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खामोश होता कश्मीर: कलाकारों की टूटती आवाज़, मिटती पहचान का दर्द

राष्ट्रीय/ कश्मीर | ABC NATIONAL NEWS | श्रीनगर/नई दिल्ली | 20 मार्च 2026

कश्मीर सिर्फ खूबसूरत वादियों का नाम नहीं है, यह एक जीवंत संस्कृति, कला और परंपराओं की धरती रही है। यहां की रूह संगीत, शायरी, लोक कला और किस्सागोई में बसती है। लेकिन आज यही कश्मीर धीरे-धीरे एक खामोशी में डूबता जा रहा है—ऐसी खामोशी, जिसमें कलाकारों की आवाज़ दबती जा रही है।

यह खामोशी अचानक नहीं आई है। यह धीरे-धीरे पनपी है, जब कलाकारों के पास मंच कम होते गए, सराहना घटती गई और उनके काम की अहमियत नजरअंदाज होने लगी। पहले जहां रेडियो, टीवी और सांस्कृतिक कार्यक्रम कलाकारों को पहचान देते थे, वहीं आज ऐसे प्लेटफॉर्म लगभग खत्म हो चुके हैं। न नए कलाकारों को अवसर मिल रहे हैं, न पुराने कलाकारों को सम्मान।

कश्मीर के कई पारंपरिक कलाकार—जैसे रबाब बजाने वाले, सूफी संगीत गाने वाले या लोक कलाकार—आज आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। उनकी कला अब सिर्फ शौक बनकर रह गई है, जिससे उनका घर नहीं चल पाता। नतीजा यह है कि नई पीढ़ी इस विरासत से दूर होती जा रही है। जब कला से रोज़ी-रोटी नहीं मिलेगी, तो कोई उसे अपनाना क्यों चाहेगा?

यह सिर्फ कलाकारों की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे समाज की चिंता है। जब संस्कृति कमजोर होती है, तो समाज अपनी पहचान खोने लगता है। भाषा, परंपराएं और कला—ये सब मिलकर किसी भी जगह की आत्मा बनाते हैं। अगर ये खत्म हो जाएं, तो सिर्फ इमारतें और सड़के बचती हैं, रूह नहीं।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह गिरावट अब सामान्य मानी जाने लगी है। लोग इसे मुद्दा ही नहीं मानते। जबकि सच्चाई यह है कि अगर अभी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में कश्मीर की कई परंपराएं सिर्फ किताबों और कहानियों में ही रह जाएंगी।

जरूरत है कि सरकार और समाज दोनों मिलकर इस दिशा में काम करें। कलाकारों के लिए मंच बनाए जाएं, आर्थिक मदद दी जाए, स्कूलों और कॉलेजों में पारंपरिक कला को बढ़ावा दिया जाए और युवाओं को इससे जोड़ा जाए। मीडिया को भी अपनी भूमिका निभानी होगी, ताकि इन कलाकारों की आवाज़ दूर तक पहुंचे।

कश्मीर की संस्कृति को बचाना सिर्फ एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक जरूरी काम है। क्योंकि जब एक कलाकार खामोश होता है, तो सिर्फ उसकी आवाज़ नहीं, बल्कि पूरी सभ्यता का एक हिस्सा खो जाता है।

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