकड़ते हैं।

त्रिशूर — जब थाली बनती है त्योहार की पूजा

त्रिशूर में ओणम साद्या को अब सालभर अनुभव किया जा सकता है। 2025 में ‘100 प्लेट साद्या अनुभव’ नामक पैकेज शुरू हुआ — जिसमें पर्यटक केले के पत्ते पर परोसी 26 से अधिक शाकाहारी चीज़ों को चखते हैं। वहाँ का ‘पायसम ट्रायाल’ — तीन अलग-अलग प्रकार के पायसम एक साथ चखने का अनुभव — विदेशियों के बीच लोकप्रिय हुआ है।

वायनाड — मसालों की घाटी, स्वाद का जादू

यह इलाका अदरक, काली मिर्च, दालचीनी और इलायची के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ पर्यटक ‘Spice to Spoon’ नामक ट्रेल का हिस्सा बनते हैं — जिसमें वे खेत में मसाले देखते हैं, फिर उन्हें कूटते, पीसते और पकाते हैं। एक पारंपरिक जनजातीय रसोई में ‘बम्बू बिरयानी’ और ‘पत्ते में भुना चिकन’ जैसे व्यंजन बनाना सीखते हैं।

एर्नाकुलम – मलयाली शाकाहारी-गैर-शाकाहारी संगम

यहाँ ‘अप्पम-स्टू’, ‘मालाबार बिरयानी’, और ‘कोज़ी करी’ जैसे मिश्रित पकवान संस्कृति को दर्शाते हैं। “Taste the Faith” नामक दौरा पर्यटकों को मंदिर, मस्जिद और चर्च की पाकशैली से जोड़ता है — जैसे मंदिर का प्रसाद, मुस्लिम बिरयानी और चर्च की Sunday Feast।

मलप्पुरम — मिठास में बसी विरासत

मलप्पुरम की ‘चट्टी पथिरी’, ‘कोज़ी कट्टी’ और ‘अरबी हलवा’ की लोकप्रियता अब केरल की सीमाओं से बाहर पहुँच चुकी है। यहाँ की ‘Ramadan Food Walk’ अब सालभर चलती है, जिसमें इफ्तार व्यंजन चखते हुए हर व्यंजन की उत्पत्ति और उसकी संस्कृति का परिचय कराया जाता है।

पर्यटक अब सिर्फ ग्राहक नहीं, सह-रसोइया और श्रोता भी

केरल में भोजन अब केवल परोसा नहीं जाता, वह सिखाया, सुनाया और साझा किया जाता है। हर भोजनालय में QR कोड से डिश की कहानी, उसके पीछे की लोककथा, और पोषण विवरण मिल जाता है। रसोइए अब केवल शेफ नहीं — संस्कृति के दूत बन चुके हैं।

परिणाम: स्वाद से समृद्धि

  1. 2025 में केरल के फूड टूरिज्म से ₹620 करोड़ की आय
  1. 9000 से अधिक स्थानीय होम कुक, महिला रसोइयों और शेफ को रोज़गार
  1. 26 विदेशी विश्वविद्यालयों के छात्र फूड एंथ्रोपोलॉजी के लिए केरल आए
  1. “Taste Kerala, Save Kerala” कैम्पेन से स्थानीय उत्पादन को 38% बढ़ावा

जब थाली बन जाए संस्कृति की दर्पण

केरल का फूड टूरिज़्म अब सिर्फ स्वाद की नहीं — संस्कृति, किसानी, खान-पान परंपरा और संवाद की यात्रा है। जब आप किसी अम्मा के साथ रोटी बेलते हैं, जब किसी मछुआरे से सीपियों की करी बनाना सीखते हैं, या जब मंदिर के पुजारी से पायसम की कहानी सुनते हैं — तो आप केरल को जीने लगते हैं, बस घूमते नहीं।

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